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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

शीत- सर्द, ठंडा, शीतल. शुक्ति- सीप. शुचिता- पवित्रता, नीतिमत्ता, निर्विकारिता शुभ- इष्ट, भला, निर्मल, सत्कार्य. शून्य- निराकारब्रह्म, आकाश, कुछ भी नहीं, निःशेष, अभाव, रिक्तता. शैलकक्षाके गह्वर- पर्वत श्रेणियोंकी गुफायें. शोक- मोह आसक्तिजन्य व्याकुलता, उद्वेग, अनुत्साह, पश्चात्ताप जन्य अनुत्साह, विकारोंका परिणाम. शोष- सूखना, शुष्क, सूखा. शौच- पवित्रता, शुचिता, शुद्धता, स्वच्छता. श्रीमहालया- नेवासेका मोहिनीराज मंदिर. श्रुति- वेद. श्रुतिगुणगणसमुद्र- वेदोक्त गुण समुच्च- यका सागर. श्वशुर- ससुरा. श्वानपिशित- कुत्तेका मांस. -ष- षट्कर्म- यज्ञ कराना, यज्ञ करना, वेदाध्य- यन, वेद अध्यापन, दान और प्रतिग्रह (दान देना लेना) ये ब्राह्मणोंके षट्कर्म हैं. षड्गुणचक्रवर्ति- यश, श्री, औदार्य, ज्ञान, वैराग्य, और ऐश्वर्य ये भगवानके छ गुण हैं, इन गुणोंका चक्रवर्ति भगवान. षड्गुणाधिकरण- उपरोक्त छः गुणोंका स्थान. षड्रसाज्ञ- छ रसोंका अज्ञ. -स- संकर- व्यभिचारजन्य मिश्रण, सामा- जिक अव्यवस्था. संकल्प-मानसिक कर्म प्रवृत्ति, मनका मूल स्वरूप, यज्ञादिक कार्योंका संकल्प, मनसे उत्पन्न करना.


संकल्प संध्या-मनकी संकल्प करनेकी प्रवृत्ति- का अंत. सकल काम पूर्णता- सभी इच्छाओंको पूर्ण करनेवाला. सकलमतिप्रकाश- 'सबकी बुद्धिको प्रकाश देनेवाला. सकलायवयदर्शन-अवयवोंका दर्शन. सभी संपूर्ण दर्शन. सकलैश्वर्यसुख-सभी प्रकारके ऐश्वर्यका सुख सकाम- इच्छायुक्त, फलेच्छासे कर्म करने वाला. विजयेच्छायुक्त. सख्य- नवधाभक्तिमें आठवे प्रकारकी भक्ति. संग- आसक्ति, संबंध, अनुराग, कर्म- संग, गुणसंग, जनसंग, मुक्त-संग संगदोष, संग, आसक्तिसे दोष निर्माण होते हैं, कर्म फलास- क्तिसे जैसे साधक कर्म बंधनमें आता है वैसे ही कर्मासक्तिसे भी, संगमस्थान-ऐक्य स्थान. सगबगाना-सराबोर हो जाना, भीग जाना, तर हो जाना, परिपूर्ण हो जाना. संग्रह- संचय, एकत्र करना, फूटने न देना सही दिशामें रखना, दुरूपयोग न होने देना, परिग्रह. संघात- समष्टि, नियम, वृंद, समवाय. सज्जनवनचंदन-सज्जन रूपी वनमें चंदन के समान. सत्- भला, सत्कर्म ब्रह्मवाचक शब्द, ॐ तत् सत्में अंतिम तत्व, केवल शुभ. सत् असत्का प्रश्रय-वह तत्व जो सत् असत् का द्वंद्व नहीं था तब भी इन दोनोंका आश्रय रूप था. संत- सत्पुरुष, सदैव सर्वहित. कामना करनेवाले, सदैव टिकने- वाला ईश्वर भक्त, ज्ञानी, योगी, तत्वदर्शी, सदसद्विवेक रखनेवाला


