भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा । इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते ॥ १४ ॥ मेरे कारणसे यह भया । किंतु मैंने यह नहीं किया । ऐसे जिसने प्रतीत किया । हुआ वह सूझ ॥ ८१ ॥ एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः । कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम् ॥ १५ ॥ पूर्ववर्ती मुमुक्षु जन । ऐसा हूं मैं, यह जान । करते कर्माचरण । धनुर्धर ॥ ८२ ॥ किंतु जैसे भुने हुए बीज । उगते नहीं कभी सहज । वैस ही उन्हे कर्म महज । होते मोक्ष हेतु ॥ ८३ ॥ यहां और एक बात अर्जुन । यह् कर्माकर्मका विवेचन । अपने ही बुध्दिसे है करना । नहीं योग्य ॥ ८४ ॥ किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः । तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥ १६ ॥ कर्माकर्म विवेचनमें ज्ञानी भी भ्रममें— कर्म करते हैं वह कौन । या अकर्मका है क्या लक्षण । ऐसे सोचनेमें विचक्षण । पडते उलझनमें ॥ ८५ ॥ अजी ! खोटा सिक्का जैसा होता है । सच्चेकी समानता करता है । देखनेवालोंको जो डालता है । भ्रममें जैसे ॥ ८६ ॥ न लीपते मुझे कर्म न मुझे फल-कामना । मुझे जो जानते ऐसे कर्ममें भी अलिप्त वे ॥ १४ ॥ कर्म जो मुमुक्षुओंने किये हैं इस ज्ञानसे । कर तू कर्म वैसे ही उनसे पाठ लेकर ॥ १५॥ जाननेमें कर्माकर्म भ्रमते बुध्दिमान भी । तुझे मैं कहता कर्म छूटेगा जानके यह ॥ १६ ॥ ११५ ज्ञान-कर्म-संन्यासयोग