भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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यह है जो प्रस्तुत । कहा तुझसे हित । पार्थ दे कर चित्त । सुन सब ॥ १८० ॥ तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः । गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते ॥२८॥ अजी है तत्त्वज्ञानियोंका चित्त । होता प्रकृतिसे अप्रभावित । इस प्रकृतिमैसे कर्म जात । होते उत्पन्न ॥ ८१ ॥ देहाभिमान वे तजकर । गुण कर्मको ही पारकर । रहते साक्षी रूप होकर । शरीरमें ही ॥ ८२ ॥ अजी शरीरधारी होकर भी । कर्म-बंधसे मुक्त होते तभी । जैसे लिप्त न होता सूर्य कभी । विश्वके कर्मसे ॥ ८३ ॥ प्रकृतेर्गुणसंमूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु । तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्नविचालयेत् ॥२९॥ गुण संग्राममें जो घिरकर । तथा प्रकृतिके वश होकर । रत होता कार्यमें निरंतर । वही कर्म बद्ध ॥ ८४ ॥ इंद्रियां सदा गुणाधार । करती अपना व्यापार । पर कर्म अपने पर । लेते वे बद्ध ॥ ८५ ॥ मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा । निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः ॥३०॥ गुण ये और ये कर्म इससे भिन्न मान मैं । रहे असंग तत्वज्ञ गुणमें गुण आचर ॥ २८ ॥ डूबे जो गुण कर्मोंमें प्रकृति गुणसे ठगे । ऐसे अल्पज्ञ मूढ़ोंको ज्ञानी भ्रांत करे नहीं ॥ २९ ॥ मुझे अध्यात्म बुद्धिसे कर सर्व समर्पण । फलाशा ममता सारी छोडके जूझ तू यहां ॥ ३० ॥ ९५ कर्मयोग