ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
स्वयं पापसे हैं हटते । सर्वस्वसे अलिप्त होते । फिर उसीमें आ पचते । बलात्कारसे ॥ ३६ ॥ जिससे अरुचि है मनसे । वे ही आ चिपकते चितसे । टालना चाहें सतत जिसे । वही लिपटते हैं ॥ ३७ ॥ दीखता यहां बलात्कार । यहां चलता किसका जोर । जानना चाहूं चक्रधर । कहता पार्थ ॥ ३८ ॥ हृदय कमलका आराम । योगियोंका जो निष्काम । कहता है श्री पुरुषोत्तम । कहता हूं सुन ॥ ३९ ॥ भगवान उवाच काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः । महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् ॥ ३७ ॥ इसका मूल रजोगुण— अजी ! सुन ये कामक्रोध जो हैं । इनमें दयाका नाम नहीं है। ये कृतांत यमके ही सम हैं । मान ले तू ॥ ३४० ॥ ये हैं ज्ञान निधिके भुजंग । विषय काननके हैं बाघ । भजन मार्गके हैं ये मांग । अति घातुक ॥ ४१ ॥ ये हैं देह दुर्गके आधार । इंद्रिय ग्रामके सरदार । अविवेक करते गदर । विश्वमें सब ॥ ४२ ॥ रजो गुण है मनका । मूल है असुरताका । पोषण किया इनका । अविद्याने ॥ ४३ ॥ यदि हैं ये रजसे संपन्न । किंतु हैं तमसे भी अभिन्न । तभी उसने दिया आसन । प्रमाद मोहका ॥ ४४ ॥ मृत्यु नगरके भीतर । मान है इनका अपार । करते जीवनका वैर । इसीलिये ॥ ४५ ॥ श्री भगवानने कहा यह तो काम औ' क्रोध जो रजो-गुणसे बने । बडे खाऊ तथा पापी वैरी हैं जान तू इन्हे ॥ ३७ ॥ १०१ कर्मयोग
इनकी भूखकी अभिलाष । जो कहती विश्वं है एक ग्रास । इसकी प्रबंधक है आस । जो असीम ॥ ४६ ॥ लीलामें जब यह मुट्ठी कसती । चौदहों भुवनोंको ओछा मानती । इसकी भगिनी भ्रांति कहलाती । अति लाड़ली ॥ ४७ ॥ कौर बनाकर इक लोकत्रयका । खेल खेलती सहज निगलनेका । दासी-पनमें इठलाती है भ्रांतिका । तृष्णा वहां ॥ ४८ ॥ होता है वहां मोहका सम्मान । जिससे अहंका है लेन-देन । सर्वत्र करता तांडव महान । चातुर्यसे जो ॥ ४९ ॥ सत्यका जिसने सार निकाल कर । उसमें अकृत्यका भूसा भरकर । दंभ रूढ किया वह विश्वभर । इसने ही ॥२५० ॥ साध्वी शांतिको सुन नग्न किया । हत्यारी मायाका श्रृंगार किया । साधु समाजको भ्रष्ट कराया । उनसे यहां ॥ ५१ ॥ नींव मिटा दी विवेककी । खाल उतारी वैराग्यकी । गर्दन तोड़ दी निग्रहकी । जीते जी ॥ ५२ ॥ उजाड़ा संतोष वनको । गिराया धैर्यके दुर्गको । उखाड़ा आनंद गाछको । जग भरमें ॥ ५३ ॥ उखाड़ा बोध पौधको । पोंछा सुखकी लिपिको । हियमें जलायी आगको । तापत्रयकी ॥ ५४ ॥ देहके साथ ये पैदा हुए । जीवके साथ ये जुड़ गए । न मिलते बैठे छिपे हुए । ब्रह्मको भी ॥ ५५ ॥ रहते हैं चैतन्यके पडोसमें । बैठते हैं ज्ञानके ही पंगतमें । उठते हैं कुहराम मचानेमें । तब रुकते नहीं ॥ ५६ ॥ शस्त्रके बिन ये मारते । डोरके बिन हैं बांधते । ज्ञानियोंको तो मिटा देते । प्रतिज्ञापूर्वक ॥ ५७ ॥ जल बिन ये डुबोते हैं । आगके बिन जलाते हैं । मौन रह लपेटते हैं । प्राणिमात्रको ॥ ५८ ॥ ज्ञानेश्वरी १०२
बिन कीचडके ये गाड़ते । बिन पाशके भी हैं कसते । किसीके हाथमें न आते । काबू कभी ॥ ५९ ॥ धूमेनाव्रियते वह्निर्यथाऽऽदर्शो मलेन च । यथोल्बेनाऽवृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम् ॥ ३८ ॥ चंदन वृक्षमें जैसे । लिपट रहता साप वैसे । या खोल रहता जैसे । गर्भ पर ॥ २६० ॥ या प्रभाके बिन भानु । हुताशन धूमके बिनु । या दर्पण मल हीन । कहीं न रहता ॥ ६१ ॥ ज्ञानके पास ये दुष्ट आ बसते हैं— इनके बिन ज्ञान नहीं । न देखा है हमने कहीं । भूसेके बिन बीज नहीं । उपजता जैसे ॥ ६२ ॥ आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा । कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च ॥ ३९ ॥ वैसे ज्ञान है विशुद्ध । किंतु इनसे प्ररुद्ध । तभी है हुआ अगाध । पानेमें वह ॥ ६३ ॥ पहले इनको है जीतना । फिर ज्ञानको प्राप्त करना । इनका पराभव करना । कष्ट साध्य ॥ ६४ ॥ जब इनको जीतनेमें । घल लावे तब तनमें । ईंधन डालनेसे आगमें । जैसे बढती ॥ ६५ ॥ इन्द्रियाणि मनोबुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते । एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम् ॥ ४० ॥ ढका है धूमसे अग्नि जैसे दर्पण धूलसे । जेरीसे घिरता गर्भ वैसे है ज्ञान कामसे ॥ ३८ ॥ काम-रूप महा अग्नि न होता तृप्त जो कभी । ज्ञानीका तो नित्य-शत्रु उसने ज्ञानको ढका ॥ ३९ ॥ इंद्रियां मन औ'बुद्धि इनका आसरा लिये । छिपाके ज्ञान जीवोंका करता मोह-ग्रस्त जो ॥४०॥ १०३ कर्मयोग
जो जो साधन है करते । वे सब इन्हीको बढ़ाते । इसीलिये येही जीतते । हठयोगियोंको ॥ ६६ ॥ इंद्रिय दमन, इनको जीतनेका उपाय है— किंतु इन्हे जीतनेमें एक । उपाय है बडा ही नेक । करना हो तो करके देख । कहता हूं तुझे ॥ ६७ ॥ तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ । पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम् ॥ ४१ ॥ इंद्रिय इनका पहला आसन । वहांसे ही होते हैं कर्म उत्पन्न । करना है इंद्रियोका निर्दलन । सर्वथैव ॥ ६८ ॥ इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः । मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः ॥ ४२ ॥ दौड रुकेगी मनकी । औ' मुक्ति होगी बुध्दिकी । नींव हिलेगी इनकी । ये जो पापी ॥ ६९ ॥ मिटे जब ये अंतरंगसे । तभी गये ये जड मूलसे । न रहता मग जल जैसे । सूर्य किरण बिन ॥ २७० ॥ एवं बुद्धे परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना । जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम् ॥ ४३ ॥ तभी जीवको ब्रह्म-स्वराज्य मिलेगा— ऐसे रागद्वेष जब मिटता । ब्रह्मात्मका तब स्वराज्य आता । फिर वह् आनंद है भोगता । अपने आप ॥ ७१ ॥ इनका पहला स्थान जीतके इंद्रियां सब । टाल तू इस पापीको ज्ञान विज्ञान नाशक ॥ ४१ ॥ इंद्रियोंको कहा श्रेष्ठ उससे श्रेष्ठ है मन । मनसे बुद्धि है श्रेष्ठ श्रेष्ठ है उससे प्रभु ॥ ४२ ॥ जान ऐसा प्रभु श्रेष्ठ निजको जीत आप ही । काम रूपी महा-शत्रु इसका नाश तू कर ॥ ४३ ॥ ज्ञानेश्वरी १०४
गुरु शिष्योंके संवादमें । पद-पिंडके एकत्वमें । स्थिर रह नित्य-रूपमें । न उठो कभी ॥ ७२ ॥ अगले अध्यायकी भूमिका— सिद्ध है जो सकल सिद्धोंका । रमण है श्रीरमादेवीका । स्वामी सकल देवादिकोंका । कहने लगा ॥ ७३ ॥ अब पुन वह अनंत । कहेगा आदीकी जो बात । जब उनसे पांडुसुत । प्रश्न करेगा ॥ ७४॥ उसके बोल होंगे सरस । उसमें अनुभवेंगे रस । श्रोताओंमें उमडेगा उन्मेष । श्रवण सुखका ॥ ७५ ॥ ज्ञानदेव कहे निवृत्तिका । जागृत करके विवेकका । आप सुनिये हरि-पार्थका । संवाद सब ॥ ७६ ॥ गीता श्लोक ४३ ज्ञानेश्वरी ओवी २७६ ॐ (14)
