ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 186, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः । कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः ॥ २० ॥ कर्मयोगीके लक्षण— शरीरमें जो उदास । फल-भोगमें निरास । निरंतर स-उल्हास । रहता है ॥ ६ ॥ संतोष-भवनके भोजमें । आत्मयोग मृष्टान्न भोगमें । न कहता कभी न मनमें । जान तू पार्थ ॥ ७ ॥ निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः । शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥ २१ ॥ यदृच्छालाभसंतुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः । समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते ॥ २२ ॥ नित्य अधिकाधिक प्यारी । ले महासुखकी माधुरी । आशाको न्योच्छावर करी । अहंभाव-सह ॥ ८ ॥ तभी जिस अवसरमें जो पाया । उससे ही वह नित है सुखाया । उसको अपना और पराया । दोनों नहीं ॥ ९ ॥ दृष्टिसे यह जो देखता । वह है आपही हो जाता । जिसको है वह सुनता । बनता वही ॥ १० ॥ पैरसे जो चलता । मुखसे जो बोलता । वह जो चेष्टा करता । बनता स्वयं ॥ ११ ॥ नित्य तृप्त निराधार न रखे फल वासना । हुआ है लीन कर्मोंमें तो भी कुछ करें नहीं ॥ २० ॥ संयमी तजके सारा इच्छा सह परिग्रह । देहसे करता कर्म उसे दोष न स्पर्शता ॥ २१ ॥ मिले जो उसमें तुष्ट न जाने द्वंद्व मत्सर । फले जले उसे एक करके कर्म-मुक्त जो ॥ २२ ॥ ज्ञानेश्वरी ११८