भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 16

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अजी ! जमा हुआ घृत । जमकर भी रहता घृत । या कंकण रूपमें भी पार्थ । होता सोना ही ॥ १४-३७८ इसलिये विश्वत्वका निवारण । कर फिर करना मेरा ग्रहण । ऐसा नहीं जान तू यह संपूर्ण । विश्व ही मैं हूं ॥ १४-३९० ॥ इस तादात्म्यके साथ परमात्मासे समरस होना ही भक्ति है ऐसे उन्होंने भक्तिका सार- सर्वस्व कह दिया । परमात्माको संपूर्ण रूपसे विश्वके साथ जानना ही अव्यभिचारी भक्ति है । इसमें भेद करना व्यभिचार ऐसे अव्यभिचारी भक्तिका अर्थ करते समय ज्ञानेश्वर महाराजने स्पष्ट रूपसे कहा है । अर्थात् संपूर्ण तादात्म्यके साथ विश्व-सह विश्वात्मामें लीन होना ही अव्यभिचारी भक्ति है । यदि यहां विश्व तथा विश्वात्मामें भेदका दर्शन होता है तो उसको व्यभिचार समझना ! इसके लिये अभेद चित्त होकर अपने साथ आत्माको जानना चाहिये । सोनेसे सोना जडा जानेकी भांति, तेजसे तेज-किरण प्रस्फुटित होने की भांति, भूतलसे परमाणु और हिमाचलसे हिमकण प्रस्फुटित होनेकी भांति, यह विश्व और विश्वात्मा अभिन्न है। सागर और उसकी लहरकी भांति विश्व और विश्वात्मा अभिन्न है । ऐसी एकात्मकता सर्वत्र और सतत अनुभव करना अनन्य भक्ति है। इसी बातको और अधिक स्पष्ट करते समय ज्ञानेश्वर महाराज कहते हैं- ज्ञानी इसको स्व संवित्ति । शैव कहते हैं इसे शक्ति । तथा हम परम भक्ति । कहते अपनी ॥ १८-११३३ ॥ वैसे ही और एक स्थान पर कहते हैं मेरे सहज प्रकाशको भक्ति कहते हैं यह अनन्य भक्ति कैसे अद्वैत भक्ति बनती है यह अनेक दृष्टांत देकर ज्ञानेश्वर महाराजने समझाया है । एक स्थान पर वे कहते हैं जैसे तरुणी अपने तारुण्यका भोग करती है वैसे भक्त परमात्माका भोग करता है । पानी जैसे अपने सर्वांगसे बिंबका चुंबन करके प्रतिबिंंबका अपनेमें भोग करता है जैसे अलंकार स्वर्णका भोग करते है जैसे चंदन सुगंधका भोग करता है जैसे चंद्र चांदनीका भोग करता है, वैसे भक्त स्वयं परमात्मा बनकर अपनेमें अपने परमात्माका भोग करता है। यह भक्ति कोई क्रिया नहीं है किंतु एक अनुभव है । ज्ञानेश्वर महाराजने इस अनुभवका वर्णन करते हुए दस प्रकरणोंका अनुभवामृत नामका स्वतंत्र ग्रंथ ही लिखा है । इस ग्रंथमें इस अनन्य भक्तिका विस्तारके साथ विवेचन किया है जो कोई ज्ञानेश्वर महाराजके ग्रंथोंका अध्ययन करेगा उसको जीवन विश्व तथा विश्वात्माकी ओर देखनेकी एक विशिष्ट दृष्टि मिलती है । क्यों कि ज्ञानेश्वर महाराज स्वतः एक श्रेष्ठ अनुभवी संत थे । उनकी भेददृष्टि मिट गयी थी । वे सर्वत्र अभेदका अद्वयानुभव करते थे । सर्वत्र विश्वात्मक देवका दर्शन करते थे, उनको सत चित् आनंद अथवा सत्यं शिवं सुंदरम् इन भिन्न भिन्न शब्दोंसे संबोधन की जानेवाली शक्ति केवल आनंदमय बन गयी थी । इस आनंदमें सबको सम्मिलित करना यह आनंद सबको वितरण करना या यह आनंद सबको मिले ऐसा करना उनका जीवन-कार्यसा बन गया था । इसीलिये उनके साहित्यमें तर्क, कल्पना, भावना, आदिके भिन्न भिन्न सभी कार्य सर्वत्र केवल सौंदर्य निर्मितीका कारण बने हैं । शास्त्र और काव्यकी सीमारेखा पोंछ गयी है मणशक्ति चिंतनशक्ति, बुद्धि शक्ति आदि सभी शक्ति एक जीव एक रूप बनकर शुद्ध वस्तुरूपके साक्षात्कार करनेके लिये संवेदन रूप बनकर वही संवेदन जीवनमें ओतप्रोत बन गया था । यही संवेदनशील हृदय शब्दका आकार बनकर प्रकट होता जाता था । तथा ज्ञानेश्वरी २०