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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

य यजन- यज्ञ, पूजन. यज्ञोपकरण- यज्ञके उपकरण, यज्ञके साधन. युक्तित्रय- योगका पारिभाषिक शब्द, तीन बंध, मूलबंध, जालंधरबंध, तथा उड्डियानबंध. यूप- यज्ञका एक स्तंभ. योग- कर्म-कुशलता, सिद्धांतोंको व्यव- हारमें लानेकी कला, फल वासना त्याग द्वारा. कर्ममें ही एकाग्रताका अभ्यास व तज्जन्य कर्म-समाधि, समाधिकी परिपक्वता; स्थित प्रज्ञता, ईश्वर प्राप्तिके लिये एकाग्र साधना, आत्मदर्शनोपायसाधन, आत्म- ज्ञाननिष्ठ समर्पणजन्य निष्काम कर्मयोग, यज्ञादि कर्माचरणानुष्ठान, चित्तवृत्तिनिरोध, समदृष्टि व साम्यभाव, एकाग्र चित्तसे ब्रह्मानु- संधान, समत्व भावसे ईश्वरसे जुडना, ईशत्व प्राप्तिकी सिद्धि, ईश्वर तुल्य होकर समत्व सिद्धि, योग समुच्चय कर्म भक्ति ज्ञान द्वारा आनंद प्राप्ति, ईश्वरी शक्तिका आविर्भाव, सदैव ब्रह्मानुसंधान, ब्रह्मलीन समरसता. योग-क्षेम- सर्वस्व ईश्वरार्पणकी प्रेरणा, इससे जो साधकके पास नहीं है और उसके लिये जिसकी आवश्यकता है वह परमात्म- कृपासे मिलेगा और जो उसके पास है और साधकके लिये आवश्यक है उसकी रक्षा परमात्मा करेगा यह भाव. योगाब्जिनीसरोवर- योगरूपी कमल उगनेवाला सरोवर. योगी- कर्मयोगी जो न करनेका सा करता रहता है, कर्मजन्य थकानसे मुक्त, कर्मयोगीका प्रत्येक श्वास और धडकन ईश्वरो- पासना होती है, सदैव सर्वत्र ईश्वरानुभव जन्य साम्यता और एकाग्रता इसका परिपाक है. ध्यानयोगी ध्येयसे समरस हुआ साधक, जहां ध्येय और ध्याता ऐसा द्वैत नहीं रहा, ध्येयरत ध्येय-लीन, सगुण-निर्गुण उपासक ज्ञानयोगी, ज्ञेयसें समरस हुआ ज्ञानी. सदैव सर्वत्र ज्ञेयरत ज्ञेय लीन, भक्त-योगी; नित्य भगवद्रू- पमें भक्तिरत भक्त.

र रत-तन्मय, लीन, किसीमे डूबा हुआ. रथ्योदक-रास्ते पर बहनेवाला नालोंका पानी. रव- शब्द. रविचंद्रराहुमेल- सूर्यचंद्रग्रहण. रश्मिकर- सूर्य. रश्मिजाल- किरणोंका जाला. रस- आर्द्रता, पानी, औषध, रसायन, अन्नके रुचिके छह प्रकार-षड्रस, अंतःकरणमें उत्पन्न होनेवाले वृत्तिरूप भावरस नवरस, पतला पदार्थ, पारद पांच विषयोंमें एक जिव्हाका विषय. रसाई- प्रवेश, पैठ. रसायन- भस्मादि पौष्टिक औषधविशेष. रसोईदार- रसोई बनानेवाला. रातोत्पल- लालकमल. रुतना- गढना, घुसना, रुझना. रूख- वृक्ष, पेड. रोमबीज- बालका मूल. रोमांच- अष्ट सात्विक भावमे एक.

ल लगन- प्रवृत्ति, रुचि, एकाग्रता, चाह.

