ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
उससे विरक्ति ज्वालायें निकलतीं । उसमें विकारोंकी समिधा जलती । तब है आशाकी घुमकडी छूटती । पांचही कुंडोंमें ॥ २९ ॥ फिर वे विधि वाक्यके ही अनुकूल । विषय आहुतियां देकर बहुल । हवन करते कुंडमें स-कुशल । इंद्रियाग्निके ॥ १३० ॥ सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे । आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते ॥ २७ ॥ इस भांति कोई पार्थ । दोष धोते हैं सर्वथा । हृदयारणिमें मंथा । विवेक किया ॥ ३१ ॥ उसे पकड कर निग्रहसे । दबाकर अति धीरजसे । गुरु उपदेशके जोरसे । रवींचा पार्थ ॥ ३२ ॥ समरसतासे मंथन किया । तत्काल इसका फल आया । फिर वहां उद्दीपन भया । ज्ञानाग्निका ॥ ३३ ॥ पहला ऋध्दि सिध्दिका संभ्रम । वह निवारण हुआ तो धूम । फिर वहां प्रकट हुआ सूक्ष्म । विस्फुलिंग ॥ ३४ ॥ उसमें डाला मन मुक्त । यम दमसे जो था रिक्त । इंधन बना जो सयुक्त । अपने आप ॥ ३५ ॥ उठीं उसमें ज्वालायें समृद्ध । पडी तब वासनाकी समिध । समता स्नेह-युत नाना विध । जलनेमें ॥ ३६ ॥ वहां सोऽहं मंत्रसे दीक्षित । इंद्रिय कर्मकी आहुति नित । देना ज्ञानानलमें प्रदीप्त । यज्ञ-कुंडमें ॥ ३७ ॥ फिर प्राण क्रियाकी सुवासे । यज्ञमें पड़ी पूर्णाहुतिसे । होता अवभृत सहजतासे । समरसका ॥ ३८ ॥ प्राणेंद्रिय क्रिया कोयी सभी आहुति देकर । अंतरमें समाधिको जगाते चिंतनाग्निसे ॥ २७ ॥ १२१ ज्ञान-कर्म-संन्यासयोग (16)
तब है आत्म-बोधका सुख । जो संयमाग्निका हुत-शेष । वही पुरोडासु किया देख । सहज सेवन ॥ ३९ ॥ ऐसे यज्ञ-कार्यसे अनेक । मुक्त हुए त्रिभुवनमें देख । यहां यज्ञ क्रियायें हैं अनेक । प्रापव्य एक ॥ १४० ॥ द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे । स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः ॥ २८ ॥ कर्मयोगीके विविध यज्ञ— एक द्रव्य यज्ञ कहलाता । दूजा तप उत्पन्न करता । तथा योगयाग ही बनता । ऐसा है कहा ॥ ४१ ॥ जिसमें शब्दमें शब्द यजना । उसको वाग्यज्ञ है कहना । जिसमें ज्ञानसे ज्ञेयकी जानना । वह है ज्ञानयज्ञ ॥ ४२ ॥ अर्जुन यह सब कठिन । अनुष्ठानका महा-बंधन । किंतु जितेंद्रियको आसान । योग्यता रूप ॥ ४३ ॥ यहां है जो प्रवीण । योग समृद्धि संपन्न । किया आत्म-हवन । अपनेसे ॥ ४४ ॥ अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे । प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः ॥ २९ ॥ अपानाग्निके मुखमें फिर । प्राण द्रव्यको अर्पण कर । हवन करते हैं धनुर्धर । अभ्यास-योगसे ॥ ४५ ॥ कोई अपानको प्राणमें होमते । या प्राणापानका निरोध करते । ये प्राणायामी है कहलाते । पांडुकुमार ॥ ४६ ॥ द्रव्य जप तप योग स्वाध्याय और चिंतन । संयमी करते यज्ञ रखके व्रत उग्र जो ॥ २८ ॥ होमते परस्परमें कोयी प्राण अपानको । रोकते गति दोनोंकी प्राणायाम परायण ॥ २९ ॥ ज्ञानेश्वरी १२२
अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति । सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः ॥ ३० ॥ या वज्रयोगक्रमसे । सर्वोहार संयमसे । प्राणमें प्राणार्पणसे । हवन करते ॥ ४७ ॥ ऐसे मोक्ष काम सकल । सारे हैं ये यजनशील । यज्ञसे जिन्होने मनोमल । किया क्षालन ॥ ४८ ॥ जिसका जला अविद्या जात । रहा जो निज स्वभावगत । जहां अग्नि औ' होताका द्वैत । रहा नहीं ॥ ४९ ॥ यहां यजित होता काम हृत । यज्ञका विधान होता समाप्त । जहांसे फिर सारे क्रिया-जात । होते नष्ट ॥ ५० ॥ विचार यहां नहीं घुसता । यहांसे न हेतु निकलता। द्वैत जो संग-दोषसे होता । स्पर्शता नहीं ॥ ५१ ॥ यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् । नायंलोकोऽस्त्ययज्ञस्यकुतोऽन्यः कुरुसत्तम ॥ ३१ ॥ अनादि सिद्ध जो ऐसा ज्ञान । यज्ञमें जो बचता पावन । ब्रह्म-निष्ठ करते सेवन । स-ब्रह्ममंत्र ॥ ५२ ॥ शेषामृतसे जेवे तृप्त । अमर्त्य भावको प्राप्त । ऐसे ब्रह्मत्वमें पूर्त । अनायाससे ॥ ५३ ॥ जिन्हें माला न पडती विरक्तिकी । सेवा नहीं घडती संयमाग्निकी । पहचान न होती योग-यागकी । जन्म लेकर ॥ ५४ ॥ जिनका नहीं ऐहिक नेक । बात क्या कहें पार-लौकिक । बात कहना है व्यर्थ देख । धनंजय ॥ ५५ ॥ प्राणमें होमते प्राण आहार कर निश्चित । सभी ये हैं यज्ञ-वेत्ता जलाते पाप यज्ञसे ॥ ३० ॥ यज्ञ-शेष-सुधा भोजी पाते हैं ब्रह्म शाश्वत । यज्ञ विना न यहां तो कहांका परलोक है ॥ ३१ ॥ १२३ ज्ञान-कर्म-संन्यासयोग
एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे। कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे ॥ ३२ ॥ अनेक प्रकारके ऐसे । याग कहे हैं तुझसे । वेदमें अति-विस्तारसे । कहे हैं सब ॥ ५६ ॥ विस्तारसे क्या है जानना । इसे कर्म सिद्ध अनुभवना । कर्म-बंधसे मुक्त होना । स्वभावसे ॥ ५७ ॥ श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परंतप । सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते ॥ ३३ ॥ कर्मयोगीके विविध यज्ञोंकी तुलना- जिसका है वेद मूल । क्रिया विशेष है स्थूल । उसका अपूर्व फल । स्वर्ग-सुख है ॥ ५८ ॥ द्रव्ययाग होते हैं तो श्रेष्ठ । किंतु ज्ञान यज्ञसे कनिष्ठ । जैसे तारा-तेज होता नष्ट । सूर्यके सम्मुख ॥ ५९ ॥ परमात्म-सुख निधान । साधनेमें है योगीजन । डालते नित ज्ञानांजन । उन्मेष-नेत्रमें ॥ १६० ॥ कर्मयोग समाप्तिका जो स्थान । नैष्कर्म्य बोधकी है खान । क्षुधार्तिको है अमृतान्न । साधनाका ॥ ६१ ॥ जहां प्रवृत्ति पंगु होती । तर्क-दृष्टि अंधी होती । इंद्रियां सब भूल जाती । विषय संग ॥ ६२ ॥ मिटता ममत्व मनका । औ' शब्दत्व शब्द-मात्रका । जिसमें मिलता ज्ञानका । ज्ञेय मात्र ॥ ६३ ॥ नाना प्रकारके ऐसे वेदोंमें यज्ञ जो कहे । कर्मसे निकले जान पायेगा मुक्ति जानके ॥ ३२ ॥ ज्ञान-यज्ञ सदा श्रेष्ठ जानना द्रव्य-यज्ञसे । समाते हैं सभी कर्म ज्ञानमें पूर्ण रूपसे ॥ ३३ ॥ ज्ञानेश्वरी १२४
मिटता दारिद्र्य वैराग्यका । दृढ़ता हव्यास विवेकका । मिलन होता जहां आत्माका । सहज भावसे ॥ ६४ ॥ तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया । उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥ ३४ ॥ ज्ञान प्राप्तिका साधन— अजी ! वह जो उत्तम ज्ञान । प्राप्त करना हो तो महान । करना है संतोंका भजन । सर्व भावसे ॥ ६५ ॥ वे हैं इस ज्ञानका घर । सेवा उसका महाद्वार । सेवासे ही पांडुकुमार । पाना है उसे ॥ ६६ ॥ अजी ! तन मन प्राणसे । लगना उन चरणसे । करना निराभिमानसे । सकल दास्य ॥ ६७ ॥ पूछके तब इच्छित प्रश्न । पाना है उनसे वह ज्ञान । उस बोधसे अंतःकरण । होगा कामना रहित ॥ ६८ ॥ यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव । येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि ॥ ३५ ॥ वाक्य प्रकाशसे उनके । मिटेंगे संशय चित्तके । तब होगा ब्रह्म रूपके । ज्ञान निश्चित ॥ ६९ ॥ फिर अपने सहित । अन्य सभी भूत जात । मेरे रूपमें अखंडित । देखेगा तू ॥ १७० ॥ ऐसा ज्ञान प्रकाश पायेगा । मोह-अंधकार दूर होगा। जब गुरु-कारुण्य होगा । धनुर्धर ॥ ७१ ॥
