ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउठो, स्वधर्माचरणार्थ कर्म करो- उचित कर्म सभी कर । उन्हें मुझे अर्पण कर । चित्त वृत्तिको लीन कर । आत्मामें ही ॥ ८६ ॥ कर्म कर्तृत्वका भान । औ' उसका अभिमान । न कर कभी अर्जुन । मनमें भी ॥ ८७ ॥ शरीरासक्तिको छोड़ना । कामना सबको त्यजना । समयपे फिर भोगना । प्राप्त भोग ॥ ८८ ॥ कोदंड लेकर अब करमें । चढ़ कर बैठा अब रथमें । अलिङ्गन कर वीर वृत्तिमें । शांत भावसे ॥ ८९ ॥ विश्वमें कीर्तिको फैलाओ । स्वधर्मका मान बढ़ावो । पापके भारसे छुडावो । पृथ्वीको अब ॥ ९० ॥ अर्जुन ! संदेहको छोड़ दो । संग्राममें ही अब चित्त दो । अन्य कछु बोलना त्यज दो । अबसे फिर ॥ ९१ ॥ ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः । श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः ॥ ३१ ॥ : आत्म रत कर्मसे विकास, प्रकृति तंत्र कर्मसे विनाश- यह है मेरा मत यथार्थ । अत्यादरसे आचरणार्थ । निष्ठा पूर्वक अनुष्ठानार्थ । कहा अर्जुन ॥ ९२ ॥ सकल कर्ममें हो रत । ऐसा होना कर्म रहित । इसीलिये यह निश्चित । है करणीय ॥ ९३ ॥ ये त्वेतदभ्यसूयंतो नानुतिष्ठन्ति मे मतम् । सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः ॥ ३२ ॥ मेरा शासन जो नित्य मानते हैं निर्मत्सर । श्रद्धासे अज्ञ निष्पाप तोडते कर्म-बंधन ॥ ३१ ॥ किंतु मत्सर-बुद्धिसे मेरा शासन तोड़ते । वे ज्ञान-शून्य जो मूढ पाते हैं नाश निश्चित ॥ ३२ ॥ ज्ञानेश्वरी ९६