२१७ परिशिष्ट ६

लसितकंचन- तेजस्वी, सोना. लालनकील- लालन पालन करनेकी क्रीडा करनेवाला. लिंग- चिन्ह, लक्षण, आराध्यदैवत, शिवलिंग. लिंगदेहकमल- वासनात्मक तत्त्वोंसे बने लिंग देहका कमल, देह कमल. लिंग देहके वासना तत्व १७ होते हैं. पंचज्ञानेंद्रिय, पंचकर्मेन्द्रिय पंचप्राण मन और बुद्धि. लिप्त- लिपा हुआ. पुताहुवा, आसक्त. लीलना- निगलजाना. लीला-विलास- क्रीडाका विलास करनेवाला, लीला सहज क्रीडायें लुब्ध- लोलुप, मोहित, ललचाया हुवा. लुब्धक- व्याध, बहेलिया, चिडियामार, शिकारी. लेंडूक- लैंड, मलकी बत्ती. लोक- जगत, स्वर्गलोक, मृत्युलोक, पाताललोक, त्रिलोक, अथवा त्रिभुवन. अतल, वितल, सुतल, तलातल, रसातल, महातल, तथा पाताल ये सात अधोलोक और भूलोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, महा- लोक, जनलोक, तपोलोक तथा सत्यलोक ये सात ऊर्ध्वलोक मिलकर चौदा लोक अथवा चौदा भुवन माने गये हैं. लोकाचल- ऊर्ध्वलोकोंका शिखर. लोकोत्तर- अलौकिक. व वक्त्र- मुख, वंग- कलंक, सोनेका मल. वंचना- धूर्तता, ठगी, छल. वज्रकवच- अभेद्य आवरण, वज्रकी अमेद्य पोषाक. वज्राग्नि- वज्रासन करनेके कारण मूलबंधसे उत्पन्न होनेवाली उष्णता.

वज्रयोग- वज्रासन जन्ययोग. वटांकुर- वटबीजका अंकुर. वडवानल- समुद्रके नीचे जलनेवाला प्रचंड अग्नि. वध्य- मारनेका विषय. वह्नी- अग्नि. वर्ण वपु- वर्णरूपी शरीर. वर्णाश्रम- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र ये चार वर्ण तथा ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, और संन्यास, ये चार आश्रम मिलकर वर्णाश्रम धर्म कहलाता है. वसु- विभूति परिचयमें अष्टवसु देखें. वाक्पूजा- शब्दरूपी पूजा. वाग्जाल- शब्दपांडित्य. वाग्ब्रह्म- वेद. वाग्विलासिनी- वाणीकी क्रीडा करनेवाली. वाचस्पति- बृहस्पति. वांछित- जो चाहा था वही. वार्तिक- सूत्रोंपर किये गये व्याख्यान. विकर्म- भावनात्मक कर्म, विशेष कर्म, यह गीताका विशेष पारिभाषिक शब्द हैं. विकार- प्रकृतिजन्य इंद्रिय विकार, काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर यह षड्विकार जन्य मनोमल. विकाराष्टक- अष्ट सात्विक भावको ही कई स्थान पर अष्ट विकार, अथवा विकाराष्टक कहा गया है. विगत विषय वत्सल- विषय वासना ओंको नष्ट करनेवालोंसे प्रेम कर- नेवाला. विचक्षण- चिकित्सक, आलोचक, विचार- वान. वितरण- बांटणा. वितृष्णा- निरिच्छा, निरपेक्षा, विदलित मंगलकुल- अशुभकुलोंको समूल नष्ट किया हुवा.

