ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 170, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंइनकी भूखकी अभिलाष । जो कहती विश्वं है एक ग्रास । इसकी प्रबंधक है आस । जो असीम ॥ ४६ ॥ लीलामें जब यह मुट्ठी कसती । चौदहों भुवनोंको ओछा मानती । इसकी भगिनी भ्रांति कहलाती । अति लाड़ली ॥ ४७ ॥ कौर बनाकर इक लोकत्रयका । खेल खेलती सहज निगलनेका । दासी-पनमें इठलाती है भ्रांतिका । तृष्णा वहां ॥ ४८ ॥ होता है वहां मोहका सम्मान । जिससे अहंका है लेन-देन । सर्वत्र करता तांडव महान । चातुर्यसे जो ॥ ४९ ॥ सत्यका जिसने सार निकाल कर । उसमें अकृत्यका भूसा भरकर । दंभ रूढ किया वह विश्वभर । इसने ही ॥२५० ॥ साध्वी शांतिको सुन नग्न किया । हत्यारी मायाका श्रृंगार किया । साधु समाजको भ्रष्ट कराया । उनसे यहां ॥ ५१ ॥ नींव मिटा दी विवेककी । खाल उतारी वैराग्यकी । गर्दन तोड़ दी निग्रहकी । जीते जी ॥ ५२ ॥ उजाड़ा संतोष वनको । गिराया धैर्यके दुर्गको । उखाड़ा आनंद गाछको । जग भरमें ॥ ५३ ॥ उखाड़ा बोध पौधको । पोंछा सुखकी लिपिको । हियमें जलायी आगको । तापत्रयकी ॥ ५४ ॥ देहके साथ ये पैदा हुए । जीवके साथ ये जुड़ गए । न मिलते बैठे छिपे हुए । ब्रह्मको भी ॥ ५५ ॥ रहते हैं चैतन्यके पडोसमें । बैठते हैं ज्ञानके ही पंगतमें । उठते हैं कुहराम मचानेमें । तब रुकते नहीं ॥ ५६ ॥ शस्त्रके बिन ये मारते । डोरके बिन हैं बांधते । ज्ञानियोंको तो मिटा देते । प्रतिज्ञापूर्वक ॥ ५७ ॥ जल बिन ये डुबोते हैं । आगके बिन जलाते हैं । मौन रह लपेटते हैं । प्राणिमात्रको ॥ ५८ ॥ ज्ञानेश्वरी १०२