भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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वैसे तो सुन अर्जुन । शरीर है पराधीन । नाना भोग क्यों निर्माण । करें सब ॥ ५ ॥ आयास करके बहुत । सकल ही समृद्ध जात । इस देहको अनवरत । पाले क्यों ? ॥ ६ ॥ सर्वस्व तज कर । संपत्तिको पाकर । स्वधर्म छोड़कर । पालना देह ॥ ७ ॥ फिर है यह पंच मेलका । अनुसरेगा पंच तत्वका । तब अपने किये श्रमका । मूल्य क्या है ? ॥ ८ ॥ केवल शरीर पोषण । धोखा मान असाधारण । इस पर अतःकरण । न देना कभी ॥ ९ ॥ इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ । तयोर्न वशमागच्छेत् तो ह्यस्य परिपन्थिनौ ॥ ३४ ॥ इसलिये स्वधर्माचरण ही करना— वैसे इंद्रियोंके हितार्थ । विषय दिये नियमित । होगा संतोषित चित्त । यह है सच ॥ २१० ॥ किंतु जैसे सभ्य चोरका साथ । केवल समाजमें है विश्वस्थ । निश्चित ही है करता जो घात । एकांत आते ही ॥ ११ ॥ अजी विषकी है मधुरता । उपजाती चितमें ममता । परिणाममें भयंकरता । प्राणहारी ॥ १२ ॥ जैसे कंटियामें लगाया आमिष । भुलाता है मीनको दिखाके आस । वैसे भुलाते हैं विषय सुखाश । इंद्रियोंको ॥ १३ ॥ आमिषमें कांटिया होती । प्राणको वह हर लेती । आमिषमें वह छिपी होती । न जानता मीन ॥ १४ ॥ वैसे यहां अभिलाषामें होगा । यदि विषयकी आशा करेगा । अभिलाषासे है बलि जायेगा । क्रोधानलका ॥ १५ ॥ इंद्रियोंके स्व-अर्थोंमें रहते राग द्वेष हैं । उन्हें वश नहीं होना देहीके पथ-शत्रु वे ॥ ३४ ॥ ज्ञानेश्वरी ९८