भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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वह है देव किस कालका । तू भीहरि है इस कालका । तभी दीखता तेरी बातका । असंगत पन ॥ ३८ ॥ किंतु तेरा चरित्र वैसे । हम उसको जाने कैसे । तभी वह असत्य ऐसे । नहीं कहता ॥ ३९ ॥ यह बात संपूर्ण ऐसे । कहना मैं समझूं वैसे । तूने उस सूर्यको कैसे । किया उपदेश ॥ ४० ॥ भगवान उवाच बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन । तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परंतप ॥५॥ तेरे मेरे अनेक जन्म मैं जानता हूं— कृष्ण कहे तब पांडुसुत । जब था वह विवस्वत । तब मैं नहीं था ऐसा चित्त- । भ्रम है तेरा ॥ ४१ ॥ अजी ! तू नहीं जानता सब । जन्म हमारे तुम्हारे अब । बीते हैं कितने कैसे कब । यह तू भूला है ॥ ४२ ॥ मैं जिस जिस अवसरमें । अवतरा हूं जिस रूपमें । वह सब अपने मनमें । स्मरता पार्थ ॥ ४३ ॥ अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोपि सन् । प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया ॥६॥ धर्म रक्षणके लिये मेरा अवतार-- इसीलिये मुझे संपूर्ण । बीतेका होता है स्मरण । रहित मैं जन्म मरण । जन्मता प्रकृति योगसे ॥ ४४ ॥ श्रीभगवानने कहा बीते मेरे कयी जन्म तेरे भी बहु अर्जुन । जानता मैं सभी बातें तू उन्हे जानता नहीं ॥ ५ ॥ होते हुये अजन्मा मैं निर्विकार जगत्प्रभु । जन्मता हूं स्वमायासे प्रकृति ओढके निज ॥ ६ ॥ ज्ञानेश्वरी ११०