२२१ परिशिष्ट ६

यशावशेषभोगी, सदैव सन्मार्गसे चलनेवाला, सर्वत्र ईश्वर दर्शन करनेवाला, सत्यनिष्ठ, धैर्यसे सत्य तथा सत्वमें स्थिर रहनेवाला. संतर्पण- भोजन देना. अन्नसत्र. सत्कार्यवाद- कार्यकी अभिव्यक्तिके पहले अर्थात् कार्य प्रकट होनेसे पूर्व कारणमें उसका अस्तित्व मानने- वाले निरीश्वरवादी सांख्योंका मत. सत्ता- सत्व, सामान्य चैतन्य, अस्तित्व, स्वामित्व. सत्वशुद्धि- सत्वगुणका निर्मलत्व, चित्तशुद्धि, अंतःकरणका निर्मलत्व. संन्यास- कर्मत्याग, अहंता ममताका त्याग, जीवन्मुक्तावस्थाकी अनुभूति, ब्रह्मार्पण भावसे जीवनयापन. संन्यासी- ब्राह्मभावमें लीन जीवमुक्त पुरुष. संनिधान- सामीप्य. संप्रदाय- परंपरागत जीवनपद्धति. सबरी- खोदनेके काम आनेवाली लोहकी मोटी छड. समता- एक जैसा, शांत, द्वंद्वातीत अवस्था, समबुद्धि, समान मानना, सहज, समचित्त- चित्तकी समानतावाला. समबुद्धि- बुद्धिसे समान माननेवाला. समदृष्टि- सबको समान देखनेवाला. सबको समान समझने वाला. समन्वय- मिलान, मेल. समरस- एकरस. समवाय- नित्यसंबंध, समष्टिरूप, समुदाय. समाधान- निःसंशयवृत्ति, शांतवृत्ति, संतोष, अवरोध निराकरण. समाधिबोध- ध्यानशून्य तन्मयताका बोध, निष्काम कर्मलीनताका बोध, भगवत् चिंतनमें डूब जाना. समुद्धर्ता- सही तरीकेसे, पूर्ण रूपसे उद्धार करनेवाला. समूहपरस्थ- समूहमें, समुदायमें आगे होने का भाव. सम्मोहनावस्था- मुग्धावस्था, मोहावस्था. सर्वगत- सर्वव्यापी, सभीस्थानोंमें फैला हुवा. सर्वज्ञ- सब कुछ जाननेवाला. सर्वात्मकदेव, सर्वात्मकस्वामी- सबमें बसा हुवा देव, जगदंतर्यामी, सर्वांतर्यामी. सर्वेश्वर- सबका स्वामी. सर्वोपशांतिप्रमदा-सभी प्रकारकी शांतिरूपी तरुणी. सलिल- पानी. सलोनापन- सौंदर्य. संवादफलनिदान- संवादरूपी फलका अंत. सव्यसाची- अर्जुन, दोनों हाथसे समान रूपसे बाण चलानेवाला. संसर्ग- लगाव, संग, संबंध. संसारतमसूर्य- संसाररूपी अंधकारके लिये सूर्यके समान. सहजसमाधि- सहज एकाग्रता, सदैव स्वाभाविक ध्येय तन्मयता. सहजकृपामंदानिल- स्वाभाविक कृपारूपी मंदशीतल पवन. सहजस्थपुरुष- अपने भावमें लीन पुरुष. सहस्रकरकुमार- सूर्यपुत्र कर्ण. संहाररुद्र- प्रलयकालका रुद्र. सांख्य- ज्ञानीलोक, सांख्यशास्त्र, सांख्यदर्शन जीवनके सिद्धांत, जीवन सिद्धांतमें सगबगाया हुवा ज्ञानी, ज्ञान निष्ठा, क्षराक्षर विचार, आत्मा- नात्मविवेक, पिंडब्रह्मांड ज्ञान; सांख्यबुद्धि- आत्माका अकर्तृत्व, अक- र्मत्व, अप्रैरकत्व, अविनाशित्व नाशवान देहके जरिये स्वधर्माचरणकी अनिवार्यता. सांतःकरण- अंतःकरणके सह. साधक-मोक्षसाधक, मुमुक्षु, विषयत्यागका प्रयत्न करनेवाला, ईश्वरसे जुडनेका ज्ञानेश्वरी २२२

