भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 1167, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1167

शीत- सर्द, ठंडा, शीतल. शुक्ति- सीप. शुचिता- पवित्रता, नीतिमत्ता, निर्विकारिता शुभ- इष्ट, भला, निर्मल, सत्कार्य. शून्य- निराकारब्रह्म, आकाश, कुछ भी नहीं, निःशेष, अभाव, रिक्तता. शैलकक्षाके गह्वर- पर्वत श्रेणियोंकी गुफायें. शोक- मोह आसक्तिजन्य व्याकुलता, उद्वेग, अनुत्साह, पश्चात्ताप जन्य अनुत्साह, विकारोंका परिणाम. शोष- सूखना, शुष्क, सूखा. शौच- पवित्रता, शुचिता, शुद्धता, स्वच्छता. श्रीमहालया- नेवासेका मोहिनीराज मंदिर. श्रुति- वेद. श्रुतिगुणगणसमुद्र- वेदोक्त गुण समुच्च- यका सागर. श्वशुर- ससुरा. श्वानपिशित- कुत्तेका मांस. -ष- षट्कर्म- यज्ञ कराना, यज्ञ करना, वेदाध्य- यन, वेद अध्यापन, दान और प्रतिग्रह (दान देना लेना) ये ब्राह्मणोंके षट्कर्म हैं. षड्गुणचक्रवर्ति- यश, श्री, औदार्य, ज्ञान, वैराग्य, और ऐश्वर्य ये भगवानके छ गुण हैं, इन गुणोंका चक्रवर्ति भगवान. षड्गुणाधिकरण- उपरोक्त छः गुणोंका स्थान. षड्रसाज्ञ- छ रसोंका अज्ञ. -स- संकर- व्यभिचारजन्य मिश्रण, सामा- जिक अव्यवस्था. संकल्प-मानसिक कर्म प्रवृत्ति, मनका मूल स्वरूप, यज्ञादिक कार्योंका संकल्प, मनसे उत्पन्न करना.


संकल्प संध्या-मनकी संकल्प करनेकी प्रवृत्ति- का अंत. सकल काम पूर्णता- सभी इच्छाओंको पूर्ण करनेवाला. सकलमतिप्रकाश- 'सबकी बुद्धिको प्रकाश देनेवाला. सकलायवयदर्शन-अवयवोंका दर्शन. सभी संपूर्ण दर्शन. सकलैश्वर्यसुख-सभी प्रकारके ऐश्वर्यका सुख सकाम- इच्छायुक्त, फलेच्छासे कर्म करने वाला. विजयेच्छायुक्त. सख्य- नवधाभक्तिमें आठवे प्रकारकी भक्ति. संग- आसक्ति, संबंध, अनुराग, कर्म- संग, गुणसंग, जनसंग, मुक्त-संग संगदोष, संग, आसक्तिसे दोष निर्माण होते हैं, कर्म फलास- क्तिसे जैसे साधक कर्म बंधनमें आता है वैसे ही कर्मासक्तिसे भी, संगमस्थान-ऐक्य स्थान. सगबगाना-सराबोर हो जाना, भीग जाना, तर हो जाना, परिपूर्ण हो जाना. संग्रह- संचय, एकत्र करना, फूटने न देना सही दिशामें रखना, दुरूपयोग न होने देना, परिग्रह. संघात- समष्टि, नियम, वृंद, समवाय. सज्जनवनचंदन-सज्जन रूपी वनमें चंदन के समान. सत्- भला, सत्कर्म ब्रह्मवाचक शब्द, ॐ तत् सत्में अंतिम तत्व, केवल शुभ. सत् असत्का प्रश्रय-वह तत्व जो सत् असत् का द्वंद्व नहीं था तब भी इन दोनोंका आश्रय रूप था. संत- सत्पुरुष, सदैव सर्वहित. कामना करनेवाले, सदैव टिकने- वाला ईश्वर भक्त, ज्ञानी, योगी, तत्वदर्शी, सदसद्विवेक रखनेवाला


२२१ परिशिष्ट ६