भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 12, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 12

प्रतीक था। श्रीकृष्णने अर्जुनको समाज पुरुषका प्रतीक मानकर ही यह उपदेश दिया है इसी भावको ध्यानमें लेकर श्रीमदाद्यशंकराचार्यने अपने भाष्यमें कहा है- इत्यतः संसार- बीजभूतौ शोकमोहौ। तयोः च सर्वकर्मसंन्यास पूर्ववत् आत्मज्ञाननिष्ठा मात्रात् न अन्यतो निवृत्तिः इति, तदुपदिदिक्षुः सर्वलोकानुग्रहार्थं अर्जुनं निमित्तीकृत्य आह भगवान् वासुदेवः ॥ गीताभाष्य २-११ ॥ ज्ञानेश्वर महाराजने भी अठारहवे अध्यायके अंतमे गाय बछडेको निमित्त बनाकर जैसे घरभरको दूध देती है; मेघ चातकको निमित्त बनाकर स्वयं बरसकर जैसे सारे संसारको शांति देते हैं, अपने अनन्य कमलको निमित्त बनाकर सूर्य जैसे संसारको प्रकाश देता है, वैसे श्रीकृष्णने अर्जुनको निमित्त बनाकर मोहग्रस्त विश्वको गीतो- पदेश दिया है ऐसा कहा है। उसी प्रकार ज्ञानेश्वरमहाराजने भी विश्वकल्याणके हेतुसे अपने ग्रंथकी रचना की है। उनका जन्मक्षेत्र महाराष्ट्र होनेसे स्वाभाविक ही कार्यक्षेत्र भी महाराष्ट्र बना। वैसे ही उनके सामने बैठनेवाले लोग मराठी भाषिक थे इसलिये उनको मराठी भाषाको माध्यम बनाना पडा; किंतु उनकी दृष्टि “गीतार्थसे विश्वको भरना” थी। जैसे ऊपर कहा है कि श्रीकृष्णने जैसे मोहग्रस्त अर्जुनको निमित्त बनाकर संसारको गीताका उपदेश दिया वैसे ज्ञानेश्वर महाराजने महाराष्ट्रको निमित्त बनाकर मानवमात्रके लिये यह वाग्विस्तार किया है इसमें संदेह नहीं। यह बात उन्होंने कई जगह कही है जैसे वे तेरहवे अध्यायके अंतमें कहते हैं। वाग्विलास विस्तार कर। गीतार्थसे विश्वको भर। बांधेंगे विशाल मंदिर। इस जगतका॥ १३-११५९ ॥ श्रीमद्भगवद्गीता और ज्ञानेश्वरीके विषयमें इतना लिखनेके बाद जरा हम देखे कि अन्य भाष्योंसे इसका क्या विशेष है। गीता ग्रंथ पर संस्कृतमें अनेक आचार्योने भाष्य रचा है। उस पर अनेक टीका प्रतीटीकाके आलोचनात्मक प्रबंध लिखे गये हैं; किंतु इन सबमें गीताके किसी एक विशिष्ट सिद्धांतके प्रतिपादनके लिये स्वपक्ष मंडन और प्रतिपक्ष खंडन पर ही सारी शक्ति लगाई है। कुछ भाष्योंको पढते समय तो ऐसे लगता हे कि केवल यह टीकाकारके पांडित्य प्रदर्शनका प्रयास हो रहा है! इस प्रकारके भाष्योंमें जन-सामान्यको वह तत्वज्ञान आत्मसात करना है यह बात अक्षरशः भुलाई गयी है। वैसे ही यह सब विद्वन्मान्य संस्कृत भाषामें होनेसे जनसामान्य इससे वंचित रहे। बहुजन समाजको इससे कुछ भी नहीं मिला। ज्ञानेश्वरीमें यह दृष्टि नहीं है। ज्ञानेश्वर महाराजने न संस्कृत भाषाको चुना न वे शास्त्रीय पद्धतिसे स्वमत मंडन तथा परमत खंडनके पचडेमें पडे। उन्होंने जन-सामान्यकी भाषाका स्वीकार किया तथा विषय प्रतिपादनमें उपमा दृष्टांत आदिसे बहुजन समाजके लिये आकर्षण निर्माण किया। शास्त्र कथनमें काव्य-पद्धतिको अपनाया। उसमें माधुर्य, ओज, प्रसाद, अर्थव्याप्ति, औदार्य, कांति, आदि सभी काव्यगुणोंका आविष्कार करके अत्यंत उत्कटताके साथ इन गुणोंका उत्कर्ष करके एक महान वेदांत काव्यकी निर्मिती की। परिणामस्वरूप बहुजनसमाज इस ओर आकर्षित हुआ। ज्ञानेश्वरीके कुछ अध्यायोंके मंगलाचरणके गुरुवंदनमें कुछ संस्कृतमय ‘मराठी’ ओवियां आई हैं। उदारणके लिये दसवे अध्याय, चौदहवे अध्याय, अठरहवे अध्यायके मंगलाचरणको देख सकते हैं। यहां जो शब्दालंकार सौंदर्य है तथा शब्दमाधुर्य है, इससे ज्ञानेश्वर महाराजके संस्कृतभाषापांडित्यका परिचय मिलता है। ज्ञानेश्वरीके सोलहवे अध्यायके मंगलाचरणमें ज्ञानेश्वरमहाराजने अपने श्रीगुरुपर किया हुवा चित्सूर्यका रुपक, ज्ञानेश्वरी ६