ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 13, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंकिसी भी काव्यमें अलंकारका एक अद्वितीय प्रकार है। अक्षरशः यह अभूतपूर्व है, अलौकिक है । किसी भी संस्कृत महाकाव्यके शिरोभागमें शोभास्पद है। यह देखकर बडे बडे विद्वान साहित्यिक काव्यानंदनमें डूब जाते हैं। इससे ग्रंथका सौंदर्य और वैभव बढा है । द्विगुणित हुआ है। अपने लाडले नन्हे बालकको अनेक चिडियोंके किस्से या बोलियां सुनाकर दूध-भात खिलानेवाली मांकी भांती ज्ञानेश्वर महाराज ज्ञानेश्वरीमें अपने श्रोताओंको अनेक काव्य गुणोंसे सानकर तत्वज्ञानका अमृतान खिलाते हैं। ज्ञानेश्वरीमें दो हजारसे अधिक रूपक या दृष्टांत हैं, इन सबका उद्देश तत्वज्ञानको सर्व-सुलभ बनाना है ! जनमनरंजन नहीं किंतु जनमन संस्कार संपन्न बनाना इस काव्य लेखनका उद्देश्य है। इसीलिये सारा महाराष्ट्र प्रेम और कृतज्ञतासे ज्ञानेश्वरको-और ज्ञानेश्वरीको भी-माउली कहता है। ज्ञानेश्वरकालीन एक महान संत श्रीनामदेव कहते हैं- ज्ञानेश्वर मेरी योगियोंकी माउली । “ ज्ञानेश्वरमाऊली ” यह महाराष्ट्रके भागवतानुगमका महामंत्र है । इतनाही नहीं समग्र महाराष्ट्रका महामंत्र है। बिना इस महामंत्रके महाराष्ट्रके सबसे बडे भागवत समुदायका- जिसको वारकरी संप्रदाय कहते हैं- भजन पूर्ण नहीं होता । भजनके अंतमें "ज्ञानेश्वर माउली ज्ञानराज माउली ” यह घोष होता है । ज्ञानेश्वरीका महत्व :- गीताके विषयमें लिखते समय ज्ञानेश्वर महाराजने लिखा है कि गीता कांडत्रय रूपिणी श्रुतीही है । तथा यह सर्वमान्य भी है। अन्य भाष्यकारोंने भी यह कहा है, किंतु इसका रूप व स्थान स्पष्ट करते समय अन्य सभी भाष्यकारोंने बडी खींचतानी की है। किंतु अध्येता ज्ञानेश्वरी ग्रंथमें यह नहीं देखेंगे। ज्ञानेश्वरी ग्रंथमें इन तीनोंका उत्कृष्ट समन्वय देखनेको मिलेगा। इसके उदाहरण रूप हम निम्न ओवी देते हैं। अथवा कर्मयोग ओघ । मिलके भक्त-चित्त गंगौघ । पाया स्वानंदोदधि सवेग । मद्रूपका ॥ १८-१२२२ ॥ कर्मयोगका प्रवाह भक्तिकी गंगासे मिला और वह गंगा मद्रूपके स्वानंदसागरमें मिली । ज्ञानेश्वरीमें कर्म है किंतु कर्मका त्रास नहीं, भक्ति है किंतु वह बावलेपनके अज्ञानकी नहीं, उन्होंने तत्वज्ञान के साथ प्रेमका माधुर्य जोड दिया है तो भक्तिको ज्ञानकी दृष्टि दी है; उनके दृष्टांतोंमे कौटुंबिक वात्सल्य है, पशु पक्षी तथा चराचर विश्वके विषयमें अलौकिक आत्मी- यता है। इसी आत्मीयतामेंसे ज्ञानेश्वर माउलीका घोष फूट पडा है। इसमेंसे ज्ञानेश्वरका विश्वप्रेम प्रकट हुवा है। इसी विश्व-प्रेमके कारण उनके काव्यमें असीम माधुर्य आया है। भावोंमें कोमलता, कल्पनाओंमें उदारता, अर्थमें गंभीरता, शब्दोंकी मधुरता इत्यादि काव्यकी उत्कटताकी आधारशिला ज्ञानेश्वरका यही विश्वप्रेम है । ज्ञानेश्वर महाराजने गीताके शब्दोंसे भी गीतामेंसे श्रीकृष्णका मनोगत जाननेका प्रयास किया है। यह वे कहते भी हैं — परमात्माका मनोरथ । हमें दिखाता है तू मूर्त । यह कहने पर चित्त । उमड आयेगा ॥ १३-५६० ॥ इस विषयमें निवृत्तिनाथादि श्रोताओने ज्ञानेश्वर महाराजको प्रशस्ति पत्र दिया है । महाराष्ट्रके आधुनिक संत, अंतरराष्ट्रीय ख्यातिके विद्वान, अलाहाबाद विश्वविद्यालयके भूतपूर्व-कुलपति श्री रा. द. रानडे इस विषयमें कहते हैं “उपमा, भाषासौंदर्य तत्वज्ञान ७ -प्रस्तावना