भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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उससे विरक्ति ज्वालायें निकलतीं । उसमें विकारोंकी समिधा जलती । तब है आशाकी घुमकडी छूटती । पांचही कुंडोंमें ॥ २९ ॥ फिर वे विधि वाक्यके ही अनुकूल । विषय आहुतियां देकर बहुल । हवन करते कुंडमें स-कुशल । इंद्रियाग्निके ॥ १३० ॥ सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे । आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते ॥ २७ ॥ इस भांति कोई पार्थ । दोष धोते हैं सर्वथा । हृदयारणिमें मंथा । विवेक किया ॥ ३१ ॥ उसे पकड कर निग्रहसे । दबाकर अति धीरजसे । गुरु उपदेशके जोरसे । रवींचा पार्थ ॥ ३२ ॥ समरसतासे मंथन किया । तत्काल इसका फल आया । फिर वहां उद्दीपन भया । ज्ञानाग्निका ॥ ३३ ॥ पहला ऋध्दि सिध्दिका संभ्रम । वह निवारण हुआ तो धूम । फिर वहां प्रकट हुआ सूक्ष्म । विस्फुलिंग ॥ ३४ ॥ उसमें डाला मन मुक्त । यम दमसे जो था रिक्त । इंधन बना जो सयुक्त । अपने आप ॥ ३५ ॥ उठीं उसमें ज्वालायें समृद्ध । पडी तब वासनाकी समिध । समता स्नेह-युत नाना विध । जलनेमें ॥ ३६ ॥ वहां सोऽहं मंत्रसे दीक्षित । इंद्रिय कर्मकी आहुति नित । देना ज्ञानानलमें प्रदीप्त । यज्ञ-कुंडमें ॥ ३७ ॥ फिर प्राण क्रियाकी सुवासे । यज्ञमें पड़ी पूर्णाहुतिसे । होता अवभृत सहजतासे । समरसका ॥ ३८ ॥ प्राणेंद्रिय क्रिया कोयी सभी आहुति देकर । अंतरमें समाधिको जगाते चिंतनाग्निसे ॥ २७ ॥ १२१ ज्ञान-कर्म-संन्यासयोग (16)