भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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वैसे निष्कर्म्यके भ्रममें । पड़ते हैं कर्म-पाशमें । जो दूसरी सृष्टि मनमें । कर सकते ॥ ८७ ॥ मूर्खोंकी यहां कहें क्या बात । क्रांतदर्शी होते मोह-ग्रस्त । तभी कहता तुझसे बात । वही अब ॥ ८८ ॥ कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः । अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः ॥ १७ ॥ तभी कर्म जिसके स्वभावसे । विश्वाकार संभव हो उससे । जानना उसे संपूर्ण रूपसे । यहां सर्व प्रथम ॥ ८९ ॥ वर्णाश्रममें फिर उचित । तथा विशेष कर्म विहित । जानना उसको सुनिश्चित । उपयोगी जो ॥ ९० ॥ फिर जानना जो निषिद्ध । उसका भी रूप विशद । तभी न हो सकता बद्ध । सहज कर्ममें ॥ ९१ ॥ नहीं तो विश्व है कर्माधीन । उसका फैलाव है गहन । सुन लक्षण अब तू अर्जुन । बोध प्राप्तोंका ॥ ९२ ॥ कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः । स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत् ॥ १८ ॥ कर्मका तिरस्कार और कर्मफलोंमें आशा दोनों नहीं -- करते हुए सकल कर्ममें । अकर्म देखता जो अपनेमें । निरपेक्ष होता कर्म संगमें । फलाशासे ॥ ९३ ॥ तथा कर्त्तव्य करनेमें । अन्य न कोई जगतमें । ऐसेको बोध अकर्ममें । अच्छा होता है ॥ ९४ ॥ क्रिया कलापका वह संपूर्ण । करता है उत्तम आचरण । किंतु इन लक्षणके कारण । जानना ज्ञानी ॥ ९५ ॥ जानना कर्म सामान्य विकर्म भी विशेष जो । जानना अकर्ममें भी गूढ जो कर्मकी गति ॥ १७ ॥ अकर्म कर्ममें देखें तथा कर्म अकर्ममें । विज्ञ है वह लोगोंमें योगी वह कृतार्थ भी ॥१८॥ ज्ञानेश्वरी ११६