ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसाक्षात्कार, भक्ति, अद्वैत दर्शन, इसका संबंध जोडकर, अलौकिक निरीक्षण शक्ति, अप्रतिहत कवित्वशैली, अमापवाङ्माधुर्य, इन सर्वगुण संपन्नतासे "ज्ञानेश्वरी" यह ग्रंथ 'न भूतो न भविष्यति हुवा है' ऐसे कहनेमें कोई आपत्ति नहीं हैं।" यद्यपि साहित्यिक दृष्टिसे ज्ञानेश्वरी एक समृद्ध ग्रंथ है फिर भी यही उस ग्रंथका वास्तविक महत्त्व नहीं है। ज्ञानेश्वरीकी वास्तविक भूमिका तत्वज्ञानकी है। ज्ञानेश्वर महाराज अत्यंत श्रेष्ठतमसंतपुरुष थे। उनके समकालीन तथा उनके बादवाले सभी संतोंने इसको एक मतसे स्वीकार किया है। संतोका श्रेष्ठत्व उनके तत्त्वज्ञानमूलक स्वयंपूर्ण अनुभूति पर निर्भर होता हैं। ज्ञानेश्वरीमें संतोके रूपका विवेचन करते समय आत्मज्ञानमें शुद्ध सिद्ध। रहते संत जन प्रसिद्ध। ऐसा किया है। इस अनुभूतिका अर्थ परतत्व स्पर्श है! गीता यह अध्यात्मशास्त्र हैं। श्रीमत्शंकराचार्य भी यह स्वीकार करते हैं। इसके विषयमें ज्ञानेश्वर महाराज कहते हैं। मोक्षदानमे जो स्वतंत्र। ज्ञानप्रधान यह शास्त्र। इसीसे हैं यह सुसूत्र। लिया हाथमे ॥ १८-१३४६ ॥ भारतीय तत्त्वज्ञानमें, उपनिषदोंमें, मोक्षको सर्वश्रेष्ठ पुरुषार्थ माना है। ज्ञानेश्वरीमें भी चौदहवे अध्यायकी चारसौ एक ओवीमें "इस ब्रह्मपदको सायुज्य" कहते हैं ऐसा कहा गया है। गीता ही एकमात्र मोह निवारक तत्वज्ञान है। यही आत्मज्ञान है। गीता यह तत्वज्ञान पर ग्रंथ है इसीलिये उसको प्रस्थानत्रयीमें स्थान दिया गया है। काल प्रवाहमें इस तत्त्वज्ञानका लोप हो रहा था। अनेक अवैदिक मतमतांतर निर्माण होकर अपना प्रचार कार्य कर रहे थे। समाज सारासार विचार करके सत्य ग्रहणमें असमर्थ था। ऐसे समय जब सत्यज्ञान तथा भक्तिका लोप हो रहा था यह देखकर ज्ञानेश्वर महाराज व्यथित हुए। ज्ञानेश्वर महाराजकी आरतीमें श्रीरामानजार्दन गाते है — जगतमें ज्ञान हुवा लोप। हित न जाने अपना आप। अवतरित हैं पांडुरंग। कहाता है वह ज्ञानदेव। प्रकट गुह्य वह बोलता। विश्वको ब्रह्ममय करता। ज्ञानेश्वरमहाराजके रूपमें कारुण्य मूर्त हो आया था। तत्त्वज्ञानशून्य समाज अधिकाधिक बहिर्मुख होकर अनीति बढती है। यह देखकर ज्ञानेश्वर महाराज तडपते थे। उनकी यह अकुलाहट उन्हीके शब्दोंमें कहना हो तो या कीचमें फंसी गाय देखकर। नहीं देखा जाता सूखी या दुधार। उसकी जीवन व्यथा देखकर। चित्त होता व्याकुल ॥ १६-१४२ ॥ डूबतेको देखकर सकरुण। न पूछता तू अंत्यज या ब्राह्मण। जानता उसके बचाने हैं प्राण। इतना मात्र ॥ १६-१४३ ॥ वैसे अज्ञान प्रमादमें। अथवा दुर्दैव या दोषमें। सभी प्रकारके निंद्यत्वमें। जकडे गये जो ॥ १६-४४५ ॥ उन्हे अपने अंगके। भले गुण देकरके। भुलाते हैं चुभनेके। सभी शल्य ॥ १६-१४६ ॥ ज्ञानेश्वरी ८