भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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विस्फुलिंग – चिनगारी, विस्मरण विस्मृती-भूलना, भूलनेकी क्रिया. विस्मित – आश्चर्य चकित, चमत्कृत. विहंग, विहंगम- आकाशमें उडनेवाला पक्षी. विहितकर्म- शास्त्रोंद्वारा कहे गये कर्म. विज्ञ- जानकार, विद्वान. विज्ञान- प्रापंचिक ज्ञान, बुद्धिकी जानकारी आचरणमें लानेकी कुशलता. अपरोक्षानुभूत ज्ञान. शास्त्रोक्त कर्मोंसे बुद्धि ईश्वरमे स्थिर करना. वीतराग- विरक्त. वृत्ति- मनोदशा, मनकी अवस्था, स्वभाव, भावना, आचार पद्धति, चित्त वृति, चरितार्थका साधन. वेदप्रतिपाद्य,- वेदोंद्वारा प्रतिपादित विषय. वेदवादरत-वेदके अर्थवादमें शब्दार्थ वादमें. मग्न. वेद्य- जानने योग्य. वेध- चित्तका आकर्षण, धुन, रट, झक, चसका, लत. वेधना- व्यापना. वेष्टन- आवरण. वैखरी- चारवाणियोंमें एक स्वपरवेद्य वाणी. वैजयंतीमाला- श्रीविष्णुके गलेमें पडी एक- माला जिसमें पंचतत्वदर्शक पांचोंरत्न होते हैं हीरा आकाश, माणिक्य अग्नि, पुष्कराग वायु. मोति जल, नील पृथ्वी. वैराग्य – अनिष्ट विषयोंको वर्ज्य माननेका भाव, अनासक्ति, किसी भी सत्ताके विषयमें उदासीनता, व्याप – अपनेमें समालनेकी वृति. व्यभिचार – कृतघ्नता, भ्रष्ट होनेकी वृत्ति, अलगता, अंतर, बीचमें परदा होना. व्यसन- कुटेव, विषयानुरक्ति, आसक्ति लंपटता, व्याख्यान- किसी विषयक, प्रमेयका विवेचन करके उसको समझाना. व्याघ्र गह्वर- शेरकी मांद. व्यापना- अपनेमें समालेना. व्यापक- सर्वगत, जो सर्वत्र रहा हो. व्याल विवर- सांपका बिल. व्रत- नैष्ठिक नियम. श शतघ्नी- तोप; जिससे सौ सौ लोग मारे जाते हों. शतधा- सैंकडो प्रकारसे. शतमख- सौ यज्ञ. शतमखउत्तीर्ण- सौ यज्ञ करके इंद्रपद पाया हुवा. शब्दब्रह्म- वेद. शम- अंतःकरणके संयमके कारण स्वस्थता, शांत होना, अंतर्दाहका शमन. शमदममदनमदमभेद- शमदमादि द्वारा- काम- मदका नाश करनेवाला. शरीरासक्ति- शरीर पर आसक्ति. शरीरभाव- शरीरके विकार, शरीरही मैं हूं ऐसा भाव शांत, शांति- उपशम पाया हुवा, अक्षोभ चित्त, चित्तका समाधान, मोक्षका पूर्वसूचन. शार्ङ्गीधर- श्रीकृष्ण. शार्दूल- सिंह. शालिखेत- विशिष्ट प्रकारके धान-जो सुगं- धित होता है, खेत. शाश्वत- नित्य, सदैव रहनेवाला अविने- वाशी, सनातन, स्थिर, अविचल. शास्ता- शासन करनेवाला, शासक. शास्त्र- कर्म, उपासना, तप, यज्ञादि जीवन विषयक प्रश्नोंका पूर्वसिद्ध अनुभव. शिष्टआगामविधान- शिष्टाचार, वेदोक्त शास्त्रीय आचरण, परंपरागत आचरण, ज्ञानेश्वरी २२०