ज्ञानेश्वरी २१८

विशुदोद्यानद्विरद- ज्ञानोयरूपी वनका हाथी. विद्या- जानना, वेद-विद्या, ज्ञान-दृष्टि, शास्त्राध्ययन, आत्मज्ञानका शास्त्र. अधिक पांचवा परिशिष्ट देखें. विद्यारविंदप्रबोध- विद्यारूपी कमलका विकास करनेवाला विद्युताग्नि- आकाशस्थ बिजलीका अग्नि. विद्युत्त्वन- बिजलीका वन. विधिनिषेध-विधि=जो करना है वह, निषेध जो त्याज्य है वह, कार्याकार्य. विधिविवर्जित-शास्त्र मर्यादाका उल्लंघन. किया हुआ. विनट- खेलका साथी. विनोद्वनवाटिका- मनोविनोदके लिये बनायी गयी जगह. विपरीतज्ञान-अन्यथा ज्ञान. ज्ञानको अज्ञान और अज्ञानको ज्ञान समझना. विभुद्यवनवसंत- विद्वानोंके वनमें आया हुवा वसंत, विद्वानोंकी विद्वत्ता खिलानेवाला. विद्वद्वृत्तिमें बहार लानेवाला. विभूति- जहां ईश्वर भावका उठाव स्पष्ट दीखता है, ईश्वरी भाव. शुचि- साधनसंपन्न, प्रज्ञायोगादि- संपन्न=विभूति. विमनस्क- अन्यमनस्क, उदास, तटस्थ, उन्मन, जिसका मनोर्लय हुवा है वह. विरक्त- वैराग्यसंपन्न, वासनाओंसे परा- ङ्मुख, आत्माभिमुख, वैराग्य- संपन्न. विलुप्त- अदृश्य. विवेकवल्लीका उद्यान- विवेकरूपी लताका उपवन, अर्थात् जहां कार्याकार्य विवेक हो.

विवेचन- मीमांसा, आलोचना, औचित्य अनौचित्यका दर्शन. विषयबोधविदग्ध- स्पष्ट बोध देनेमें कुशल. विषयविद्यावधुवल्लभ-शुद्ध ब्रह्मविद्या रूपी वधूका वल्लभ, पति. विशेष-तुलनामें श्रेष्ठ, विशिष्ट, सर्वोत्तम अधिक. विश्व- जगत् सृष्टि. विश्वतश्चक्षु- सारा विश्वही जिसकी आंखें हैं. विश्वतोमुख- सारा विश्वही जिसका मुख है. विश्वतः पाद्- विश्वही जिसके चरण हैं. विश्वदभ्र- विश्वके बादल, विश्वरूपी मेघ. विश्वबाहु- सारा विश्वही जिसके बाहू हैं. विश्वमोहिनी- विश्वको मोहनेवाली. विश्ववस्वप्न- यह विश्व एक स्वप्न है. विश्वात्मकदेव- विश्वस्वरूपी देव, जगदंतर्यामी. विश्वोद्भवभवन-विश्व निर्मितिका स्थान. विश्वोदरतोंदल- विश्वरूपी उदरकी तोंद. विशद- स्पष्ट खोलकर, शुद्ध रुपसे. विषय- इंद्रियोंके विषय. विषयवाहिनी- विषयोंका प्रवाह. विषयविध्वंसैकवीर-विषयोंको नष्ट करनेमें एकैकवीर. विषयविषजाल- विविध विषयरूपी विषका आवरण. विषयव्यालय - विषयरूपी सर्प, विषयरूपी अजगर. विसर्जन - पोछ डालनेकी क्रिया, पूजामें विसर्जन क्रिया अंतिम होती है. पूजामें सर्व प्रथम अपने हृदयस्थको मूर्तिविशेषमें प्रतिष्ठा करके अंतमें वह उसी हृदयस्थको मूर्ति- मेसे विसर्जित कर अपने हृदयमें वापिस बुलाया जाता हैं मूर्तिपूजा एक प्रकारसे हृदयस्थकी पूजा हैं.

