भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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बिन कीचडके ये गाड़ते । बिन पाशके भी हैं कसते । किसीके हाथमें न आते । काबू कभी ॥ ५९ ॥ धूमेनाव्रियते वह्निर्यथाऽऽदर्शो मलेन च । यथोल्बेनाऽवृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम् ॥ ३८ ॥ चंदन वृक्षमें जैसे । लिपट रहता साप वैसे । या खोल रहता जैसे । गर्भ पर ॥ २६० ॥ या प्रभाके बिन भानु । हुताशन धूमके बिनु । या दर्पण मल हीन । कहीं न रहता ॥ ६१ ॥ ज्ञानके पास ये दुष्ट आ बसते हैं— इनके बिन ज्ञान नहीं । न देखा है हमने कहीं । भूसेके बिन बीज नहीं । उपजता जैसे ॥ ६२ ॥ आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा । कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च ॥ ३९ ॥ वैसे ज्ञान है विशुद्ध । किंतु इनसे प्ररुद्ध । तभी है हुआ अगाध । पानेमें वह ॥ ६३ ॥ पहले इनको है जीतना । फिर ज्ञानको प्राप्त करना । इनका पराभव करना । कष्ट साध्य ॥ ६४ ॥ जब इनको जीतनेमें । घल लावे तब तनमें । ईंधन डालनेसे आगमें । जैसे बढती ॥ ६५ ॥ इन्द्रियाणि मनोबुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते । एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम् ॥ ४० ॥ ढका है धूमसे अग्नि जैसे दर्पण धूलसे । जेरीसे घिरता गर्भ वैसे है ज्ञान कामसे ॥ ३८ ॥ काम-रूप महा अग्नि न होता तृप्त जो कभी । ज्ञानीका तो नित्य-शत्रु उसने ज्ञानको ढका ॥ ३९ ॥ इंद्रियां मन औ'बुद्धि इनका आसरा लिये । छिपाके ज्ञान जीवोंका करता मोह-ग्रस्त जो ॥४०॥ १०३ कर्मयोग

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