भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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फिर नाना हेतु प्रकारसे । यथोचित पूजोपचारसे । देवदेवान्तरोंको मान्यतासे । उपासते ॥ ७१ ॥ जो हैं ऐसे अपेक्षित । पाते हैं वैसे समस्त । कर्मफल वे निश्चित । जान ले तू ॥ ७२ ॥ बिन कर्मके लेना देना अधिक । निर्भ्रान्त ऐसा नहीं कुछ सम्यक । यहां है कर्म ही फल रूपक । मनुष्य लोकमें ॥ ७३ ॥ खेतमें जैसे जो कछु बोया जाता । उसके बिना अन्य न उपजता अथवा जो देखता वही दीखता । देर्पणमें जैसे ॥ ७४ ॥ या गिरिकंदरामें जैसे । अपने ही शब्द वैसे । गूंजते हैं दश दिशासे । निमित्तयोग ॥ ७५ ॥ ऐसे ये सभी भजन । साक्षीभूत हूं अर्जुन । प्रति-फलती भावना । अपनी ही ॥ ७६ ॥ चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः । तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् ॥ १३ ॥ चातुर्वर्ण्य प्राकृतिक गुणोंके कारण— इसी भांति तू जान । चार हैं ये वर्ण । रचे हैं मैंने गुण- । कर्म वि भागसे ॥ ७७ ॥ जो प्रकृतिके आधारसे । गुणोंके व्यभिचारसे । कर्मकी तदनुसारसे । योजना की ॥ ७८ ॥ है यहां यह एक अर्जुन । किंतु हुए हैं ये चार-वर्ण । ऐसे गुण कर्मके कारण । सहज हुआ ॥ ७९ ॥ तभी सुन तू पार्थ । ये वर्ण-भेद संस्था । कर्ता मैं न सर्वथा । इसीलिये ॥ ८० ॥ सृजे मैं ने वर्ण चार गुण-कर्म विभागसे । करके सब तू जान अकर्ता निर्विकार मैं ॥ १३ ॥ ज्ञानेश्वरी ११४

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