४ ज्ञान-कर्म-संन्यासयोग श्रोताओंको ज्ञानेश्वर महाराजका उद्बोधन- सुकाल हुआ श्रवणेंद्रियोंका । दर्शन हुआ गीता-निधानका । अजी ! साकार ही हुआ स्वप्नका । उनको यहां ॥ १ ॥ मूलमें है विवेककी गोष्ठि । कहनेवाला श्रीकृष्ण श्रेष्ठी । भक्तराज जो स्वयं किरीटी । सुनते हैं ॥ २ ॥ पंचमालाप है सुगंध । तथा परिमल सुस्वाद । वहां है भलासा विनोद । कथानकका ॥ ३ ॥ श्री हरिकी कृपा हुई । अमृतकी गंगा बही । तपस्या सफल हुई । श्रोताओंकी ॥ ४ ॥ इंद्रियोंको अब संपूर्ण । बनकर स्वयं श्रवण । अनुभवना गीताख्यान । संवाद सुखका ॥ ५ ॥ अब यह अप्रासंगिक । विस्तार छोडके अधिक । कहो कृष्णार्जुन हो एक । बोले क्या हैं ॥ ६ ॥ तब संजय बोले राजासे । सुदैव जुड़ा है अर्जुनसे । तभी अति प्रीति है उनसे । नारायणकी ॥ ७ ॥ जो न कहा पिता वसुदेवसे । औ' न जो कहा माता देवकीसे । या न कहा गुह्य बलभद्रसे । कहा वह पार्थसे ॥ ८ ॥
देवी लक्ष्मी इतनी नजदीक । वह भी न जानती यह सुख । कृष्ण प्रेमका फल जो अधिक । मिला अर्जुनको ॥ ९ ॥ थी सनकादिकोंकी जो आस । सुननेकी यह उपदेश । किंतु उनको भी ऐसा यश । मिला नहीं ॥ १० ॥ जगदीश्वरका है प्रेम । दीखता यहां निरुपम । पार्थने ऐसा सर्वोत्तम । किया पुण्य ॥ ११ ॥ अजी ! जिसकी अति प्रीति । अमूर्तको बनाती व्यक्ति । : उसकी है एकात्म स्थिति । जंचती बहु ॥ १२ ॥ योगियोंको जो नहीं मिलता । वेदार्थमें भी जो नहीं आता । ध्यानस्थका नहीं पहुंचता । ध्यान चक्षुभी ॥ १३ ॥ ऐसा यह निज स्वरूप । अनादि तथा औ' निष्कंप । किंतु कैसा हुआ सरूप । इस भांतिसे ॥ १४ ॥ यह त्रिलोक पटका थान । जो है आकारके परे जान । प्रेमसे करमें है अर्जुन । कर लिया है ॥ १५ ॥ भगवान उवाच इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् । विवस्वान् मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ॥१॥ इस योगकी प्राचीनता— कहता है देव पांडुसुत । हमसे यह है विवस्वत । सुनी है योगकी गुह्य बात । बहुत पहले ॥ १६ ॥ बोले फिर वह भास्कर । योग स्थिति यह सुंदर । पूर्ण रूपसे सुअवसर । मनुसे तब ॥ १७ ॥ मनुने इसका अनुष्ठान । कर दिया ज्ञानोपदेश दान । इक्ष्वाकुको, ऐसी है महान । आदि परंपरा ॥ १८ ॥ पहले सूर्यसे मैंने कहा था योग अव्यय । मनुसे वह बोला था वह इक्ष्वाकुसे फिर ॥ १ ॥ १०७ ज्ञान-कर्म-संन्यासयोग
एवं परंपराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः । स कालेनेह महता योगो नष्टः परंतप ॥२॥ कितने ही इस योगसे और । हुए हैं राजऋषि जानकार । किंतु इस युगमें पृथ्वो पर । कोई न जानता ॥ १९ ॥ जिन प्राणियोंका आधार । देह तथा कामना पर । जिससे विस्मृति अपार । आत्म बोधकी ॥ २० ॥ अजी ! बदल गयी आस्था बुध्दि । विषय सुखकी परमावधि । इससे जीव हुवा है उपाधि । उन्हे भाता यही ॥ २१ ॥ गांवमें सुनो नग्न लोगोंके । काम क्या महीन कपडोंके । तथा जन्मांधोंमें सूरजके । कहो मुझे ॥ २२ ॥ या बहिरोंकी सभामें । गावें गीत सु-रागोंमें । सियारको चांदनीमें । होगी क्या चाह ? ॥ २३ ॥ अथवा पहले चंद्रोदयके । चक्षु होते हैं व्यर्थ जिनके । चंद्रोदयसे उन कागोंके । लाभ क्या हुआ ॥ २४ ॥ जैसे वैराग्यकी सीमा न जानते । विवेककी भाषा नहीं है सुनते । वैसे मूर्ख कहो कैसे जानते । मुझ ईश्वरको ॥ २५ ॥ मोहके बहुत बढनेसे । काल बहुत बीत जानेसे । लोप हुआ है योग इससे । इस लोकमें ॥ २६ ॥ स एवायं मयातेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः । भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम् ॥३॥ वही योग तुझसे अर्जुन । कहा है मैंने इसी क्षण । उसको तू तत्वता जान । न करके भ्रांति ॥ २७ ॥ ऐसी परंपरासे जो मिला राजर्षि-वृंदको । आगे समय जानेसे विश्वमें लोप होगया ॥२॥ वही आज तुझे मैंने कहा योग पुरातन । कहा है गुह्य जो सार भक्त है तू सखा मम ॥ ३ ॥ ज्ञानेश्वरी १०८