३१५ परिशिष्ट ६

विस्फुलिंग – चिनगारी, विस्मरण विस्मृती-भूलना, भूलनेकी क्रिया. विस्मित – आश्चर्य चकित, चमत्कृत. विहंग, विहंगम- आकाशमें उडनेवाला पक्षी. विहितकर्म- शास्त्रोंद्वारा कहे गये कर्म. विज्ञ- जानकार, विद्वान. विज्ञान- प्रापंचिक ज्ञान, बुद्धिकी जानकारी आचरणमें लानेकी कुशलता. अपरोक्षानुभूत ज्ञान. शास्त्रोक्त कर्मोंसे बुद्धि ईश्वरमे स्थिर करना. वीतराग- विरक्त. वृत्ति- मनोदशा, मनकी अवस्था, स्वभाव, भावना, आचार पद्धति, चित्त वृति, चरितार्थका साधन. वेदप्रतिपाद्य,- वेदोंद्वारा प्रतिपादित विषय. वेदवादरत-वेदके अर्थवादमें शब्दार्थ वादमें. मग्न. वेद्य- जानने योग्य. वेध- चित्तका आकर्षण, धुन, रट, झक, चसका, लत. वेधना- व्यापना. वेष्टन- आवरण. वैखरी- चारवाणियोंमें एक स्वपरवेद्य वाणी. वैजयंतीमाला- श्रीविष्णुके गलेमें पडी एक- माला जिसमें पंचतत्वदर्शक पांचोंरत्न होते हैं हीरा आकाश, माणिक्य अग्नि, पुष्कराग वायु. मोति जल, नील पृथ्वी. वैराग्य – अनिष्ट विषयोंको वर्ज्य माननेका भाव, अनासक्ति, किसी भी सत्ताके विषयमें उदासीनता, व्याप – अपनेमें समालनेकी वृति. व्यभिचार – कृतघ्नता, भ्रष्ट होनेकी वृत्ति, अलगता, अंतर, बीचमें परदा होना. व्यसन- कुटेव, विषयानुरक्ति, आसक्ति लंपटता, व्याख्यान- किसी विषयक, प्रमेयका विवेचन करके उसको समझाना. व्याघ्र गह्वर- शेरकी मांद. व्यापना- अपनेमें समालेना. व्यापक- सर्वगत, जो सर्वत्र रहा हो. व्याल विवर- सांपका बिल. व्रत- नैष्ठिक नियम. श शतघ्नी- तोप; जिससे सौ सौ लोग मारे जाते हों. शतधा- सैंकडो प्रकारसे. शतमख- सौ यज्ञ. शतमखउत्तीर्ण- सौ यज्ञ करके इंद्रपद पाया हुवा. शब्दब्रह्म- वेद. शम- अंतःकरणके संयमके कारण स्वस्थता, शांत होना, अंतर्दाहका शमन. शमदममदनमदमभेद- शमदमादि द्वारा- काम- मदका नाश करनेवाला. शरीरासक्ति- शरीर पर आसक्ति. शरीरभाव- शरीरके विकार, शरीरही मैं हूं ऐसा भाव शांत, शांति- उपशम पाया हुवा, अक्षोभ चित्त, चित्तका समाधान, मोक्षका पूर्वसूचन. शार्ङ्गीधर- श्रीकृष्ण. शार्दूल- सिंह. शालिखेत- विशिष्ट प्रकारके धान-जो सुगं- धित होता है, खेत. शाश्वत- नित्य, सदैव रहनेवाला अविने- वाशी, सनातन, स्थिर, अविचल. शास्ता- शासन करनेवाला, शासक. शास्त्र- कर्म, उपासना, तप, यज्ञादि जीवन विषयक प्रश्नोंका पूर्वसिद्ध अनुभव. शिष्टआगामविधान- शिष्टाचार, वेदोक्त शास्त्रीय आचरण, परंपरागत आचरण, ज्ञानेश्वरी २२०

