भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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शास्त्रोचित ही बरतना । विश्वको सुपथ बताना । अलौकिक नहीं बनना । लोगोंमें कभी ॥ ७१ ॥ न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् । जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन् ॥ २६॥ आयाससे जो स्तन्य पीता । वह पक्वान्न कैसे खाता । शिशुको नहीं दिया जाता । कभी मिष्टान्न ॥ ७२ ॥ वैसे कर्ममें अयोग्यता । उससे कभी नैष्कर्म्यता । विनोदमें भी न कहता । अर्जुन कभी मैं ॥ ७३ ॥ लोक संग्रहार्थ कुशलता पूर्वक कर्म— उन्हे सत्कर्ममें लगाता । उनकी प्रशंसा करता । आचरण कर दिखाता । नैष्कर्म्यका ॥ ७४ ॥ सदा जो लोक संग्रहार्थ । रहता है कर्ममें रत । वह कर्म बंध रहित । रहता है ॥ ७५ ॥ बहुरूपियोंके राजारानीको जैसे । न चिपकता स्त्री पुरुष-भाव वैसे । लोक-संग्रहार्थ कर्म-रत होनेसे । नहीं है कर्म बंधन ॥ ७६ ॥ प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः । अहंकारविमूढात्मा कर्ताऽहमिति मन्यते ॥ २७॥ अजी दूसरेका है भार । यदि अपने सिर पर । लिया तो उसका असर । न होगा क्या ॥ ७७ ॥ वैसे हैं शुभाशुभ कर्म । उपजाता प्रकृति-धर्म । उसको मूर्ख-मति-भ्रम । कहता "मैंने किया" ॥ ७८ ॥ अहंकार पर आरूढ । ऐसा जो संकुचित मूढ । उसको परमार्थ गूढ़ । कहना नहीं ॥ ७९ ॥ अबोध कर्म-निष्ठोंका बुद्धि भेद करो नहीं । जगावो कर्ममें चाव करके साम्य भावसे ॥ २६ ॥ होते हैं कर्म जो सारे प्रकृतिके स्वभावसे । अहंकारी बना मूढ मानता करता स्वयं ॥ २७ ॥ ज्ञानेश्वरी ९४

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