भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे। कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे ॥ ३२ ॥ अनेक प्रकारके ऐसे । याग कहे हैं तुझसे । वेदमें अति-विस्तारसे । कहे हैं सब ॥ ५६ ॥ विस्तारसे क्या है जानना । इसे कर्म सिद्ध अनुभवना । कर्म-बंधसे मुक्त होना । स्वभावसे ॥ ५७ ॥ श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परंतप । सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते ॥ ३३ ॥ कर्मयोगीके विविध यज्ञोंकी तुलना- जिसका है वेद मूल । क्रिया विशेष है स्थूल । उसका अपूर्व फल । स्वर्ग-सुख है ॥ ५८ ॥ द्रव्ययाग होते हैं तो श्रेष्ठ । किंतु ज्ञान यज्ञसे कनिष्ठ । जैसे तारा-तेज होता नष्ट । सूर्यके सम्मुख ॥ ५९ ॥ परमात्म-सुख निधान । साधनेमें है योगीजन । डालते नित ज्ञानांजन । उन्मेष-नेत्रमें ॥ १६० ॥ कर्मयोग समाप्तिका जो स्थान । नैष्कर्म्य बोधकी है खान । क्षुधार्तिको है अमृतान्न । साधनाका ॥ ६१ ॥ जहां प्रवृत्ति पंगु होती । तर्क-दृष्टि अंधी होती । इंद्रियां सब भूल जाती । विषय संग ॥ ६२ ॥ मिटता ममत्व मनका । औ' शब्दत्व शब्द-मात्रका । जिसमें मिलता ज्ञानका । ज्ञेय मात्र ॥ ६३ ॥ नाना प्रकारके ऐसे वेदोंमें यज्ञ जो कहे । कर्मसे निकले जान पायेगा मुक्ति जानके ॥ ३२ ॥ ज्ञान-यज्ञ सदा श्रेष्ठ जानना द्रव्य-यज्ञसे । समाते हैं सभी कर्म ज्ञानमें पूर्ण रूपसे ॥ ३३ ॥ ज्ञानेश्वरी १२४