सेवा द्वारा नम्रतासे जान ले ज्ञान प्रश्नसे । देंगे अनुभवी संत सत्वज्ञ ज्ञान-तत्व जो ॥ ३४ ॥ जान कर वह ऐसा न होगा भ्रांत तू कभी । मुझमें और आत्मामें देखेके जीव-मात्रको ॥ ३५ ॥ १२५ ज्ञान कर्म-संन्यासयोग
अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः । सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं संतरिष्यसि ॥ ३६ ॥ ज्ञानकी महानता-- यदि है आगर पापका । महासागरही है भ्रांतिका । हिमालय ही है व्यामोहका । तो भी पार्थ ॥ ७२ ॥ इस ज्ञान शक्तिके सम्मुख । यह सब कुछ नहीं देख । उसका सामर्थ्य है विशेष । ज्ञानका यहां ॥ ७३ ॥ निरास है विश्व भ्रमका । विस्तार है जो अमूर्तका । प्रकाश भी यहां उसका । अपर्याप्त ॥ ७४ ॥ उसकेलिये क्या मनोमल । बोलनेमें भी तुच्छसा बोल । उसके सम्मुख तुल्य बल । नहीं विश्वमें ॥ ७५ ॥ यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन । ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ॥ ३७ ॥ अजी ! धूलको जो भुवनत्रयकी । गगनमें उडानेवाली आंधिकी । रुकावट होगी कैसी बादल्की । कह तू धनंजय ॥ ७६ ॥ अथवा पवनसे जो प्रक्षुब्ध । प्रलयाग्नि करता जलको दग्ध । होगा क्या वह कहो अवरुद्ध । तृणकाष्ठसे ॥ ७७ ॥ न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते । तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति ॥ ३८ ॥ पापियोंमें महा पापी होगा यदि शिरोमणि । तो भी तू ज्ञान-नौकासे तरेगा पाप-सागर ॥ ३६ ॥ संपूर्ण जलती आग करती राख काष्ठको । वैसे ज्ञानाग्नि है सारा जलाता सर्व कर्मको ॥ ३७ ॥ ज्ञान सम न है अन्य पवित्र जगमें कुछ । योग-युक्त यथा काल पाये जो निजमें स्वयं ॥ ३८ ॥ ज्ञानेश्वरी १२६
असंभव है ऐसा होना । अशक्य है ऐसा सोचना । जगतमें ज्ञान समान । पवित्र नहीं कछु ॥ ७८ ॥ ज्ञान यहां अति उत्तम है । ऐसा क्या अन्य समान है । ज्ञान जो महा चैतन्य है । विश्वमें ॥ ७९ ॥ इस महातेज पे कसनेसे । निर्मल है यह सूर्य बिंबसे । समेटलें यह समेटनेसे । आकाशको भी ॥ १८० ॥ या तौलकर देखनेमें । इस पृथ्वीकी तुलनामें । यदि कुछ है तो विश्वमें । ज्ञान ही है ॥ ८१ ॥ बहुविध विचारनेसे । पुनः पुनः सोचनेसे । पवित्र यहां ज्ञानसे । ज्ञान ही है ॥ ८२ ॥ खोजनेसे अमृतका रस जैसा । अमृतमें ही मिलता है वैसा । ज्ञानके समान ज्ञान ही वैसा । जानना पार्थ ॥ ८३ ॥ इस पर है अब बोलना । व्यर्थका है समय बिताना । सच कहता सुन अर्जुन । जो कहा तूने ॥ ८४ ॥ उस ज्ञानको तब कैसे जानना । अर्जुनके मनमें यह पूछना । जानकर उसकी मनो कामना । कहा अच्युतने ॥ ८५ ॥ फिर कहता है किरीटी । चित दे सुन यह गोष्ठी । कहता हूँ ज्ञानकी भेटी । होगी कैसी ॥ ८६ ॥ श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः। ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥ ३९ ॥ आत्म-सुखकी माधुरीसे । उकताता है विषयोंसे । इंद्रियोंका कभी उनसे । न होता भाव ॥ ८७ ॥ मनमें जो चाह नहीं धरता । प्रकृति कर्मको न स्वीकारता । सुख रूप होकरके रहता । श्रद्धा भोगमें ॥ ८८ ॥ श्रद्धालु ज्ञान पाता है संयमी नित्य सावध । ज्ञानसे शीघ्र पाता है शांति अंतिम पावन ॥ ३९ ॥ १२७ ज्ञान-कर्म-संन्यास योग
अध्याय ४: ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