शीत- सर्द, ठंडा, शीतल. शुक्ति- सीप. शुचिता- पवित्रता, नीतिमत्ता, निर्विकारिता शुभ- इष्ट, भला, निर्मल, सत्कार्य. शून्य- निराकारब्रह्म, आकाश, कुछ भी नहीं, निःशेष, अभाव, रिक्तता. शैलकक्षाके गह्वर- पर्वत श्रेणियोंकी गुफायें. शोक- मोह आसक्तिजन्य व्याकुलता, उद्वेग, अनुत्साह, पश्चात्ताप जन्य अनुत्साह, विकारोंका परिणाम. शोष- सूखना, शुष्क, सूखा. शौच- पवित्रता, शुचिता, शुद्धता, स्वच्छता. श्रीमहालया- नेवासेका मोहिनीराज मंदिर. श्रुति- वेद. श्रुतिगुणगणसमुद्र- वेदोक्त गुण समुच्च- यका सागर. श्वशुर- ससुरा. श्वानपिशित- कुत्तेका मांस. -ष- षट्कर्म- यज्ञ कराना, यज्ञ करना, वेदाध्य- यन, वेद अध्यापन, दान और प्रतिग्रह (दान देना लेना) ये ब्राह्मणोंके षट्कर्म हैं. षड्गुणचक्रवर्ति- यश, श्री, औदार्य, ज्ञान, वैराग्य, और ऐश्वर्य ये भगवानके छ गुण हैं, इन गुणोंका चक्रवर्ति भगवान. षड्गुणाधिकरण- उपरोक्त छः गुणोंका स्थान. षड्रसाज्ञ- छ रसोंका अज्ञ. -स- संकर- व्यभिचारजन्य मिश्रण, सामा- जिक अव्यवस्था. संकल्प-मानसिक कर्म प्रवृत्ति, मनका मूल स्वरूप, यज्ञादिक कार्योंका संकल्प, मनसे उत्पन्न करना.


संकल्प संध्या-मनकी संकल्प करनेकी प्रवृत्ति- का अंत. सकल काम पूर्णता- सभी इच्छाओंको पूर्ण करनेवाला. सकलमतिप्रकाश- 'सबकी बुद्धिको प्रकाश देनेवाला. सकलायवयदर्शन-अवयवोंका दर्शन. सभी संपूर्ण दर्शन. सकलैश्वर्यसुख-सभी प्रकारके ऐश्वर्यका सुख सकाम- इच्छायुक्त, फलेच्छासे कर्म करने वाला. विजयेच्छायुक्त. सख्य- नवधाभक्तिमें आठवे प्रकारकी भक्ति. संग- आसक्ति, संबंध, अनुराग, कर्म- संग, गुणसंग, जनसंग, मुक्त-संग संगदोष, संग, आसक्तिसे दोष निर्माण होते हैं, कर्म फलास- क्तिसे जैसे साधक कर्म बंधनमें आता है वैसे ही कर्मासक्तिसे भी, संगमस्थान-ऐक्य स्थान. सगबगाना-सराबोर हो जाना, भीग जाना, तर हो जाना, परिपूर्ण हो जाना. संग्रह- संचय, एकत्र करना, फूटने न देना सही दिशामें रखना, दुरूपयोग न होने देना, परिग्रह. संघात- समष्टि, नियम, वृंद, समवाय. सज्जनवनचंदन-सज्जन रूपी वनमें चंदन के समान. सत्- भला, सत्कर्म ब्रह्मवाचक शब्द, ॐ तत् सत्में अंतिम तत्व, केवल शुभ. सत् असत्का प्रश्रय-वह तत्व जो सत् असत् का द्वंद्व नहीं था तब भी इन दोनोंका आश्रय रूप था. संत- सत्पुरुष, सदैव सर्वहित. कामना करनेवाले, सदैव टिकने- वाला ईश्वर भक्त, ज्ञानी, योगी, तत्वदर्शी, सदसद्विवेक रखनेवाला


