भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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स्वयं पापसे हैं हटते । सर्वस्वसे अलिप्त होते । फिर उसीमें आ पचते । बलात्कारसे ॥ ३६ ॥ जिससे अरुचि है मनसे । वे ही आ चिपकते चितसे । टालना चाहें सतत जिसे । वही लिपटते हैं ॥ ३७ ॥ दीखता यहां बलात्कार । यहां चलता किसका जोर । जानना चाहूं चक्रधर । कहता पार्थ ॥ ३८ ॥ हृदय कमलका आराम । योगियोंका जो निष्काम । कहता है श्री पुरुषोत्तम । कहता हूं सुन ॥ ३९ ॥ भगवान उवाच काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः । महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् ॥ ३७ ॥ इसका मूल रजोगुण— अजी ! सुन ये कामक्रोध जो हैं । इनमें दयाका नाम नहीं है। ये कृतांत यमके ही सम हैं । मान ले तू ॥ ३४० ॥ ये हैं ज्ञान निधिके भुजंग । विषय काननके हैं बाघ । भजन मार्गके हैं ये मांग । अति घातुक ॥ ४१ ॥ ये हैं देह दुर्गके आधार । इंद्रिय ग्रामके सरदार । अविवेक करते गदर । विश्वमें सब ॥ ४२ ॥ रजो गुण है मनका । मूल है असुरताका । पोषण किया इनका । अविद्याने ॥ ४३ ॥ यदि हैं ये रजसे संपन्न । किंतु हैं तमसे भी अभिन्न । तभी उसने दिया आसन । प्रमाद मोहका ॥ ४४ ॥ मृत्यु नगरके भीतर । मान है इनका अपार । करते जीवनका वैर । इसीलिये ॥ ४५ ॥ श्री भगवानने कहा यह तो काम औ' क्रोध जो रजो-गुणसे बने । बडे खाऊ तथा पापी वैरी हैं जान तू इन्हे ॥ ३७ ॥ १०१ कर्मयोग