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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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महान कार्य किया है।.......श्री कुमठेकरका किया हुवा ज्ञानेश्वरीका हिंदी अनुवाद देख कर ऐसा लगता है “ ज्ञानेश्वरी मूलमें ही हिंदीमें लिखी गयी हो !” प्रो० न०र० फाटकके इस कथनमें यत्किंचित अत्युक्ति नहीं है। इतनाही नहीं श्री कुमठेकरने अकारादि विषयानुक्रमणिका, विषयसूचि तथा अनेक परिशिष्टादि द्वारा अध्येताओंके लिये यह ग्रंथ अत्यंत सुलभ बना दिया है। ज्ञानेश्वरी अभ्यास करने जैसा ग्रंथ है । अभ्यास करनेवालोंके लिये श्री कुमठेकरने यह ग्रंथ अत्यंत सुलभ बना दिया है। विशेष कर, विशिष्ट शब्दोंके विशेष विवेचन द्वारा तथा विशिष्ट प्रकारके शब्द कोश द्वारा भी पुस्तकको सर्वांग पूंण तथा सर्वांग सुंदर बनानेमें अनुवादकने अत्यंत परिश्रम किये हैं। वस्तुतः श्री कुमठेकरका पूर्वांयुष्य सारा राजनैतिक क्षेत्रमें बीता है। यदि वे चाहते तो स्वातंत्र्योत्तर कालमें किसीके पिछ लग्गू बन कर किसी बडे अधिकारके स्थान पर विराजमान हो सकते थे। किंतु उनको इस मोहने स्पर्श भी नहीं किया। जब अन्य सब राजनैतिक क्षेत्रकी ओर धंस रहे थे ,तब उन्होने वह क्षेत्र छोडकर अपना जीवन संतकार्यमें दे दिया और अत्यंत निष्ठासे वे इस कार्यमें दत्तचित्त हैं। इसी एक बातसे उनके अंतरंगका दर्शन हो सकता है; उसकी पूर्ण कल्पना आ सकती है। महाराष्ट्रीय संतोके दिव्य अध्यात्मिक वाङ्मयका उतना ही समर्थ अनुवाद द्वारा हिंदी साहित्य संपदाको समृद्ध करके उन्होने जैसे हिंदी भाषिकोकों चिरऋणी बना रखा है वैसे ही उनका कार्य महाराष्ट्रको भी भूषण भूत है । इसमें महाराष्ट्रका महान गौरव है। हमें पूर्ण विश्वास है कि हिंदीका भावुक वाचक-वर्ग तथा महाराष्ट्रीय इसको मान्य करेंगे। श्रीकुमठेकरके इस ऋणसे मुक्त होनेका प्रयास करेंगे। श्री कुमठेकरके इस कार्यके विषयमें, दो वर्ष प्रथम वैकुंठवासी बने हुए पौर्वात्य पाश्चात्य विद्या-विभूषित, महाराष्ट्रके वारकरी संप्रदायके ज्येष्ठ श्रेष्ठ अध्वर्यु, प. पू. आचार्य श्री शं. वा. दांडेकरजीने प्रशस्ति पत्र देकर गौरव किया था। इस परसे श्री कुमठेकरके कार्यका महत्व समझमें आएगा। आचार्य श्री दांडेकरने इस अनुवादको देखा था। उन्होने भी इस अनुवादकी प्रशंसा की थी। वे ज्ञानेश्वरीके एक विद्वान भाष्यकार थे । यह अनुवाद कब प्रसिद्ध होगा इसकी उनको तडप थी । वास्तविक इस अनुवादकी प्रस्तावना उन्हीको लिखनी थी किंतु काल प्रवाहमें उन्हे यह शक्य नहीं हुवा। फिर भी यह अनुवादकका सुदैव ही समझना चाहिए कि आचार्य श्री दांडेकरकीं प्रशस्ति-उनको मिली। वैसेही महाराष्ट्रमें अन्य अनेक विद्वान अधिकारी पुरुष होने पर भी इस ग्रंथकी प्रस्तावना लिखनेका दायित्वपूर्ण काम मुझ जैसे सामान्य व्यक्तिको क्यों सौंपा गया यह भी मैं समझ नहीं पाया किंतु श्री. बाबुराव कुमठेकर के प्रेमाग्रहके कारण यथाशक्ति इन सर्वांगपूर्ण ग्रंथ पर प्रस्तावणारूप चार शब्द लिखे हैं। अंतमें ज्ञानेश्वर महाराजके पुनः पुनः आगे इससे। इस ग्रंथ पुण्य संपतिसे। सर्वभूत सर्व सुखसे। होना है संपूर्ण ॥ १८-१८०८ ॥ इन शब्दोंमे यह प्रस्तावना समाप्त करता हूँ ।