ज्ञान है जो थिर वांछित । मिले वह उसे निश्चित । जिसमें होती अचुंबित । शांति-सुख ॥ ८९ ॥ हृदयमें जब ज्ञान होता । तब शांति-अंकुर फूटता । उससे विस्तार प्रकटता । आत्मबोधका ॥ ९० ॥ फिर जहां देखे वहां । सर्वत्र ही जहां तहां । न दीखे तीर है कहां । शांति सिंधुका ॥ ९१ ॥ ऐसा यह उत्तरोत्तर । ज्ञान बीजका है विस्तार । कहा है उसको अपार । धनंजय ॥ ९२ ॥ अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति । नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः ॥ ४० ॥ संदेह विनाशका घर है— जिन प्राणियोंमें ज्ञानकी । चाह नहीं वह पानेकी । क्या कहें ऐसे जीवनकी । उससे भली मौत ॥ ९३ ॥ शून्य है जैसे गृह । या प्राण बिनु देह । है जीवित सम्मोह । ज्ञानके बिन ॥ ९४ ॥ हुआ नहीं प्राप्त वह ज्ञान । चाह करता पानेका मन । तब है आशा यह तू जान । पानेकी वह ॥ ९५ ॥ किंतु बात है कैसे ज्ञानकी । आस्था नहीं मनमें उसकी । तो पड़ा है संदेह रूपकी । अग्निमें वह ॥ ९६ ॥ जब अमृत भी नहीं भाता । ऐसा आस्वाद-स्वभाव होता । तभी जानना मरण आता । निकट सत्वर ॥ ९७ ॥ विषय सुखमें जो है रंगता । ज्ञानसे नित विमुख रहता । निश्चय ही संशयमें पड़ता । जानना वह ॥ ९८ ॥ न है ज्ञान न है श्रद्धा संशयीका विनाश है । दोनों ही लोकमें पार्थ न पाता सुख संशयी ॥ ४० ॥ ज्ञानेश्वरी १२८
डूबा यदि संशय सागरमें । नष्ट हुआ निश्चित जीवनमें । वंचित हुआ इह औ' परमें । सुखसे वह ॥ ९९ ॥ किसीको जब कालज्वर आता । वह जैसे शीतोष्ण न जानता । जैसे वह चांदनी औ' उष्णता । मानता एक-सा ॥ २०० ॥ वैसे वह जो सत औ' असत । अनुकूल औ' प्रतिकूल बात । नहीं जानता हित औ' अहित । संशयग्रस्त जो ॥ १ ॥ यह है दिवस औ' यह रात । जन्मांध न जानता यह बात । वैसे ही होता है संशयग्रस्त । मनमें सदा ॥ २ ॥ तभी संशयसे भयंकर । अन्य नहीं पाप कोई घोर । वह है विनाशका भंवर । प्राणियोंका ॥ ३ ॥ इस कारणसे तुझे तजना । पहले इस बातको जानना । ज्ञानाभावमें इसका रहना । जान निश्चित ॥ ४ ॥ पड़ता अज्ञानका गहरा अंधार । बढ़ता यह चितमें अपरंपार । जिससे है पथावरोध धनुर्धर । श्रद्धाका सदा ॥ ५ ॥ योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसंछिन्नसंशयम् । आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनंजय ॥ ४१ ॥ ज्ञान खड्ग— हियमें ही यह नहीं समाता । बुद्धि पर भी पर्दा डालता । जिससे संशयात्मक हो जाता । भुवन-त्रय ॥ ६ ॥ इतना है इसका बडप्पन । उसे जीवनका एक साधन । यदि करमें होता है महान । ज्ञान खड्ग ॥ ७ ॥ उस तीखे ज्ञान खड्गसे । मिटता यह मूल रूपसे । मल होता मनका जिससे । सदा निर्मूल ॥ ८ ॥ योगसे छांटके कर्म ज्ञानसे छिन्न संशय । जो सावधान आत्मामें उसे कर्म न बांधते ॥ ४१ ॥ (17) १२९ ज्ञान-कर्म-संन्यासयोग
तस्मादज्ञानसंभूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः । छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत ॥ ४२ ॥ इस कारणसे तू पार्थ । नष्ट करके हृदयस्थ । संशय अब सर्वथा । ऊठ सत्वर ॥ ९ ॥ ऐसा सर्वज्ञोंका बाप । श्रीकृष्ण जो ज्ञानदीप । कहता वह सकृप । सुनो राजन् ॥ २१० ॥ कथा यह पूर्वापर । अर्जुन विचारकर । पूछेगा प्रश्न सत्वर । समयोचित ॥ ११ ॥ उस कथाकी संगति । भावकी है संपत्ति । उसकी है उन्नति । कहेगा हरि ॥ १२ ॥ उसकी उत्तमता पर । आठो रस हैं न्योच्छावर । वह है सज्जनोंका घर । आसरेका ॥ १३ ॥ प्रकट करेगा शांति-रस निर्मल । है वह महासागरसे भी खोल । मेरी देश-भाषाका अनमोल बोल । अर्थपूर्ण ॥ १४ ॥ बिंब दीखता है हथेली समान । प्रकाशमें ओछा होता त्रिभुवन । अनुभवना ऐसी व्याप्ति महान । शब्दार्थकी ॥ १५ ॥ अजी ! कामितार्थकी जो आशा । फलती कल्पवृक्षमें जैसा । बोल हैं अति व्यापक ऐसा । सुननाजी ॥ १६ ॥ रहने दो अब है क्या कहना । सर्वज्ञ जानते मनो कामना । फिर भी करता नम्र प्रार्थना । सुनना चित्त देके ॥ १७ ॥ यहां साहित्य तथा शांति । वैसे रेखा शब्द पद्धति । जैसे लावण्य गुण कुलवति । तथा पतिव्रता ॥ १८ ॥ पहले ही प्रिय है शक्कर । मिलती पथ्यके नाम पर । खाना या न ग्वाना बात फिर । रहती कहां ? ॥ १९ ॥ तभी हृदयका सारा अज्ञान-कृत संशय । ज्ञानके खड्गसे तोड ऊठ तू योग साधके ॥ ४२ ॥ ज्ञानेश्वरी १३०
मळयानिलय मंद सुगंध । उसमें मिला अमृतका स्वाद । उसके साथ हो सुस्वर नाद । दैव-गतिसे ॥ २२० ॥ स्पर्शसे सर्वांग शांत करता । माधुरीसे रसनाको नचाता । श्रवणेंद्रियसे है कहलाता । भला भला ॥ २१ ॥ वैसे है इस कथाका सुनना । कानोंका है प्रसन्न होना । संसार-दुःखका मूलसा होना । उच्चाटन ही ॥ २२ ॥ मंत्रसे यदि शत्रु मरता । कौन तलवार बांधता । दूध मधुसे रोग जाता । कौन पीवे नीम ॥ २३ ॥ वैसे मनको न मारते । इंद्रियोंको न सताते । अनायास ही मोक्ष पाते । श्रवण-मात्रसे ॥ २४ ॥ सुन सब हो प्रसन्न मन । करके गीतार्थका चिंतन । ज्ञानदेवका यह वचन । जो है निवृत्तिका दास ॥ २२५ ॥ गीता श्लोक ४२ ज्ञानेश्वरी ओवी २२५
५ कर्म-संन्यासयोग अर्जुन उवाच संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि । यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम् ॥ १ ॥ पार्थका प्रश्न, कर्म-संन्यास या कर्म-योग— पार्थ कहता फिर श्रीकृष्णसे । आपका बोलना यह भी कैसे । एक हो तो अंतःकरणसे । सोचे उसको ॥ १ ॥ पहले कहा संन्यास कर्मका । तूने किया था निरूपण् उसका । अब कहता अतिशय कर्मका । कैसे अनंत ॥ २ ॥ कैसी यह दो अर्थकी बात । हमारा अज्ञानियोंका चित्त । अपने आप कहे अनंत । समझेगा कैसे ॥ ३ ॥ सार तत्वको कहना । एक निष्ठासे बोलना । और क्या कहूं कहना । तुझसे अब ॥ ४ ॥ तभी कहा मैंने तुझसे । प्रभुजनोंसे विनयसे । परमार्थको द्वि-अर्थसे । कहना नहीं ॥ ५ ॥ अर्जुनने कहा कहता कर्म-संन्यास वैसे ही योग भी कभी । दोनोंमें जो भला एक कह तू मुझ निश्चित ॥ १ ॥
हुआ जो वह जाने देना । अबकी यह सुलझा देना । इन दोनोंमें अब बताना । मार्ग उत्तम ॥ ६ ॥ अन्त है जिसका मंगल । निश्चित है जिसका फल । अनुष्ठानमें जो सकल । शुद्ध सहज ॥ ७ ॥ जिसमें न होता नींदका भंग । किंतु कटता प्रवास मारग । ऐसा सुखासनसा सुभग । तथा सरल ॥ ८ ॥ अर्जुनके इस वचनसे । रीझे हरि अंतःकरणसे । फिर कहा अति संतोषसे । ऐसा ही होगा ॥ ९ ॥ माय जो कामधेनुसी । रहती साथ छायासी । मांगनेसे चंदा भी जैसी । देती खेलने ॥ १० ॥ शंभुने प्रसन्न चित्त । उपमन्युको जो आर्त । दिया जैसा दूध भात । क्षीराब्धी ही ॥ ११ ॥ वैसा सागर जो औदार्यका । सखा बना आप अर्जुनका । क्यों न हो तब सर्व सुखका । वसति-स्थान वह ॥ १२ ॥ इसमें क्या है कौतुक । लक्ष्मीकांत है मालिक । तो क्यों न मांगे ऐच्छिक । वरदान ॥ १३ ॥ मांगा था जो अर्जुनने । “दिया” कहा श्रीकृष्णने । कहा क्या तब हरिने । वही कहूंगा ॥ १४ ॥ भगवान उवाच संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयस्करावुभौ । तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते ॥ २ ॥ कर्मयोग अधिक श्रेयस्कर— हरि कहे सुन कुंती-सुत । विचार करने पर चित्त । संन्यास योग दोनों तत्वतः । हैं मोक्ष-दायक ॥ १५ ॥ श्रीभगवानने कहा कर्म-संन्यास औ' योग एक-से मोक्ष-दायक । किंतु संन्याससे माना कर्म-योग विशेष है ॥ २ ॥ १३३ कर्म-संन्यासयोग
