ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतब है आत्म-बोधका सुख । जो संयमाग्निका हुत-शेष । वही पुरोडासु किया देख । सहज सेवन ॥ ३९ ॥ ऐसे यज्ञ-कार्यसे अनेक । मुक्त हुए त्रिभुवनमें देख । यहां यज्ञ क्रियायें हैं अनेक । प्रापव्य एक ॥ १४० ॥ द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे । स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः ॥ २८ ॥ कर्मयोगीके विविध यज्ञ— एक द्रव्य यज्ञ कहलाता । दूजा तप उत्पन्न करता । तथा योगयाग ही बनता । ऐसा है कहा ॥ ४१ ॥ जिसमें शब्दमें शब्द यजना । उसको वाग्यज्ञ है कहना । जिसमें ज्ञानसे ज्ञेयकी जानना । वह है ज्ञानयज्ञ ॥ ४२ ॥ अर्जुन यह सब कठिन । अनुष्ठानका महा-बंधन । किंतु जितेंद्रियको आसान । योग्यता रूप ॥ ४३ ॥ यहां है जो प्रवीण । योग समृद्धि संपन्न । किया आत्म-हवन । अपनेसे ॥ ४४ ॥ अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे । प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः ॥ २९ ॥ अपानाग्निके मुखमें फिर । प्राण द्रव्यको अर्पण कर । हवन करते हैं धनुर्धर । अभ्यास-योगसे ॥ ४५ ॥ कोई अपानको प्राणमें होमते । या प्राणापानका निरोध करते । ये प्राणायामी है कहलाते । पांडुकुमार ॥ ४६ ॥ द्रव्य जप तप योग स्वाध्याय और चिंतन । संयमी करते यज्ञ रखके व्रत उग्र जो ॥ २८ ॥ होमते परस्परमें कोयी प्राण अपानको । रोकते गति दोनोंकी प्राणायाम परायण ॥ २९ ॥ ज्ञानेश्वरी १२२