ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविचार प्रकट करता है। संत एक परिवार हैं। संत, फिर कहीं भी जन्म ले अथवा कभी जन्म लें वह एकही भाषा बोलता है और एक ही तत्त्व कहता है। "ऐसे संत साहित्यका हिंदी आविष्कार होकर संतोंका संदेश भारतके घर घर पहुंचकर भारतकी एकता दृढ होनेमें मदद हो इस भावनासे श्री कुमठेकरने संत साहित्य सदनका काम उठाया है।" किसी भी भाषाके काव्यका अन्य भाषामें भाषांतर करनेके लिये, वह भी समवृत्तमें, दोनों भाषाओंपर उत्तम प्रभुत्व होना आवश्यक होता है, यहां, केवल भाषाप्रभुत्वका पाथेय भी अधूरा ही होता है। यह तत्त्वज्ञानका ग्रंथ होनेसे उस शास्त्रके गूढ प्रमेयोंका आकलन होनेके लिये उसका भी पूर्ण अभ्यास करना आवश्यक है। उसके प्रति अनन्य निष्ठा, उतनी ही आत्मीयता, और कार्य सातत्यशक्तिकी आवश्यकता होती है। क्यों कि ऐसे काम सामान्य प्रयत्नोंसे सेतमेंतमें होनेवाले काम नहीं हैं। बडे बडे विद्वानोंकी भी बुद्धि कुंठित करनेवाली नौ हजार ओवियां; उनमें स्वयंप्रभ, मौलिक, निगूढ तत्त्वज्ञानके इस महान ग्रंथका भाषांतर करना आसान नहीं है। प्रत्येक शब्दोमेंसे ग्रंथका शब्दसौंदर्य, ध्वनिमाधुर्य, अर्थ गांभीर्य, तथा ग्रंथकर्ताके भावको व्यक्त करना अत्यंत कठिन कार्य है। ज्ञानेश्वरीका कथन करते समय जैसे समय स्वयं ज्ञानेश्वरमहाराज कहते हैं - उन अक्षरोंका जो है भाव । पहुंचाऊंगा आपके ठाव । कहता सुनिये ज्ञानदेव । निवृत्तिका दास ॥ १४-४१५ ॥ यह सब होनेके लिये मूल ग्रंथकारके हृदयमें प्रवेश करना पडता है, उनका अंतरंग खोजना पडता है, उनकी भावनाओंसे समरस होना पडता है, उनमें तद्रूप तन्मय होना पडता है, तभी मूल ग्रंथकारका हृदय अपने शब्दोंसे अभिव्यक्त किया जा सकता है ! इसके साथ साथ आवश्यकता है भाषाप्रभुत्वकी ! श्रीकुमठेकरका अनुवाद देखनेसे ऐसा लगता है ऊपरकी बातोंमें वे पर्याप्त यशस्वी हुये हैं। खास करके, मराठी या हिंदी दोनोंही श्रीकुमठेकरकी मातृभाषायें नहीं है। इन दोनो भाषाओंका व्याकरणशुद्ध अभ्यास करके उन्हे यह काम करना पडा है। इसके पहले भी ज्ञानेश्वरीके दो तीन अनुवाद हो चुके हैं। किंतु वे केवल भाषांतर या रूपांतरसे हैं। यह अनुवाद समवृत्तमें है। ओवीवृत्त हिंदीमें नहीं है यह मराठीका सर्वजनसुलभ अपना वृत्त है। उसमें गण मात्रदिका विशेष बंधन नहीं है। उसके साडेतीन या साडेचार चरण होते हैं। यद्यपि हिंदी भाषामें ओवी छंद नहीं है अनुवादकने हिंदीमें ओवी छंदकी रचना करके ज्ञानेश्वरी जैसे अद्वितीय ग्रंथ, समवृत्तमें हिंदीमें अनुवाद करनेकी अपनी जिद्द अत्यंत सामर्थ्यके साथ पूरी की है। साथ साथ ज्ञानेश्वरमहा- राजकी भाषा सूत्रमय है। "अल्पाक्षरमसंदिग्धं सारवद्विश्वतोमुखं !" यह सूत्रका लक्षण है। सूत्रमें अक्षर थोडे और अर्थ विस्तृत होता है। ऐसे अर्थपूर्ण अक्षरोंका गिनतीके उतनेही अक्षरोंमें, वही भाव और अर्थ प्रकट करना और उसी शब्द-सौंदर्य और नाद-माधुर्यके साथ, यह आसान काम नहीं है। अनुवादक इसमें भी पर्याप्त यशस्वी हुए हैं। उनके इस यशके विषयमें महा- राष्ट्रके अत्यंत विद्वान तथा प्रसिद्ध समालोचक प्रो. न. र. फाटक अपने एक पत्रमें लिखते है " हिंदीमें ओवी छंद नहीं है। फिरभी हिंदीमें उस भाषाकी दृष्टिसे अनुकूल हो ऐसा, मराठी ओवी छंदको नया रूप देकर स्व-रचित नये वृत्तमें, ज्ञानेश्वरी जैसे प्रासादिक वेदांत काव्य ग्रंथका, मूलके समान, उतनाही सशक्त और सरल अनुवाद करके, मानो महाराष्ट्र सारस्वतका हृदय ही अन्य भाषिके भाव-जीवनसे जोडकर श्री कुमठेकरने ज्ञानेश्वरी १२