ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतभी ब्रह्म ही उसका कर्म । बोध हुआ ऐसा उसका सम । उसका कर्तव्य ही नैष्कर्म्य । धनुर्धर ॥ २१ ॥ जिसका अविवेक कौमार्य गया । औ' विरक्तिसे पाणिग्रहण भया । फिर उपासना वहां लाया । योगाग्निसे ॥ २२ ॥ दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते । ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति ॥ २५ ॥ योगाग्निसे सतत उपासना— यजनशील है जो दिन-रात । होमते अविद्या मन सहित । गुरुवाक्य हुताशनमें नित । किया हवन ॥ २३ ॥ ये हैं योगाग्निमें यजते । इसे दैवयज्ञ हैं कहते । इससे आत्म-सुख चाहते । धनंजय ॥ २४ ॥ दैवास्तव देहका पालन । ऐसा निश्चय जिसका पूर्ण । जो न सोचता देहाभरण । दैवयोगका महायोगी ॥ २५ ॥ अब सुन तू और एक । जो हैं ब्रह्माग्निमें साग्निक । वे यज्ञमें ही यज्ञ देख । करते हैं ॥ २६ ॥ श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति । शब्दादीन्विषयानन्ये इन्द्रियाग्निषु जुह्वति ॥ २६ ॥ कर्मयोगीका ब्रह्मयज्ञ— संयम जिनका अग्नि होत्र । युक्तित्रय ही उनका मंत्र । देते इंद्रिय द्रव्य पवित्र । आहुति नित्य ॥ २७ ॥ वैराग्य रविका उदय होते । संयमका यज्ञ कुंड रचते । वहां वे प्रज्वलित करते । इंद्रियानल ॥ २८ ॥ कोयी योगी करे मात्र देव यज्ञ उपासना । कोयी ब्रह्माग्निमें वैसे जलाते यज्ञ यज्ञसे ॥ २५ ॥ श्रोत्रादि इंद्रियां कोयी होमते संयमाग्निमें । कोयी विषय शब्दादि होमते इंद्रियाग्निमें ॥ २६ ॥ ज्ञानेश्वरी १२०