मेरे जीवनका यह गुपित । तुझसे छिपाना नहीं उचित । तू है मेरा आत्मीय बहुत । इसीलिये ॥ २८॥ प्रेमका तू पुतला । भक्तिका है जिव्हाला । मित्रताकी चित्कला । धनुर्धर ॥ २९॥ मेरा निकट तू अर्जुन । कैसे करूं तेरी वंचना । रण सज्ज हुए समान । हम दोनों ॥ ३० ॥ अन्य सब अब रहने देना । कोलाहलका विचार न करना । अज्ञान सब तेरा दूर करना । इसी समय ॥ ३१॥ अर्जुन उवाच अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः । कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति ॥४॥ आजके तूने विवस्वतसे कैसे कहा ?— अर्जुन कहता है तब श्रीधर । माता प्रेम करती संतान पर । इसमें विस्मय क्या है चक्रधर । कृपानिधि ॥ ३२ ॥ संसार भ्रांतोंकी ह छाया । अनाथ जीवोंकी तू माय । हमने जो जन्म है पाया । तव कृपासे ही ॥ ३३ ॥ जन्म देकर पंगुको माता । कष्ट उठाती है स-ममता । ऐसी देव कैसे कहें वार्ता । तेरी तुझसे ही ॥ ३४॥ अब पूछूंगा देव एक बात । उस पर देना भला स्व-चित्त । प्रश्न पर क्रोध तू न किंचित । करो देव ॥ ३५॥ पिछली जो वह बात । तूने कही थी अनंत । न मानता मेरा चित्त । क्षण भी देव ॥ ३६॥ अजी ! वह विवस्वत नामका । अ-परिचित है बाप-दादाका । कैसा किया है तूने उनका । उपदेश देव ॥ ३७॥ अर्जुनने कहा अभीका जन्म है तेरा पूर्वका उस सूर्यका । पहले ही कहा तूने कैसे मैं वह मान लूं ॥ ४ ॥ १०९ ज्ञान-कर्म-संन्यासयोग
वह है देव किस कालका । तू भीहरि है इस कालका । तभी दीखता तेरी बातका । असंगत पन ॥ ३८ ॥ किंतु तेरा चरित्र वैसे । हम उसको जाने कैसे । तभी वह असत्य ऐसे । नहीं कहता ॥ ३९ ॥ यह बात संपूर्ण ऐसे । कहना मैं समझूं वैसे । तूने उस सूर्यको कैसे । किया उपदेश ॥ ४० ॥ भगवान उवाच बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन । तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परंतप ॥५॥ तेरे मेरे अनेक जन्म मैं जानता हूं— कृष्ण कहे तब पांडुसुत । जब था वह विवस्वत । तब मैं नहीं था ऐसा चित्त- । भ्रम है तेरा ॥ ४१ ॥ अजी ! तू नहीं जानता सब । जन्म हमारे तुम्हारे अब । बीते हैं कितने कैसे कब । यह तू भूला है ॥ ४२ ॥ मैं जिस जिस अवसरमें । अवतरा हूं जिस रूपमें । वह सब अपने मनमें । स्मरता पार्थ ॥ ४३ ॥ अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोपि सन् । प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया ॥६॥ धर्म रक्षणके लिये मेरा अवतार-- इसीलिये मुझे संपूर्ण । बीतेका होता है स्मरण । रहित मैं जन्म मरण । जन्मता प्रकृति योगसे ॥ ४४ ॥ श्रीभगवानने कहा बीते मेरे कयी जन्म तेरे भी बहु अर्जुन । जानता मैं सभी बातें तू उन्हे जानता नहीं ॥ ५ ॥ होते हुये अजन्मा मैं निर्विकार जगत्प्रभु । जन्मता हूं स्वमायासे प्रकृति ओढके निज ॥ ६ ॥ ज्ञानेश्वरी ११०
अव्ययत्व मेरा नहीं मिटता । किंतु जन्म मरण हे दीखता । यह सब प्रकृतिसे भासता । मुझमें नहीं ॥ ४५ ॥ मिटती नहीं मेरी स्वतंत्रता । दीखती मुझमें कर्माधीनता । यह हे भ्रम-बुद्धिसे घड़ता । अन्यथा नहीं ॥ ४६ ॥ एक ही दीखता दूसरा । जो दर्पणका ले आधार । किंतु वहां वस्तु विचार । एक मात्र ॥ ४७ ॥ निराकार हूं मैं धनुर्धर । लेकर प्रकृतिका आधार । नटता हूं लेकर आकार । कार्यके लिये ॥ ४८ ॥ यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत । अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥७॥ धर्ममात्र जो संपूर्ण । युगयुगमें रक्षण । करना मेरा लक्षण । आदिकालसे ॥ ४९ ॥ भूलता हूं तब अजत्व । छोड़ता हूं निराकारत्व । गिरता जब धर्म तत्त्व । अधर्मसे ॥ ५० ॥ परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् । धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ॥८॥ हितार्थ अपने भक्तोंके । आता हूं अवतार लेके । मिटाता तब अज्ञानके । अंधकारको ॥ ५१ ॥ अधर्मकी सीमा तोड़ता । पापकी सनद फाड़ता । सुखका ध्वज उभारता । सज्जनोंसे ॥ ५२ ॥ दैत्य कुलका संहार करता । साधु जनोंका सम्मान करता । धर्म नीतिका मेल बिठाता । धनुर्धर ॥ ५३ ॥ जब है गिरता धर्म जगमें तब अर्जुन ! अधर्म उठता भारी लेता हूं जन्म मैं स्वयं ॥ ७ ॥ रक्षण कर संतोंका दुष्टोंका नाश करने । स्थापना करने धर्म जन्मता मैं पुनः पुनः ॥ ८ ॥ १११ ज्ञान-कर्म-संन्यासयोग
मिटाकर अविवेकका काजल । करता हूं विवेक दीप उज्ज्वल । जिससे योगियोंकी दीपमाळ । जले निरंतर ॥ ५४ ॥ आत्म-सुखसे विश्व खिलता । जगतमें धर्म ही रहता । सात्विकताका वसंत आता । भक्त जनोंमें ॥ ५५ ॥ पापका जहां पहाड टूटता । पुण्यका है प्रभात प्रकटता । मेरा रूप जब प्रकट होता । धनंजय ॥ ५६ ॥ ऐसे कार्यार्थ जगतमें । जनमता हूं युगयुगमें । जानता जो यह विश्वमें । विवेकी वही ॥ ५७ ॥ जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्वतः । त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥९॥ जो मेरा रूप जानते हैं वे मद्रूप होते हैं— मैं जो अजत्वमें ही जनमता । अक्रियतामें सक्रिय रहता । अविकारत्व यह जो जानता । पाता वह मोक्ष ॥ ५८ ॥ संगमें वह असंग रहता । देहमें निर्देह अनुभवता । पंचतत्वमें जब मिल जाता । मेरे ही रूपमें ॥ ५९ ॥ वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः । बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः ॥१०॥ वे अपना पराया न सोचते । सदा कामना शून्य हो रहते । कभी वे राह भी नहीं देखते । क्रोधकी ॥ ६० ॥ सदा वे मद्भावमें ही रहते । मेरी सेवामें ही रत रहते । आत्म-बोधमें ही मगन होते । वीत राग हो ॥ ६१ ॥ मेरे जन्म तथा कर्म दिव्य जो जानता सही । तजके देह पुनर्जन्म न पाता मिलके मुझे ॥ ९ ॥ नहीं तृष्णा भय क्रोध जो मेरे कार्यमें रत । हुये ज्ञान तपोपूत तथा मद्भावमें कयी ॥ १० ॥ ज्ञानेश्वरी ११२
होते वे तप तेजके पुंज । एकायत-ज्ञान-निकुंज । पवित्रतामें हैं तीर्थराज । धनुर्धर ॥ ६२ ॥ सहजमें वे मद्भाव हुये । मेरे ही रूपमें एक भये । फिर मेरे उनमें न आये । बीच परदा ॥ ६३ ॥ जैसे पीतलके गंज कालिख । मिटे यदि वे दोनों निःशेष । सुवर्णत्व इससे अधिक । क्या रहा ? ॥ ६४ ॥ पूर्ण जो यम नियममें । शुद्ध है जो तपज्ञानमें । हुये वे मेरे ही रूपमें । निःसंदेह ॥ ६५ ॥ ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् । मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥ ११ ॥ केवल भ्रमवश मुझ एकको अनेक देखते हैं — मुझे जो जैसा भजता । उसको वैसा ही देखता । दोनोंमें आती एकता । जान यह् ॥ ६६ ॥ वैसे ही मनुष्य मात्र सकल । स्वभावसे ही है भजन-शील । हुए ऐस मुझमें ही केवल । पांडुकुमार ॥ ६७ ॥ किंतु ज्ञानाभावसे नाश होता । उससे ही बुद्धिभेद होता । उससे जगती है कल्पकता । अनेकत्वकी ॥ ६८ ॥ तभी अभेदमें भेद देखते । मुझे अनामको हैं नाम देते । देव देवीके रूपमें पूजते । है जो शब्दसे परे ॥ ६९ ॥ जहां जो सर्वत्र सदा सम । वहां विभाग अधमोत्तम । करते हैं मतिसे संभ्रम । विवेचन ॥ ७० ॥ काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः । क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा ॥ १२ ॥ भजते मुझ जो जैसे वैसे मैं भजता उन्हे । मेरे ही मार्गमें आते सभी हैं सब मार्गसे ॥ ११ ॥ देवोंको पूजते जो हैं चाहसे कर्म-सिद्धिकी । कर्मकी सिद्धि वे शीघ्र पाते हैं नर-लोकमें ॥ १२ ॥ (15) ११३ ज्ञान-कर्म-संन्यासयोग
