ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमेरे जीवनका यह गुपित । तुझसे छिपाना नहीं उचित । तू है मेरा आत्मीय बहुत । इसीलिये ॥ २८॥ प्रेमका तू पुतला । भक्तिका है जिव्हाला । मित्रताकी चित्कला । धनुर्धर ॥ २९॥ मेरा निकट तू अर्जुन । कैसे करूं तेरी वंचना । रण सज्ज हुए समान । हम दोनों ॥ ३० ॥ अन्य सब अब रहने देना । कोलाहलका विचार न करना । अज्ञान सब तेरा दूर करना । इसी समय ॥ ३१॥ अर्जुन उवाच अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः । कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति ॥४॥ आजके तूने विवस्वतसे कैसे कहा ?— अर्जुन कहता है तब श्रीधर । माता प्रेम करती संतान पर । इसमें विस्मय क्या है चक्रधर । कृपानिधि ॥ ३२ ॥ संसार भ्रांतोंकी ह छाया । अनाथ जीवोंकी तू माय । हमने जो जन्म है पाया । तव कृपासे ही ॥ ३३ ॥ जन्म देकर पंगुको माता । कष्ट उठाती है स-ममता । ऐसी देव कैसे कहें वार्ता । तेरी तुझसे ही ॥ ३४॥ अब पूछूंगा देव एक बात । उस पर देना भला स्व-चित्त । प्रश्न पर क्रोध तू न किंचित । करो देव ॥ ३५॥ पिछली जो वह बात । तूने कही थी अनंत । न मानता मेरा चित्त । क्षण भी देव ॥ ३६॥ अजी ! वह विवस्वत नामका । अ-परिचित है बाप-दादाका । कैसा किया है तूने उनका । उपदेश देव ॥ ३७॥ अर्जुनने कहा अभीका जन्म है तेरा पूर्वका उस सूर्यका । पहले ही कहा तूने कैसे मैं वह मान लूं ॥ ४ ॥ १०९ ज्ञान-कर्म-संन्यासयोग