किंतु जान अनजानको सकल । आचरणमें कर्मयोग सरल। जैसे स्त्री बालक भी नांवके बल । तैरते सागर ॥ १६ ॥ सरासरी विचारनेसे । मार्ग यह सरल ऐसे । संन्यास फल मिले इससे । अनायास ॥ १७ ॥ करूंगा अब कथन । संन्यासका जो लक्षण । सहज हैं ये अभिन्न । जानेगा तू ॥ १८ ॥ ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति । निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते ॥ ३ ॥ नैष्कर्म्यका अर्थ आलस्य नहीं— गतको जो भुलाना । प्राप्तव्यको तजना । मेरु-सा स्थिर होना । अंतरमें ॥ १९ ॥ मैं मेरा ऐसा सब स्मरण । भूला जिसका अंतःकरण । उसीको तू संन्यासी जान । निरंतर ॥ २० ॥ मनसे जो ऐसा हुवा । संगसे सदा मुक्त हुआ । जिसको है प्राप्त हुआ । शाश्वत सुख ॥ २१ ॥ गृह आदिका तब पूर्ण । तजनेका नहीं कारण । आसक्त स्वभावका मन । हुआ असंग ॥ २२ ॥ आग जब बुझ जाती । केवल राख रहती । कपास भी लपेटती । वैसे ही ॥ २३ ॥ रहकर भी उपाधिमें । न पड़ता कर्म-बंधमें । न रहा जिसकी बुद्धिमें । संकल्प बीज ॥ २४ ॥ कल्पनाका साथ जब टूटता । तभी संन्यास सहज बनता । इससे दोनों एक हो जाता । कर्म औ' संन्यास ॥ २५ ॥ जानो जो नित्य संन्यासी राग-द्वेष नहीं जिसे । द्वंद्वसे दूर जो होता सुखसे बंध-मुक्त भी ॥ ३ ॥ ज्ञानेश्वरी १३४
सांख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः । एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम् ॥ ४ ॥ नहीं तो सुन पार्थ । हैं जो मूर्ख सर्वथा । वे सांख्य कर्म संस्था । जानेंगे कैसे ॥ २६ ॥ स्वभावसे जो अज्ञान । तभी कहते हैं भिन्न । एकेक दीपका भिन्न । प्रकाश होता क्या ? ॥ २७ ॥ करके एकका आचरण । अनुभव किया है संपूर्ण । कहते हैं अनुभव ज्ञान । दोनोंका एक ॥ २८ ॥ यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते । एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति ॥ ५ ॥ सांख्यसे जो मिलता । योगसे वही प्राप्त होता । तभी है दोनोंमें एकता । सहज भावसे ॥ २९ ॥ देख आकाश औ' अवकाश । जिसमें भेद नहीं है जैसा । योग तथा संन्यास भी ऐसा । है अभिन्न ॥ ३० ॥ जिसने सांख्य योग अभिन्न । देखा है उसको हुवा ज्ञान । उसने आत्मरूप दर्शन । किया सहज ॥ ३१ ॥ संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः । योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति ॥ ६ ॥ है जो युक्त पंथसे पार्थ । चढते हैं मोक्ष पर्वत । महा सुखका वे निश्चित । पायेंगे शिखर ॥ ३२ ॥ सांख्य औ' योग है भिन्न कहते अज्ञ-लोग जो । दोनोंमें एकसी निष्ठा दोनोंका फल एक है ॥ ४ ॥ पाते हैं स्थान जो सांख्य योगीको मिलता वह । दोनोंका एक ही रूप देखे जो जानता वह ॥ ५ ॥ योगके बिन संन्यास सुखसे मिलता नहीं । मुनि जो योगसे युक्त पाता है शीघ्र ब्रह्मको ॥ ६ ॥ १३५ कर्म-संन्यासयोग
