भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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मिटता दारिद्र्य वैराग्यका । दृढ़ता हव्यास विवेकका । मिलन होता जहां आत्माका । सहज भावसे ॥ ६४ ॥ तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया । उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥ ३४ ॥ ज्ञान प्राप्तिका साधन— अजी ! वह जो उत्तम ज्ञान । प्राप्त करना हो तो महान । करना है संतोंका भजन । सर्व भावसे ॥ ६५ ॥ वे हैं इस ज्ञानका घर । सेवा उसका महाद्वार । सेवासे ही पांडुकुमार । पाना है उसे ॥ ६६ ॥ अजी ! तन मन प्राणसे । लगना उन चरणसे । करना निराभिमानसे । सकल दास्य ॥ ६७ ॥ पूछके तब इच्छित प्रश्न । पाना है उनसे वह ज्ञान । उस बोधसे अंतःकरण । होगा कामना रहित ॥ ६८ ॥ यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव । येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि ॥ ३५ ॥ वाक्य प्रकाशसे उनके । मिटेंगे संशय चित्तके । तब होगा ब्रह्म रूपके । ज्ञान निश्चित ॥ ६९ ॥ फिर अपने सहित । अन्य सभी भूत जात । मेरे रूपमें अखंडित । देखेगा तू ॥ १७० ॥ ऐसा ज्ञान प्रकाश पायेगा । मोह-अंधकार दूर होगा। जब गुरु-कारुण्य होगा । धनुर्धर ॥ ७१ ॥

सेवा द्वारा नम्रतासे जान ले ज्ञान प्रश्नसे । देंगे अनुभवी संत सत्वज्ञ ज्ञान-तत्व जो ॥ ३४ ॥ जान कर वह ऐसा न होगा भ्रांत तू कभी । मुझमें और आत्मामें देखेके जीव-मात्रको ॥ ३५ ॥ १२५ ज्ञान कर्म-संन्यासयोग