ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 17, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंसमय समय पर उनके मुखसे "साराही संसार सुखका करूंगा मोदसे भरूँगा तीनों लोक ॥" ऐसे प्रतिज्ञा वचन उमड पडते थे । उनके हृदयकी मृदु मधुरता इतनी व्यापक थी कि इतने बडे ग्रंथमें कहीं भी दुरुक्ति नहीं, कहीं भी किसी भी सांप्रदायिक बातका आग्रह नहीं, किसी भी मतका खंडन नहीं; शुष्क विद्वत्ताका अभिनिवेश अथवा प्रदर्शन नहीं । ज्ञानेश्वरीकी प्रसाददानकी ओवियोंमें उनकी सद्भावनाकी व्यापकताका मंगलमय दर्शन होता है। वे अपने विश्वात्मकगुरुदेवसे प्रसाददान मांगते हुए कहते है " हे मेरे विश्वात्मक देव ! इस वाग्यज्ञसे संतुष्ट होकर आप मुझे यह प्रसाददान दें कि जिससे खलोंकी कुटिलताका अंत हो, उनमें सत्कर्म रतिकी आस्था हो, दुरितका अंधःकार मिटकर सर्वत्र स्वधर्म-सूर्यका उदय हो, सभी प्राणियोंको इच्छित-वर मिले; ईश्वर-निष्ठोंके समुदाय मंगलकी वर्षा करते हुए सर्वत्र संचार करें, सर्वत्र सभी सज्जनही हों! वे सब चलते कल्पतरु, बोलते अमृत निर्झर तथा चेतन चिंतामणिकी खानसे बने ! ये सज्जन अलांछित चंद्रमासे, ताप रहित सूर्यसे, सबके आप्त बने और सब आदिपुरुषमें अखंडरूपसे दत्त चित्त होकर शाश्वत सुख अनुभव करें!" इन्ही शब्दोंमें ज्ञानेश्वरी ग्रंथ समाप्त होता है। अर्थात ज्ञानेश्वरीका उगम इन्ही भावनाओंसे हुवा है। इन्ही भावना ओंके तानेबानेसे वह बुना गया है, और अंतमें इन्ही भावनाओंमें डूब गया है। इन भावनाओंके स्पर्शके बिना इस ग्रंथका मूल्यांकन करना असंभवसा है। अनुवाद और अनुवादक — तत्वज्ञानी संत और उनके तत्वज्ञानको देश-काल तथा भाषाकी मर्यादायें कभी नहीं होती यद्यपि कुछ नैसर्गिक कारणोंसे कुछ समय यह प्रवाह अवरुद्ध सा रहता है। कोई भी तत्वज्ञान हो वह आखिर किसी न किसी भाषामें कहना या लिखना पडता है। कालभेद, स्थलभेद, तथा भाषाभेदके कारण वह भाषा सबको अवगत होना शक्य नहीं होता । परिणामस्वरूप सामान्य जनता उस ज्ञानसे वंचित रहती है। इसीलिये एक भाषामें कहे गये ऐसे अनुभवी तत्वज्ञानका दूसरी भाषामें अनुवाद करना आवश्यक होता है। उपनिषद गीता आदि ग्रंथोंका ऐसे अनुवाद सभी भाषाओंमें हुए है। वैसेही ज्ञानेश्वरी एक अवतारी पुरुषद्वारा भगवतगीता पर लिखागया एक भाष्य है जिससे वह ज्ञान सबको उपल- ब्ध हो, सबको प्रिय हो, सब उसको सहज पचा सके और सारा विश्व उससे कृतकृत्य हो । यद्यपि यह सब मराठी भाषामें कहा गया है फिर भी उसका तत्वज्ञान कभी किसी भाषाके आवरणमें बँध नहीं जाता। वह सूर्यसा सर्वकष होता है। किंतु उसका सही अनुवाद होना अत्यंत आवश्यक होता है। हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है। श्रीज्ञानेश्वरीका राष्ट्रभाषामें अनुवाद करनेका अत्यंत उपयुक्त, आवश्यक, तथा अत्यंत कठिन काम, हमारे मित्र, दे. म. श्री बाबूराव कुमठेकरने किया है। उनके कार्यका मूल्यांकन करना आसान नहीं है। क्यों कि यह कार्य वैसेही महत्त्वका है। प० पू० वै.वा. ह. भ. प. आचार्य श्री शं. वा. दांडेकरजी कुमठेकरजीके कार्यके विषयमें अपने एक पत्रमें लिखते हैं। "भारतको स्वातंत्र्य मिला और नेताओंने भाषिक राज्य रचनाका प्रयोग करनेका निश्चय किया किंतु इसका एक अकल्पित परिणाम यह दीखने लगा कि उससे द्वैत ही बढा । यहांतक कि नेतलोग भी यह सोचने लगे देशकी एकात्मकता टूट जायेगी ! " इस आपत्तिका सदाके लिये दूर करनेके जो अनेक उपाय हैं उनमें एक महत्त्वका उपाय राष्ट्रभाषामें भिन्न भिन्न भाषाओंके उत्कृष्ट वाङ्मयका आविष्कार करना है; और विश्वमें संत साहित्य ही एक ऐसा साहित्य है जो विश्वैक्यकी भाषा बोलता है तथा यही एक ११ —प्रस्तावना