ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः । मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥२३॥ पर स्वधर्म रत हूं कैसा । सकाम रत रहता वैसा । पार्थ उसका उद्देश्य ऐसा । एक ही है ॥ ६४ ॥ प्राणि मात्र यहां सकल । हमारे आधीन केवल । जिससे रहे वे सरल । स्वधर्ममें रत ॥ ६५ ॥ उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् । संकरस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः ॥२४॥ हम हैं पूर्ण काम होकर । आत्मस्थितिमें ही रह कर । करेगी कैसी प्रजा संसार । पार सकल ॥ ६६ ॥ हमारा ही आचरण देखना । उसीका अनुकरण करना । है यह प्रजा-जनका अपना । नियम जैसा ॥ ६७ ॥ इसीलिये जो हैं समर्थ । तथा सर्वज्ञतासे युक्त । कर्म त्याग नहीं उचित । उसको कभी ॥ ६८ ॥ सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत । कुर्याद्विद्वांस्तथाऽसक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम् ॥२५॥ अर्जुन फलकी आशासे । आचरता कामुक जैसे । कर्म रत रहता वैसे । निरिच्छ ही ॥ ६९ ॥ बड़ोंको सुन पार्थ । सकल लोक-संस्था । रक्षणीय है सर्वथा । इसीलिये ॥ १७० ॥ न रहूं मैं कर्म-लीन तजके यदि आलस । चलेंगे लोगभी ऐसे सर्वथा इस मार्गसे ॥ २३ ॥ छोडूंगा यदि मैं कर्म होगा विनाश लोकका । बनूंगा संकर द्वारा प्रजाका नाश-कारण ॥ २४ ॥ फंसके करता अज्ञ ज्ञानीको मुक्त भावसे । करना कर्म वैसे ही लोक-संग्रह हेतुसे ॥ २५ ॥ ९३ कर्मयोग