भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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यशावशेषभोगी, सदैव सन्मार्गसे चलनेवाला, सर्वत्र ईश्वर दर्शन करनेवाला, सत्यनिष्ठ, धैर्यसे सत्य तथा सत्वमें स्थिर रहनेवाला. संतर्पण- भोजन देना. अन्नसत्र. सत्कार्यवाद- कार्यकी अभिव्यक्तिके पहले अर्थात् कार्य प्रकट होनेसे पूर्व कारणमें उसका अस्तित्व मानने- वाले निरीश्वरवादी सांख्योंका मत. सत्ता- सत्व, सामान्य चैतन्य, अस्तित्व, स्वामित्व. सत्वशुद्धि- सत्वगुणका निर्मलत्व, चित्तशुद्धि, अंतःकरणका निर्मलत्व. संन्यास- कर्मत्याग, अहंता ममताका त्याग, जीवन्मुक्तावस्थाकी अनुभूति, ब्रह्मार्पण भावसे जीवनयापन. संन्यासी- ब्राह्मभावमें लीन जीवमुक्त पुरुष. संनिधान- सामीप्य. संप्रदाय- परंपरागत जीवनपद्धति. सबरी- खोदनेके काम आनेवाली लोहकी मोटी छड. समता- एक जैसा, शांत, द्वंद्वातीत अवस्था, समबुद्धि, समान मानना, सहज, समचित्त- चित्तकी समानतावाला. समबुद्धि- बुद्धिसे समान माननेवाला. समदृष्टि- सबको समान देखनेवाला. सबको समान समझने वाला. समन्वय- मिलान, मेल. समरस- एकरस. समवाय- नित्यसंबंध, समष्टिरूप, समुदाय. समाधान- निःसंशयवृत्ति, शांतवृत्ति, संतोष, अवरोध निराकरण. समाधिबोध- ध्यानशून्य तन्मयताका बोध, निष्काम कर्मलीनताका बोध, भगवत् चिंतनमें डूब जाना. समुद्धर्ता- सही तरीकेसे, पूर्ण रूपसे उद्धार करनेवाला. समूहपरस्थ- समूहमें, समुदायमें आगे होने का भाव. सम्मोहनावस्था- मुग्धावस्था, मोहावस्था. सर्वगत- सर्वव्यापी, सभीस्थानोंमें फैला हुवा. सर्वज्ञ- सब कुछ जाननेवाला. सर्वात्मकदेव, सर्वात्मकस्वामी- सबमें बसा हुवा देव, जगदंतर्यामी, सर्वांतर्यामी. सर्वेश्वर- सबका स्वामी. सर्वोपशांतिप्रमदा-सभी प्रकारकी शांतिरूपी तरुणी. सलिल- पानी. सलोनापन- सौंदर्य. संवादफलनिदान- संवादरूपी फलका अंत. सव्यसाची- अर्जुन, दोनों हाथसे समान रूपसे बाण चलानेवाला. संसर्ग- लगाव, संग, संबंध. संसारतमसूर्य- संसाररूपी अंधकारके लिये सूर्यके समान. सहजसमाधि- सहज एकाग्रता, सदैव स्वाभाविक ध्येय तन्मयता. सहजकृपामंदानिल- स्वाभाविक कृपारूपी मंदशीतल पवन. सहजस्थपुरुष- अपने भावमें लीन पुरुष. सहस्रकरकुमार- सूर्यपुत्र कर्ण. संहाररुद्र- प्रलयकालका रुद्र. सांख्य- ज्ञानीलोक, सांख्यशास्त्र, सांख्यदर्शन जीवनके सिद्धांत, जीवन सिद्धांतमें सगबगाया हुवा ज्ञानी, ज्ञान निष्ठा, क्षराक्षर विचार, आत्मा- नात्मविवेक, पिंडब्रह्मांड ज्ञान; सांख्यबुद्धि- आत्माका अकर्तृत्व, अक- र्मत्व, अप्रैरकत्व, अविनाशित्व नाशवान देहके जरिये स्वधर्माचरणकी अनिवार्यता. सांतःकरण- अंतःकरणके सह. साधक-मोक्षसाधक, मुमुक्षु, विषयत्यागका प्रयत्न करनेवाला, ईश्वरसे जुडनेका ज्ञानेश्वरी २२२