जो यह योग स्थिति है तजता । व्यर्थ ही उलझनमें पड़ता । उससे प्राप्त कभी नहीं होता । संन्यास साध्य ॥ ३३ ॥ योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः । सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते ॥ ७ ॥ संकल्पशून्य मन चैतन्यमय हो, सर्वव्यापी बनता है— जिसने भ्रांतिसे है छुड़ा लिया । गुरुवाक्यसे मनको धो दिया । आत्म रूपमें फिर ढाल दिया । धुलकर ॥ ३४ ॥ सागरमें जब नून गिरता । तब तक वह अल्प रहता । फिर वह समुद्रसा बनता । विलीन होकर ॥ ३५ ॥ वैसे तो संकल्पसे हुआ भिन्न । चैतन्य रूप हुआ उसका मन । सीमित होकर भी तनसे मन । व्यापता लोकत्रय ॥ ३६ ॥ कर्ता कर्म फिर काज । कटा जिसका सहज । अनुभवता वह सहज । अकर्तापन ॥ ३७ ॥ नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्ववित् । पश्यञ्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपन्श्वसन् ॥ ८ ॥ प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् ॥ ९ ॥ जिसका मन अर्जुन । मैं देह हूं यह भान । भूला उसे न रहा जान । कर्तापन कछु ॥ ३८ ॥ चित्तसे शुद्ध जो योगी जीतके मन इंद्रिय । बना है जीव भूतोंका करके भी अलेप जो ॥ ७ ॥ मानके अकर्ता आप योगी तत्वज्ञ जो नित । देखें सुने छुये सूंघे खाये सुवे चले करे ॥ ८ ॥ बोले छोडे पकडे या हिलावे बरुनी यदि । इंद्रिया करतीं आप अपना कर्म जानता ॥ ९ ॥ ज्ञानेश्वरी १३६
तन त्यागके बिन । अमूर्तके जो गुण । दीखते हैं संपूर्ण । योग-युक्तमें ॥ ३९ ॥ वैसे उसका भी होता शरीर । अन्योंकी भाँति करता व्यापार । एक जैसा सबका व्यवहार । उसका भी ॥ ४० ॥ वह भी आंखोंसे देखता । वैसे ही कानसे सुनता । किंतु वह लिप्त न होता । उसमें कभी ॥ ४१ ॥ यदि वह सबको स्पर्शता । घ्राणसे परिमल भी लेता । समयोचित वह बोलता । सबके भाँति ॥ ४२ ॥ आहारको स्वीकारता । तजना जो तजता । निद्रा समयमें सोता । सुखसे वह ॥ ४३ ॥ अपनी ही इच्छासे । वह चलता जैसे । सकल कर्म वैसे । चलते हैं ॥ ४४ ॥ यह कहना क्या एकेक । देखें श्वासोच्छ्वासादिक । वैसे ही निमिषोन्निमिष । आदि सब ॥ ४५ ॥ पार्थ वह सब करता । कोई कर्म नहीं छोड़ता । किया ऐसा बोध न होता । प्रतीतिसे ॥ ४६ ॥ भ्रांतिकी सेज पर जो सोया था । स्वप्न रंजनमें जो उलझा था । ज्ञानोदयसे वह 'है, जगा था । इसीलिये ॥ ४७ ॥ ब्रह्मण्याधाय कर्माणि संगं त्यक्त्वा करोति यः । लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवांभसा ॥ १० ॥ चैतन्यके आश्रयसे अब । इंद्रियोंकी वृत्तियां सब । बरतती हैं अपने तब । स्वभावसे ॥ ४८ ॥ जैसे दीपकके प्रकाशसे । व्यापार होते घरके जैसे । चलते शरीर कर्म वैसे । योगयुक्तके ॥ ४९ ॥ ब्रह्मार्पित करे कर्म करता संग छोड़के । न होता पापसे लिप्त जलमें पद्म-पत्रसा ॥ १० ॥ (18) १३७ कर्म-संन्यासयोग
सभी कर्म है वह करता । कर्म बंधनमें नहीं आता । जैसे पानीमें नहीं भीगता । पद्मपत्र ॥ ५० ॥ कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिंद्रियैरपि । योगिनः कर्म कुर्वंति संगं त्यक्त्वाऽत्मशुद्धये ॥ ११ ॥ कर्मकी विविधता-विवेचन— जो बुद्धिकी भाषा नहीं जानता । मनमें अंकुर नहीं फूटता । ऐसा व्यापार जो तनसे होता । वह शरीर कर्म ॥ ५१ ॥ इसीको स्पष्ट रूपसे कहता । जैसा बालकका कर्म है होता । योगीका कर्म वैसे ही रहता । केवल तनसे ॥ ५२ ॥ जब पंच भौतिक तन । रहता है निद्रामें लीन । कार्य करता तब मन । स्वप्न रूपमें ॥ ५३ ॥ आश्चर्य देख तू धनुर्धर । कितना है वासना विस्तार । देहको नहीं होता जागर । भोगता सुख दुःख ॥ ५४ ॥ इंद्रियोंका स्पर्श भी न करता । ऐसा व्यापार जो होता रहता । यह केवल कर्म कहलाता । मनका ही ॥ ५५ ॥ वह कर्म भी योगी करता । किंतु उससे बद्ध न होता । उसका साथ छूटा रहता । अहंकारसे ॥ ५६ ॥ जैसे होता है भ्रम हत । पिशाच स्पर्शसे जो चित्त । करता इंद्रियां चेष्टित । विकल रूपसे ॥ ५७ ॥ रूप भी है वह देखता । कानसे भी वह सुनता । शब्द भी है वह बोलता । पर बेभान हो ॥ ५८ ॥ यह जो है बिन प्रयोजन । जो कुछ वह करता जान । वह केवल कर्म है मान । इंद्रियोंका ॥ ५९ ॥ केवल इंद्रियोंसे या शरीर मन बुद्धिसे । आत्म-शुद्ध्यर्थ ही योगी करे कर्म असंग हो ॥ ११ ॥ ज्ञानेश्वरी ११८
