ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविशुदोद्यानद्विरद- ज्ञानोयरूपी वनका हाथी. विद्या- जानना, वेद-विद्या, ज्ञान-दृष्टि, शास्त्राध्ययन, आत्मज्ञानका शास्त्र. अधिक पांचवा परिशिष्ट देखें. विद्यारविंदप्रबोध- विद्यारूपी कमलका विकास करनेवाला विद्युताग्नि- आकाशस्थ बिजलीका अग्नि. विद्युत्त्वन- बिजलीका वन. विधिनिषेध-विधि=जो करना है वह, निषेध जो त्याज्य है वह, कार्याकार्य. विधिविवर्जित-शास्त्र मर्यादाका उल्लंघन. किया हुआ. विनट- खेलका साथी. विनोद्वनवाटिका- मनोविनोदके लिये बनायी गयी जगह. विपरीतज्ञान-अन्यथा ज्ञान. ज्ञानको अज्ञान और अज्ञानको ज्ञान समझना. विभुद्यवनवसंत- विद्वानोंके वनमें आया हुवा वसंत, विद्वानोंकी विद्वत्ता खिलानेवाला. विद्वद्वृत्तिमें बहार लानेवाला. विभूति- जहां ईश्वर भावका उठाव स्पष्ट दीखता है, ईश्वरी भाव. शुचि- साधनसंपन्न, प्रज्ञायोगादि- संपन्न=विभूति. विमनस्क- अन्यमनस्क, उदास, तटस्थ, उन्मन, जिसका मनोर्लय हुवा है वह. विरक्त- वैराग्यसंपन्न, वासनाओंसे परा- ङ्मुख, आत्माभिमुख, वैराग्य- संपन्न. विलुप्त- अदृश्य. विवेकवल्लीका उद्यान- विवेकरूपी लताका उपवन, अर्थात् जहां कार्याकार्य विवेक हो.
विवेचन- मीमांसा, आलोचना, औचित्य अनौचित्यका दर्शन. विषयबोधविदग्ध- स्पष्ट बोध देनेमें कुशल. विषयविद्यावधुवल्लभ-शुद्ध ब्रह्मविद्या रूपी वधूका वल्लभ, पति. विशेष-तुलनामें श्रेष्ठ, विशिष्ट, सर्वोत्तम अधिक. विश्व- जगत् सृष्टि. विश्वतश्चक्षु- सारा विश्वही जिसकी आंखें हैं. विश्वतोमुख- सारा विश्वही जिसका मुख है. विश्वतः पाद्- विश्वही जिसके चरण हैं. विश्वदभ्र- विश्वके बादल, विश्वरूपी मेघ. विश्वबाहु- सारा विश्वही जिसके बाहू हैं. विश्वमोहिनी- विश्वको मोहनेवाली. विश्ववस्वप्न- यह विश्व एक स्वप्न है. विश्वात्मकदेव- विश्वस्वरूपी देव, जगदंतर्यामी. विश्वोद्भवभवन-विश्व निर्मितिका स्थान. विश्वोदरतोंदल- विश्वरूपी उदरकी तोंद. विशद- स्पष्ट खोलकर, शुद्ध रुपसे. विषय- इंद्रियोंके विषय. विषयवाहिनी- विषयोंका प्रवाह. विषयविध्वंसैकवीर-विषयोंको नष्ट करनेमें एकैकवीर. विषयविषजाल- विविध विषयरूपी विषका आवरण. विषयव्यालय - विषयरूपी सर्प, विषयरूपी अजगर. विसर्जन - पोछ डालनेकी क्रिया, पूजामें विसर्जन क्रिया अंतिम होती है. पूजामें सर्व प्रथम अपने हृदयस्थको मूर्तिविशेषमें प्रतिष्ठा करके अंतमें वह उसी हृदयस्थको मूर्ति- मेसे विसर्जित कर अपने हृदयमें वापिस बुलाया जाता हैं मूर्तिपूजा एक प्रकारसे हृदयस्थकी पूजा हैं.
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