अभ्यास करनेवाला, आत्मदर्शन- इच्छुक तथा प्रयत्नशील, कर्मफल त्यागका प्रयत्न करनेवाला, सदैव ब्रह्म चिंतनमें लीन होनेका अभ्यास करनेवाला. साधु— सज्जन, सुविचारी, सदाचारी, साधु और पापीको समान माननेवाला, साम्यवृत्तिवाला. साध्य—देवतागण विशेष, विशिष्ट साधनाके द्वारा सिद्धीतक पहुंचे हुए, जिसको पाना होता है और साधनाके द्वारा उसे पा सकते है वह. साम्यबुद्धि—विश्वात्मैक्य जन्य समत्व बुद्धि. सभी प्राणिमात्रोंमें परमात्मभाव- को अनुभवना. साम्ययोग—समतासे साधा जानेवाला योग, समता प्राप्तिके लिये कीजानेवाली साधना. साधनाके साथ समत्वका अनुभव. साम्राज्य— निष्कंटक सार्वभौम राज्य. सायास— कष्ट. सायुज्यसिद्धिदिन— अंतिम मोक्षावस्था प्राप्त होनेवाला दिवस. सार— सत्य, तत्व, तत्वांश, रहस्य, सारभाग, सारसर्वस्व, समग्रता. सारस्वत—विद्या, साहित्य, सरस्वतीका पुत्र, सरस्वती जन्य. सावध— जागृत, परमार्थके विषयमें, ज्ञानमें तत्पर, सर्वत्र ईश्वरानु- भवमें अभ्यस्त, प्रमादरहित. साक्षात्कार—प्रत्यक्ष परमात्मदर्शन, सदैव सर्वत्र परमात्मानुभूति, साक्षीभूत—केवल दर्शक, तटस्थ, घटना- ओंमें, न उलझा हुवा. सिद्ध— पूर्णावस्थाप्राप्त, सर्वत्र ब्रह्म दर्श- नके कारण सदैव निर्भय, जो पाना है उनका निश्चय किया हुवा, कृतिसे तैयार, निष्कर्ष, एक देवयोनि, प्रत्यक्ष. सिद्धप्रज्ञा— पूर्व जन्मसे परिपक्व, तथा इस जन्ममे कमायी गयी बुद्धि. सिद्धि— अष्टमहासिद्धि, पूर्णत्व प्राप्ति, जीवनकी सफलता=दैवी गुणोंका पूर्णविकास, ईश्वर भक्ति जन्य साम्य दर्शन, ईश्वरलीनता, कर्मकी थकानसे मुक्ति, न करनेकासा कर्म रत रहनेकी क्षमता, शून्यवत् रहना. सुवृततरु- पुण्य कर्मोंका वृक्ष. सुखाभास— सुखका आभास. सुधाब्धि— अमृतका समुद्र. सुप्रभ— तेजस्वी. सुभग— उत्तम दैवका. सुभावभजनभाजन— शुद्धभावनासे भजन करने योग्य. सुमनस— अच्छे मनका, शुभ संकल्पोंका. सुरतरु— कल्पवृक्ष. सुविमल— अतिशय निर्मल. सुस्ताना— आराम करना, विश्रांति लेना. सुहृद्वजन— बदलेकी भावनाके बिना उपकार करनेवाले सज्जन मित्र. सूत्रकार— धर्मशास्त्र तथा दर्शनशास्त्रके सूत्रोंके रचयिता. सूत्रधार— कठपुतलीके नाचमें सूत हिलाने- वाला. सूर्यकांत— सूर्यकांतमणि, जो सूर्यकिरणोंको एकत्र करके उष्णता निर्माण करता है. सृष्टि— सृजन, उत्पत्ती, भूतसृष्टि, सेवा— परिचर्या, उपासना, भक्तिकरना. सैंतीस— छत्तीस तत्व, देखो, पांचवा परिशिष्ट. सोंधणी— सुगंध. सोऽहंबोध— वह आत्मा मैं हूं अथवा वह ब्रह्म मैं हूं इसकी अनुभूति. सोऽहंभाव— सोऽहं बोधमें स्थिर रहना. सौरभ— सुगंध. २२३ परिशिष्ट ६