२२१ परिशिष्ट ६

यशावशेषभोगी, सदैव सन्मार्गसे चलनेवाला, सर्वत्र ईश्वर दर्शन करनेवाला, सत्यनिष्ठ, धैर्यसे सत्य तथा सत्वमें स्थिर रहनेवाला. संतर्पण- भोजन देना. अन्नसत्र. सत्कार्यवाद- कार्यकी अभिव्यक्तिके पहले अर्थात् कार्य प्रकट होनेसे पूर्व कारणमें उसका अस्तित्व मानने- वाले निरीश्वरवादी सांख्योंका मत. सत्ता- सत्व, सामान्य चैतन्य, अस्तित्व, स्वामित्व. सत्वशुद्धि- सत्वगुणका निर्मलत्व, चित्तशुद्धि, अंतःकरणका निर्मलत्व. संन्यास- कर्मत्याग, अहंता ममताका त्याग, जीवन्मुक्तावस्थाकी अनुभूति, ब्रह्मार्पण भावसे जीवनयापन. संन्यासी- ब्राह्मभावमें लीन जीवमुक्त पुरुष. संनिधान- सामीप्य. संप्रदाय- परंपरागत जीवनपद्धति. सबरी- खोदनेके काम आनेवाली लोहकी मोटी छड. समता- एक जैसा, शांत, द्वंद्वातीत अवस्था, समबुद्धि, समान मानना, सहज, समचित्त- चित्तकी समानतावाला. समबुद्धि- बुद्धिसे समान माननेवाला. समदृष्टि- सबको समान देखनेवाला. सबको समान समझने वाला. समन्वय- मिलान, मेल. समरस- एकरस. समवाय- नित्यसंबंध, समष्टिरूप, समुदाय. समाधान- निःसंशयवृत्ति, शांतवृत्ति, संतोष, अवरोध निराकरण. समाधिबोध- ध्यानशून्य तन्मयताका बोध, निष्काम कर्मलीनताका बोध, भगवत् चिंतनमें डूब जाना. समुद्धर्ता- सही तरीकेसे, पूर्ण रूपसे उद्धार करनेवाला. समूहपरस्थ- समूहमें, समुदायमें आगे होने का भाव. सम्मोहनावस्था- मुग्धावस्था, मोहावस्था. सर्वगत- सर्वव्यापी, सभीस्थानोंमें फैला हुवा. सर्वज्ञ- सब कुछ जाननेवाला. सर्वात्मकदेव, सर्वात्मकस्वामी- सबमें बसा हुवा देव, जगदंतर्यामी, सर्वांतर्यामी. सर्वेश्वर- सबका स्वामी. सर्वोपशांतिप्रमदा-सभी प्रकारकी शांतिरूपी तरुणी. सलिल- पानी. सलोनापन- सौंदर्य. संवादफलनिदान- संवादरूपी फलका अंत. सव्यसाची- अर्जुन, दोनों हाथसे समान रूपसे बाण चलानेवाला. संसर्ग- लगाव, संग, संबंध. संसारतमसूर्य- संसाररूपी अंधकारके लिये सूर्यके समान. सहजसमाधि- सहज एकाग्रता, सदैव स्वाभाविक ध्येय तन्मयता. सहजकृपामंदानिल- स्वाभाविक कृपारूपी मंदशीतल पवन. सहजस्थपुरुष- अपने भावमें लीन पुरुष. सहस्रकरकुमार- सूर्यपुत्र कर्ण. संहाररुद्र- प्रलयकालका रुद्र. सांख्य- ज्ञानीलोक, सांख्यशास्त्र, सांख्यदर्शन जीवनके सिद्धांत, जीवन सिद्धांतमें सगबगाया हुवा ज्ञानी, ज्ञान निष्ठा, क्षराक्षर विचार, आत्मा- नात्मविवेक, पिंडब्रह्मांड ज्ञान; सांख्यबुद्धि- आत्माका अकर्तृत्व, अक- र्मत्व, अप्रैरकत्व, अविनाशित्व नाशवान देहके जरिये स्वधर्माचरणकी अनिवार्यता. सांतःकरण- अंतःकरणके सह. साधक-मोक्षसाधक, मुमुक्षु, विषयत्यागका प्रयत्न करनेवाला, ईश्वरसे जुडनेका ज्ञानेश्वरी २२२