फिर नाना हेतु प्रकारसे । यथोचित पूजोपचारसे । देवदेवान्तरोंको मान्यतासे । उपासते ॥ ७१ ॥ जो हैं ऐसे अपेक्षित । पाते हैं वैसे समस्त । कर्मफल वे निश्चित । जान ले तू ॥ ७२ ॥ बिन कर्मके लेना देना अधिक । निर्भ्रान्त ऐसा नहीं कुछ सम्यक । यहां है कर्म ही फल रूपक । मनुष्य लोकमें ॥ ७३ ॥ खेतमें जैसे जो कछु बोया जाता । उसके बिना अन्य न उपजता अथवा जो देखता वही दीखता । देर्पणमें जैसे ॥ ७४ ॥ या गिरिकंदरामें जैसे । अपने ही शब्द वैसे । गूंजते हैं दश दिशासे । निमित्तयोग ॥ ७५ ॥ ऐसे ये सभी भजन । साक्षीभूत हूं अर्जुन । प्रति-फलती भावना । अपनी ही ॥ ७६ ॥ चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः । तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् ॥ १३ ॥ चातुर्वर्ण्य प्राकृतिक गुणोंके कारण— इसी भांति तू जान । चार हैं ये वर्ण । रचे हैं मैंने गुण- । कर्म वि भागसे ॥ ७७ ॥ जो प्रकृतिके आधारसे । गुणोंके व्यभिचारसे । कर्मकी तदनुसारसे । योजना की ॥ ७८ ॥ है यहां यह एक अर्जुन । किंतु हुए हैं ये चार-वर्ण । ऐसे गुण कर्मके कारण । सहज हुआ ॥ ७९ ॥ तभी सुन तू पार्थ । ये वर्ण-भेद संस्था । कर्ता मैं न सर्वथा । इसीलिये ॥ ८० ॥ सृजे मैं ने वर्ण चार गुण-कर्म विभागसे । करके सब तू जान अकर्ता निर्विकार मैं ॥ १३ ॥ ज्ञानेश्वरी ११४
न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा । इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते ॥ १४ ॥ मेरे कारणसे यह भया । किंतु मैंने यह नहीं किया । ऐसे जिसने प्रतीत किया । हुआ वह सूझ ॥ ८१ ॥ एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः । कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम् ॥ १५ ॥ पूर्ववर्ती मुमुक्षु जन । ऐसा हूं मैं, यह जान । करते कर्माचरण । धनुर्धर ॥ ८२ ॥ किंतु जैसे भुने हुए बीज । उगते नहीं कभी सहज । वैस ही उन्हे कर्म महज । होते मोक्ष हेतु ॥ ८३ ॥ यहां और एक बात अर्जुन । यह् कर्माकर्मका विवेचन । अपने ही बुध्दिसे है करना । नहीं योग्य ॥ ८४ ॥ किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः । तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥ १६ ॥ कर्माकर्म विवेचनमें ज्ञानी भी भ्रममें— कर्म करते हैं वह कौन । या अकर्मका है क्या लक्षण । ऐसे सोचनेमें विचक्षण । पडते उलझनमें ॥ ८५ ॥ अजी ! खोटा सिक्का जैसा होता है । सच्चेकी समानता करता है । देखनेवालोंको जो डालता है । भ्रममें जैसे ॥ ८६ ॥ न लीपते मुझे कर्म न मुझे फल-कामना । मुझे जो जानते ऐसे कर्ममें भी अलिप्त वे ॥ १४ ॥ कर्म जो मुमुक्षुओंने किये हैं इस ज्ञानसे । कर तू कर्म वैसे ही उनसे पाठ लेकर ॥ १५॥ जाननेमें कर्माकर्म भ्रमते बुध्दिमान भी । तुझे मैं कहता कर्म छूटेगा जानके यह ॥ १६ ॥ ११५ ज्ञान-कर्म-संन्यासयोग
