भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 167, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 167

शिकारी जैसे घेरकर। देखता है सु-अवसर । मारनेमें रहे तत्पर । मृगको सदा ॥ १६ ॥ यहां ऐसा ही होता है । संग उचित नहीं है । पार्थ काम औ' क्रोध है । अति घातुक ॥ १७॥ उसका आश्रय नहीं करना । मनमें स्मरण भी न धरना । ल्लान नष्ट नहीं होने देना । स्वधर्मकी ॥ १८ ॥ श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् । स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥ ३५ ॥ स्वधर्ममें मृत्यु भी श्रेष्ठ है— अजी ! स्वधर्म जो है अर्जुन । यदि आचरणमें कठिन । किंतु उसीका है अनुष्ठान । शुभदायक ॥ १९॥ यदि पराया आचार । देखनेमें है सुंदर । किंतु करना स्वीकार । अपना ही ॥ २२० ॥ शूद्रके घरके मिष्टान्न । खाये कैसे वह ब्राह्मण । हुआ भी है अति उद्विग्न । भूखसे ॥ २१ ॥ करना कैसे अनुचित । अनुचित इच्छाको प्राप्त । इच्छा हुई तो अनुचित । वह साधना क्या ? ॥ २२ ॥ दूसरोंका घर सुंदर । देखके अपना कुटीर । करें गिरानेका व्यापार । उचित क्या ? ॥ २३ ॥ अजी ! है अपनी सती । यदि कुरूप भी होती । संसारमें वही गति । वैसे ही यह ॥ २४ ॥ चाहे जैसे असुविधा-जनक । आचरणमें कष्ट-दायक । फिर भी स्वधर्म ही है तारक । इह परमें ॥ २५ ॥ अल्प भी अपना धर्म सु-सेव्य पर-धर्मसे । स्वधर्ममें भला मृत्यु पर-धर्म भयंकर ॥ ३५ ॥ ९९ कर्मयोग