अभ्यास करनेवाला, आत्मदर्शन- इच्छुक तथा प्रयत्नशील, कर्मफल त्यागका प्रयत्न करनेवाला, सदैव ब्रह्म चिंतनमें लीन होनेका अभ्यास करनेवाला. साधु— सज्जन, सुविचारी, सदाचारी, साधु और पापीको समान माननेवाला, साम्यवृत्तिवाला. साध्य—देवतागण विशेष, विशिष्ट साधनाके द्वारा सिद्धीतक पहुंचे हुए, जिसको पाना होता है और साधनाके द्वारा उसे पा सकते है वह. साम्यबुद्धि—विश्वात्मैक्य जन्य समत्व बुद्धि. सभी प्राणिमात्रोंमें परमात्मभाव- को अनुभवना. साम्ययोग—समतासे साधा जानेवाला योग, समता प्राप्तिके लिये कीजानेवाली साधना. साधनाके साथ समत्वका अनुभव. साम्राज्य— निष्कंटक सार्वभौम राज्य. सायास— कष्ट. सायुज्यसिद्धिदिन— अंतिम मोक्षावस्था प्राप्त होनेवाला दिवस. सार— सत्य, तत्व, तत्वांश, रहस्य, सारभाग, सारसर्वस्व, समग्रता. सारस्वत—विद्या, साहित्य, सरस्वतीका पुत्र, सरस्वती जन्य. सावध— जागृत, परमार्थके विषयमें, ज्ञानमें तत्पर, सर्वत्र ईश्वरानु- भवमें अभ्यस्त, प्रमादरहित. साक्षात्कार—प्रत्यक्ष परमात्मदर्शन, सदैव सर्वत्र परमात्मानुभूति, साक्षीभूत—केवल दर्शक, तटस्थ, घटना- ओंमें, न उलझा हुवा. सिद्ध— पूर्णावस्थाप्राप्त, सर्वत्र ब्रह्म दर्श- नके कारण सदैव निर्भय, जो पाना है उनका निश्चय किया हुवा, कृतिसे तैयार, निष्कर्ष, एक देवयोनि, प्रत्यक्ष. सिद्धप्रज्ञा— पूर्व जन्मसे परिपक्व, तथा इस जन्ममे कमायी गयी बुद्धि. सिद्धि— अष्टमहासिद्धि, पूर्णत्व प्राप्ति, जीवनकी सफलता=दैवी गुणोंका पूर्णविकास, ईश्वर भक्ति जन्य साम्य दर्शन, ईश्वरलीनता, कर्मकी थकानसे मुक्ति, न करनेकासा कर्म रत रहनेकी क्षमता, शून्यवत् रहना. सुवृततरु- पुण्य कर्मोंका वृक्ष. सुखाभास— सुखका आभास. सुधाब्धि— अमृतका समुद्र. सुप्रभ— तेजस्वी. सुभग— उत्तम दैवका. सुभावभजनभाजन— शुद्धभावनासे भजन करने योग्य. सुमनस— अच्छे मनका, शुभ संकल्पोंका. सुरतरु— कल्पवृक्ष. सुविमल— अतिशय निर्मल. सुस्ताना— आराम करना, विश्रांति लेना. सुहृद्वजन— बदलेकी भावनाके बिना उपकार करनेवाले सज्जन मित्र. सूत्रकार— धर्मशास्त्र तथा दर्शनशास्त्रके सूत्रोंके रचयिता. सूत्रधार— कठपुतलीके नाचमें सूत हिलाने- वाला. सूर्यकांत— सूर्यकांतमणि, जो सूर्यकिरणोंको एकत्र करके उष्णता निर्माण करता है. सृष्टि— सृजन, उत्पत्ती, भूतसृष्टि, सेवा— परिचर्या, उपासना, भक्तिकरना. सैंतीस— छत्तीस तत्व, देखो, पांचवा परिशिष्ट. सोंधणी— सुगंध. सोऽहंबोध— वह आत्मा मैं हूं अथवा वह ब्रह्म मैं हूं इसकी अनुभूति. सोऽहंभाव— सोऽहं बोधमें स्थिर रहना. सौरभ— सुगंध. २२३ परिशिष्ट ६