वैसे निष्कर्म्यके भ्रममें । पड़ते हैं कर्म-पाशमें । जो दूसरी सृष्टि मनमें । कर सकते ॥ ८७ ॥ मूर्खोंकी यहां कहें क्या बात । क्रांतदर्शी होते मोह-ग्रस्त । तभी कहता तुझसे बात । वही अब ॥ ८८ ॥ कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः । अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः ॥ १७ ॥ तभी कर्म जिसके स्वभावसे । विश्वाकार संभव हो उससे । जानना उसे संपूर्ण रूपसे । यहां सर्व प्रथम ॥ ८९ ॥ वर्णाश्रममें फिर उचित । तथा विशेष कर्म विहित । जानना उसको सुनिश्चित । उपयोगी जो ॥ ९० ॥ फिर जानना जो निषिद्ध । उसका भी रूप विशद । तभी न हो सकता बद्ध । सहज कर्ममें ॥ ९१ ॥ नहीं तो विश्व है कर्माधीन । उसका फैलाव है गहन । सुन लक्षण अब तू अर्जुन । बोध प्राप्तोंका ॥ ९२ ॥ कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः । स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत् ॥ १८ ॥ कर्मका तिरस्कार और कर्मफलोंमें आशा दोनों नहीं -- करते हुए सकल कर्ममें । अकर्म देखता जो अपनेमें । निरपेक्ष होता कर्म संगमें । फलाशासे ॥ ९३ ॥ तथा कर्त्तव्य करनेमें । अन्य न कोई जगतमें । ऐसेको बोध अकर्ममें । अच्छा होता है ॥ ९४ ॥ क्रिया कलापका वह संपूर्ण । करता है उत्तम आचरण । किंतु इन लक्षणके कारण । जानना ज्ञानी ॥ ९५ ॥ जानना कर्म सामान्य विकर्म भी विशेष जो । जानना अकर्ममें भी गूढ जो कर्मकी गति ॥ १७ ॥ अकर्म कर्ममें देखें तथा कर्म अकर्ममें । विज्ञ है वह लोगोंमें योगी वह कृतार्थ भी ॥१८॥ ज्ञानेश्वरी ११६
जैसे जलाशयके पास रहकर । देखता अपना प्रतिबिंब सुंदर । किंतु जानता है निभ्रांत होकर । मैं हूं भिन्न ॥ ९६ ॥ या चलता जब नांवमें बैठकर । देखता वृक्षोंका चलना निरंतर । किंतु कहता है मनमें सोचकर । वृक्ष होते अचल ॥ ९७ ॥ करता वह सब कामोंमें वास । किंतु मानता यह है आभास । अपनेको जानता है सविश्वास । मैं हूं अकर्मी ॥ ९८ ॥ उदयास्त कारणसे होता भान । न चलते ही सूर्य गमन । वैसे होता उसे नैष्कर्म्यका ज्ञान । कर्म-रत रहते ॥ ९९ ॥ मनुष्य जैसा ही है वह दीखता । उसमें मनुष्यत्व नहीं रहता । वैसे जलमें पढ भी न डूबता । भानुबिंब ॥ १०० ॥ उसने विश्वदेखा कछु न देखते । सब कार्य किया कुछ भी न करते । सब भोग किये नहीं कछु भोगते । भोग-मात्र ॥ १ ॥ बैठ कर एक ही स्थल पर । करता रहता है विश्व संचार । बना वह विश्वरूप निरंतर । अपनेमें ही ॥ २ ॥ यस्य सर्वे समारम्भाः कामसंकल्पवर्जिताः । ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः ॥ १९ ॥ ऐसे पुरुषमें कहीं । कर्मका तिरस्कार नहीं । कर्म फलापेक्षा भी नहीं । छूती कभी ॥ ३ ॥ और मैं यह कर्म करूंगा । किया जो उसे पूर्ण करूंगा । ऐसा संकल्प नहीं छूएगा । उसके मनको ॥ ४ ॥ ज्ञानाग्निके ही मुखसे । सारे कर्म जलनेसे । ब्रह्म है मनुष्य रूपसे । जान ले तू वह ॥ ५ ॥ उद्योग करता सारे काम संकल्प त्यागके । जलाये ज्ञानसे कर्म उसको कहते बुध ॥ १९ ॥ ११७ ज्ञान कर्म-संन्यासयोग
त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः । कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः ॥ २० ॥ कर्मयोगीके लक्षण— शरीरमें जो उदास । फल-भोगमें निरास । निरंतर स-उल्हास । रहता है ॥ ६ ॥ संतोष-भवनके भोजमें । आत्मयोग मृष्टान्न भोगमें । न कहता कभी न मनमें । जान तू पार्थ ॥ ७ ॥ निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः । शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥ २१ ॥ यदृच्छालाभसंतुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः । समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते ॥ २२ ॥ नित्य अधिकाधिक प्यारी । ले महासुखकी माधुरी । आशाको न्योच्छावर करी । अहंभाव-सह ॥ ८ ॥ तभी जिस अवसरमें जो पाया । उससे ही वह नित है सुखाया । उसको अपना और पराया । दोनों नहीं ॥ ९ ॥ दृष्टिसे यह जो देखता । वह है आपही हो जाता । जिसको है वह सुनता । बनता वही ॥ १० ॥ पैरसे जो चलता । मुखसे जो बोलता । वह जो चेष्टा करता । बनता स्वयं ॥ ११ ॥ नित्य तृप्त निराधार न रखे फल वासना । हुआ है लीन कर्मोंमें तो भी कुछ करें नहीं ॥ २० ॥ संयमी तजके सारा इच्छा सह परिग्रह । देहसे करता कर्म उसे दोष न स्पर्शता ॥ २१ ॥ मिले जो उसमें तुष्ट न जाने द्वंद्व मत्सर । फले जले उसे एक करके कर्म-मुक्त जो ॥ २२ ॥ ज्ञानेश्वरी ११८
