ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 15, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंये ओवियां पर्याप्त हैं। इन ओवियोंको देखनेसे ज्ञानेश्वर महाराजके कार्यके प्रेरणास्रोत दर्शन भलीभांति हो सकता है। इसी व्याकुलताके कारण ज्ञानेश्वर महाराजने महाराष्ट्रके समाजको जागृत करके उसके हाथमें नये तत्वज्ञानकी मशाल दी। अथवा ज्ञानखड्ग हाथमें दिया। महाराष्ट्रके बहुजन समाजपर उसका अच्छा परिणाम हुवा। इस महाराष्ट्रमें ब्रह्म विद्याका सुकाल बना। क्यों कि कठिनसे कठिन समस्याएं सरल बनी थीं। गीता सुसेव्य बनी थी। अबाल सुबोध बनी थी। ज्ञानेश्वरीके तत्व-ज्ञानके कारण जीव, जगत, तथा पर- ब्रह्मका सर्वंकश विचार हुवा था। उसमेंसे सबकी अभेद-सिद्धिका दर्शन हुवा था। ज्ञानेश्वर महाराजने ज्ञानेश्वरीके तेरहवे अध्यायमें "उस ज्ञानका प्रवेश होते ही वह अविद्याका नाश करके जीव आत्माका ऐक्य करता है। इंद्रियोंके द्वारको रोकते हुए, प्रवृत्तिके पैर तोडकर मन और बुद्धिका दारिद्य रोकता है। द्वैतका अकाल दूर करता है, सर्वत्र साम्यानुभवका सुकाल होता है। मदको मारकर सभी प्रकारके अविवेक को दूर करता हुवा आप पर भेदको नष्ट करता है। यह संसारका उन्मूलन करके संकल्प-महामलको धोता हुवा अनावर ज्ञेयका दर्शन कराता है। इससे जीवकी आंखे खुलती हैं तथा जीव आनंदधाममें खेलने लगता है।" ऐसा यह ज्ञान पवित्र-संपत्ति है। इससे सदा सर्वत्र निर्मल होता है। ऐसी उज्ज्वल स्थितिको ज्ञानावस्था कहते हैं। ज्ञानेश्वर महाराजने कई जगह इस ज्ञानका सर्वांगपूर्ण विवेचन किया है। इस विवेचनको देखनेसे ज्ञानेश्वर महाराजकी वास्त- विक भूमिकाका सर्वांगपूर्ण दर्शन होता है। उन्होने कभी "दुःखं दुःखं क्षणिकं क्षणिकं" की घोषणा नहीं की। किंतु परमात्माने यह विश्व आनंदमय किया है। हम इसको आनंदमंदिर बनारखे ऐसा आवाहन किया। जीवको आनंद साम्राज्यके सिंहासन पर बिठानेकी बात कही। "विश्व है सर्वत्र सच्चिदानंद" कहा। उन्होने सारा विश्व मेरे सर्वात्मक-देवका विस्तार है। कहते हुए अपने तत्वज्ञान की नींव डाली है। उस ब्रह्मको मेरा विश्वात्मक देव कहा। इस भांति उन्होंने विश्व- और विश्वात्मककी समरसता दिखाई है। इसको उन्होने अनेक रूपकोंसे जनमानस पर बिंबित किया जैसे ज्ञानेश्वरीके चौदहवे अध्यायमें— तब कौन हूं मैं कैसी भक्ति। अव्यभिचारकी अभिव्यक्ति ॥ होना उसकी पूर्ण निश्चिति। अत्यावश्यक ॥ १४-३७२ ॥ अब सुन तू अर्जुन। यहां है मेरा क्या स्थान। रत्नमें तेज जो रत्न। वैसा हूँ मैं ॥ १४-३७३ ॥ या द्रवणवत है नीर। अवकाश है अंबर। या मिठास ही है शकर। नहीं भिन्न ॥ १४-३७४ ॥ या अग्निही है ज्वाल। दल ही है कमल। वृक्ष जो वही डाल। फलादिक ॥ १४-३७५ ॥ हिम होता जो संघटित। कहलाता वह हिमवंत। या जामन लगा दूध पार्थ। कहलाता दही ॥ १४-३७६ यहां विश्व है जो अर्जुन। स्वयं है हूं वह संपूर्ण। चंद्र बिंबका तरासना। नहीं होता जैसे ॥ १४-३७७ ॥ ९ —प्रस्तावना