स्तवन- स्तुति. स्ताव्य- स्तुतिका विषय. स्तोत्र- स्तुति, ईश्वर-स्तवनार्थ बनायेगये विशिष्ट प्रकारके काव्य. स्थावर- अचल हलचल न कर सकनेवाला स्थित- स्थिर, अस्तित्व, अपने स्थान पर अधिष्ठित, स्वप्रमाणपर जमा हुवा. स्थितप्रज्ञ- जिसकी बुद्धि समाधिमें स्थिर है वह, आदर्श-सिद्धांत तथा उसके व्यवहार-कुशलतामें जो प्रवीण है ऐसा, सभी इच्छाओंका अतिक्र- मण करके अपनेमें अपनेसे निरा- लंब आनंदमे स्थिर है वह, गीताका आदर्श पुरुष. स्नेहाद्रंचित्त-स्नेह वात्सल्यपूर्ण चित्त. स्फुरदमंदामंदवत्सल-सदैव स्फुरनेवाले आनंदसे भरा हुवा. स्वजनवनचंदन-अपने भक्तोंके समूहमें चंदनरूप. स्वसंविद्रुमबीजप्रसभूमिरूप स्वसंवित् रूप स्वरूपज्ञानरूपी वृक्षका बीज पडने योग्य भूमिरूप. स्वसंवेद्य अपने आप जानने योग्य. ह हडप — मूल शब्द कन्नड भाषाका, क्षौर सामग्री रखनेका नाईका थैला. किंतु महाराष्ट्रमें इसको पानदानके रूपमें स्वीकार किया गया है. हरना- हरण करना, दूर करना, फैलाना, पीछे हटाना.

हरित-हरे रंगका. हर्ष-आनंद. हवि-हवनद्रव्य. हस्तोदक-हाथपर पानी छोड़कर दान देना, हतोदक देना. हिमवंत-हिमाचल. हिय-हृदय. हृदयकमल आराम-हृदयरूपी कमलमें विश्रांति लेनेवाला. हृदयस्थ-हृदयमें रहनेवाला. हेतुमंत-युक्तित्राला. क्ष क्षमा-सहनशीलता अपराध, सहिष्णुता. क्षय- मरण, नाश क्षर- नाशवंत. क्षितीश- राजा. क्षीण- क्षय होनेवाला, समाप्त होनेवाला. क्षीरसागर- दूध का सागर. क्षीरार्णवकल्लोल-लहरानेवाले दूध-सागरका कल्लोल. क्षुद्रघंटिका- घुंगरू. क्षुब्ध- चंचल, अधीर, क्रुद्ध, भीत. क्षेत्र- खेत, मैदान, पवित्रस्थान, गीतामें जीवात्माका क्षेत्र शरीर, भूतोंका उत्पत्तिस्थल. क्षेत्रसंन्यास- स्थान निष्ठा संन्यास, यह अंतिमस्थान स्थान है इस भावसे एकही स्थान पर रहनेका निश्चय और प्रयत्न करना. क्षेत्रसंन्यासी- क्षेत्रसंन्यास लिया हुवा. क्षेत्रज्ञ- शरीररूप क्षेत्रका साक्षीरूप जीव. क्षेम- मोक्ष विषयक उपलब्धीका रक्षण.

ॐ ज्ञानेश्वरी २२४

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