अजी ! वह विश्वमें जब देखता । अपने बिन भिन्न नहीं दीखता । उसको अब कौन कहां क्या बंधता । कर्म कैसा ॥ १२ ॥ जहांसे उपजता यह मत्सर । वह द्वैत ही नहीं जहांपर । उसको कहना क्या निर्मत्सर । शब्दके लिये ॥ १३ ॥ इसलिये रहता सर्व मुक्त । कर्म करके भी कर्म रहित । सगुण होकर भी गुणातीत । निभ्रांत जो ॥ १४॥ गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः । यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते ॥ २३॥ देह संगमें यदि होता । चैतन्यसा वह दीखता । कसौटी पर खरा उतरता । परब्रह्मकी ॥ १५ ॥ ऐसा ही वह सकौतुक । करता कर्म यज्ञादिक । मिट जाते सब अशेष । उसीमें सब ॥ १६ ॥ अकालके बादल जैसे । उर्मी बिन मिटते वैसे । नभमें सहज भावसे । उदय होके ॥ १७ ॥ वैसे विधि विधान विहित । आचरण करता समस्त । तो भी ऐक्य भावसे अद्वैत । पाता वह ॥ १८ ॥ ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् । ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ॥ २४॥ यह है हवन मैं होता । या यह यज्ञ यह भोक्ता । बुद्धिमें ऐसी नही भंगता । इसीलिये ॥ १९ ॥ इष्ट जो यज्ञ यजन । हवि मंत्रादि सम्पूर्ण । आत्म बुद्धिसे दर्शन । अविनाश भावसे ॥ १२० ॥ छूटा संग हुवा मुक्त ज्ञानमें स्थिर चित जो । यज्ञार्थ करता कर्म हो जाता सब ही लय ॥ २३ ॥ ब्रह्ममें होमके ब्रह्म ब्रह्मने ब्रह्म लक्ष्यके । ब्रह्ममें सानके कर्म पाया ब्रह्मत्व ही तब ॥ २४ ॥ ११९ ज्ञान-कर्म-संन्यासयोग
तभी ब्रह्म ही उसका कर्म । बोध हुआ ऐसा उसका सम । उसका कर्तव्य ही नैष्कर्म्य । धनुर्धर ॥ २१ ॥ जिसका अविवेक कौमार्य गया । औ' विरक्तिसे पाणिग्रहण भया । फिर उपासना वहां लाया । योगाग्निसे ॥ २२ ॥ दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते । ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति ॥ २५ ॥ योगाग्निसे सतत उपासना— यजनशील है जो दिन-रात । होमते अविद्या मन सहित । गुरुवाक्य हुताशनमें नित । किया हवन ॥ २३ ॥ ये हैं योगाग्निमें यजते । इसे दैवयज्ञ हैं कहते । इससे आत्म-सुख चाहते । धनंजय ॥ २४ ॥ दैवास्तव देहका पालन । ऐसा निश्चय जिसका पूर्ण । जो न सोचता देहाभरण । दैवयोगका महायोगी ॥ २५ ॥ अब सुन तू और एक । जो हैं ब्रह्माग्निमें साग्निक । वे यज्ञमें ही यज्ञ देख । करते हैं ॥ २६ ॥ श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति । शब्दादीन्विषयानन्ये इन्द्रियाग्निषु जुह्वति ॥ २६ ॥ कर्मयोगीका ब्रह्मयज्ञ— संयम जिनका अग्नि होत्र । युक्तित्रय ही उनका मंत्र । देते इंद्रिय द्रव्य पवित्र । आहुति नित्य ॥ २७ ॥ वैराग्य रविका उदय होते । संयमका यज्ञ कुंड रचते । वहां वे प्रज्वलित करते । इंद्रियानल ॥ २८ ॥ कोयी योगी करे मात्र देव यज्ञ उपासना । कोयी ब्रह्माग्निमें वैसे जलाते यज्ञ यज्ञसे ॥ २५ ॥ श्रोत्रादि इंद्रियां कोयी होमते संयमाग्निमें । कोयी विषय शब्दादि होमते इंद्रियाग्निमें ॥ २६ ॥ ज्ञानेश्वरी १२०