ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजैसे जलाशयके पास रहकर । देखता अपना प्रतिबिंब सुंदर । किंतु जानता है निभ्रांत होकर । मैं हूं भिन्न ॥ ९६ ॥ या चलता जब नांवमें बैठकर । देखता वृक्षोंका चलना निरंतर । किंतु कहता है मनमें सोचकर । वृक्ष होते अचल ॥ ९७ ॥ करता वह सब कामोंमें वास । किंतु मानता यह है आभास । अपनेको जानता है सविश्वास । मैं हूं अकर्मी ॥ ९८ ॥ उदयास्त कारणसे होता भान । न चलते ही सूर्य गमन । वैसे होता उसे नैष्कर्म्यका ज्ञान । कर्म-रत रहते ॥ ९९ ॥ मनुष्य जैसा ही है वह दीखता । उसमें मनुष्यत्व नहीं रहता । वैसे जलमें पढ भी न डूबता । भानुबिंब ॥ १०० ॥ उसने विश्वदेखा कछु न देखते । सब कार्य किया कुछ भी न करते । सब भोग किये नहीं कछु भोगते । भोग-मात्र ॥ १ ॥ बैठ कर एक ही स्थल पर । करता रहता है विश्व संचार । बना वह विश्वरूप निरंतर । अपनेमें ही ॥ २ ॥ यस्य सर्वे समारम्भाः कामसंकल्पवर्जिताः । ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः ॥ १९ ॥ ऐसे पुरुषमें कहीं । कर्मका तिरस्कार नहीं । कर्म फलापेक्षा भी नहीं । छूती कभी ॥ ३ ॥ और मैं यह कर्म करूंगा । किया जो उसे पूर्ण करूंगा । ऐसा संकल्प नहीं छूएगा । उसके मनको ॥ ४ ॥ ज्ञानाग्निके ही मुखसे । सारे कर्म जलनेसे । ब्रह्म है मनुष्य रूपसे । जान ले तू वह ॥ ५ ॥ उद्योग करता सारे काम संकल्प त्यागके । जलाये ज्ञानसे कर्म उसको कहते बुध ॥ १९ ॥ ११७ ज्ञान कर्म-संन्यासयोग