सर्वत्र फिर जाननेका । कार्य रहता जो बुद्धिका । यह कथन है हरिका । अर्जुनसे ॥ ६० ॥ बुद्धिको आधार मानकर । कर्म करते चित्त देकर । किंतु वे नैष्कर्म्यसे पर । मुक्त दीखते ॥ ६१ ॥ बुध्दिसे तन तक कहीं । अहंकारका चिन्ह भी नहीं । ये कर्म करके ही वही । शुद्ध रहते ॥ ६२ ॥ कर्तृत्वभाव बिन कर्म । होता वही सही निष्कर्म । जानते ये उसका मर्म । गुरु-गम्य जो ॥ ६३ ॥ नैष्कर्म्य भावका दर्शन— शांति-रसका अब पूर । छलके पात्रके ऊपर । बोल जो वाणीसे भी पर । होते हैं व्यक्त ॥ ६४ ॥ पराधीनता इंद्रियोंकी । मिटी है संपूर्ण जिनकी । सुननेमें योग्यता उनकी । मानना यहां ॥ ६५ ॥ रहने दो अति प्रसंग । न छोड़ो जी कथाका संग । होगा श्लोक संगति भंग । इसीलिये ॥ ६६ ॥ अनाकलन जो मनसे । प्रज्ञा-घर्षण करनेसे । वही मुझे दैव कृपासे । हुआ सहज ॥ ६७ ॥ स्वभावसे जो शब्दातीत । आया शब्दके अंतर्गत । औरोंकी रही क्या है बात । क्या कहो ॥ ६८ ॥ आग्रह विशेष श्रोताओंका । जानकर दास निवृत्तिका । कहता है संवाद दोनोंका । सुनो ध्यानसे ॥ ६९ ॥ कहता है कृष्ण अर्जुनसे । प्राप्तोंका लक्षण होता कैसे । कहता तुम्हें पूर्ण रूपसे । सुनो चित्त देकर ॥ ७० ॥ युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शांतिमाप्नोति नैष्ठिकम् । अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते ॥ १२ ॥ फलको तजके योगी पाता है शांति निश्चल । अ-योगी फलका भोगी वासनामें फंसा रहा ॥ १२ ॥ १९९ कर्म-संन्यासयोग
संपन्न होता जो आत्म योगसे । उदासीन कर्म फल भोगसे । रमती शांति सदैव उससे । अपने आप ॥ ७१ ॥ अर्जुन जो कर्म बंधसे । अभिलाषाकी ही डोरीसे । बांधा जाता है खूंटेसे । फल भोगके ॥ ७२ ॥ सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्याऽस्ते सुखं वशी । नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन् ॥ १३ ॥ करता जैसे फलकामनासे । सभी कर्म वह करता वैसे । करता है फिर पूर्ण रूपसे । उपेक्षा उसकी ॥ ७३ ॥ जिस ओर उसकी दृष्टि । होती वहां सुखकी सृष्टि । जहां वह कहता वृष्टि । होती महा-बोधकी ॥ ७४ ॥ नवद्वारके देहमें जैसे । रहकर न रहता वैसे । करके सब न करे वैसे । रहे फलत्यागी ॥ ७५ ॥ न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः । न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते ॥ १४ ॥ निष्काम कर्मयोगीकी महानता-- होता है जैसे सर्वेश्वर । जब चाहे तब निर्व्यापार । करता वही सब विस्तार । त्रिभुवनका ॥ ७६ ॥ कहें यदि उसको कर्ता । कर्ममें वह न डूबता । हाथ पैर लिप्त न होता । उदास वृत्तिसे ॥ ७७ ॥ योग-निद्राका भंग न होता । अ-कर्तापन नहीं मलता । दलभार जो खड़ा करता । महाभूतोंका ॥ ७८ ॥ मनसे छोड़के कर्म सुखसे संयमी सभी । नौ द्वार पुरमें देही कराता करता नहीं ॥ १३ ॥ नहीं कर्तृत्व लोगोंका न कर्म सृजता प्रभु । न कर्म-फल संयोग होता सब स्वभावसे ॥ १४ ॥ ज्ञानेश्वरी १४०