स्तवन- स्तुति. स्ताव्य- स्तुतिका विषय. स्तोत्र- स्तुति, ईश्वर-स्तवनार्थ बनायेगये विशिष्ट प्रकारके काव्य. स्थावर- अचल हलचल न कर सकनेवाला स्थित- स्थिर, अस्तित्व, अपने स्थान पर अधिष्ठित, स्वप्रमाणपर जमा हुवा. स्थितप्रज्ञ- जिसकी बुद्धि समाधिमें स्थिर है वह, आदर्श-सिद्धांत तथा उसके व्यवहार-कुशलतामें जो प्रवीण है ऐसा, सभी इच्छाओंका अतिक्र- मण करके अपनेमें अपनेसे निरा- लंब आनंदमे स्थिर है वह, गीताका आदर्श पुरुष. स्नेहाद्रंचित्त-स्नेह वात्सल्यपूर्ण चित्त. स्फुरदमंदामंदवत्सल-सदैव स्फुरनेवाले आनंदसे भरा हुवा. स्वजनवनचंदन-अपने भक्तोंके समूहमें चंदनरूप. स्वसंविद्रुमबीजप्रसभूमिरूप स्वसंवित् रूप स्वरूपज्ञानरूपी वृक्षका बीज पडने योग्य भूमिरूप. स्वसंवेद्य अपने आप जानने योग्य. ह हडप — मूल शब्द कन्नड भाषाका, क्षौर सामग्री रखनेका नाईका थैला. किंतु महाराष्ट्रमें इसको पानदानके रूपमें स्वीकार किया गया है. हरना- हरण करना, दूर करना, फैलाना, पीछे हटाना.

हरित-हरे रंगका. हर्ष-आनंद. हवि-हवनद्रव्य. हस्तोदक-हाथपर पानी छोड़कर दान देना, हतोदक देना. हिमवंत-हिमाचल. हिय-हृदय. हृदयकमल आराम-हृदयरूपी कमलमें विश्रांति लेनेवाला. हृदयस्थ-हृदयमें रहनेवाला. हेतुमंत-युक्तित्राला. क्ष क्षमा-सहनशीलता अपराध, सहिष्णुता. क्षय- मरण, नाश क्षर- नाशवंत. क्षितीश- राजा. क्षीण- क्षय होनेवाला, समाप्त होनेवाला. क्षीरसागर- दूध का सागर. क्षीरार्णवकल्लोल-लहरानेवाले दूध-सागरका कल्लोल. क्षुद्रघंटिका- घुंगरू. क्षुब्ध- चंचल, अधीर, क्रुद्ध, भीत. क्षेत्र- खेत, मैदान, पवित्रस्थान, गीतामें जीवात्माका क्षेत्र शरीर, भूतोंका उत्पत्तिस्थल. क्षेत्रसंन्यास- स्थान निष्ठा संन्यास, यह अंतिमस्थान स्थान है इस भावसे एकही स्थान पर रहनेका निश्चय और प्रयत्न करना. क्षेत्रसंन्यासी- क्षेत्रसंन्यास लिया हुवा. क्षेत्रज्ञ- शरीररूप क्षेत्रका साक्षीरूप जीव. क्षेम- मोक्ष विषयक उपलब्धीका रक्षण.

ॐ ज्ञानेश्वरी २२४

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