ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएवं परंपराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः । स कालेनेह महता योगो नष्टः परंतप ॥२॥ कितने ही इस योगसे और । हुए हैं राजऋषि जानकार । किंतु इस युगमें पृथ्वो पर । कोई न जानता ॥ १९ ॥ जिन प्राणियोंका आधार । देह तथा कामना पर । जिससे विस्मृति अपार । आत्म बोधकी ॥ २० ॥ अजी ! बदल गयी आस्था बुध्दि । विषय सुखकी परमावधि । इससे जीव हुवा है उपाधि । उन्हे भाता यही ॥ २१ ॥ गांवमें सुनो नग्न लोगोंके । काम क्या महीन कपडोंके । तथा जन्मांधोंमें सूरजके । कहो मुझे ॥ २२ ॥ या बहिरोंकी सभामें । गावें गीत सु-रागोंमें । सियारको चांदनीमें । होगी क्या चाह ? ॥ २३ ॥ अथवा पहले चंद्रोदयके । चक्षु होते हैं व्यर्थ जिनके । चंद्रोदयसे उन कागोंके । लाभ क्या हुआ ॥ २४ ॥ जैसे वैराग्यकी सीमा न जानते । विवेककी भाषा नहीं है सुनते । वैसे मूर्ख कहो कैसे जानते । मुझ ईश्वरको ॥ २५ ॥ मोहके बहुत बढनेसे । काल बहुत बीत जानेसे । लोप हुआ है योग इससे । इस लोकमें ॥ २६ ॥ स एवायं मयातेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः । भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम् ॥३॥ वही योग तुझसे अर्जुन । कहा है मैंने इसी क्षण । उसको तू तत्वता जान । न करके भ्रांति ॥ २७ ॥ ऐसी परंपरासे जो मिला राजर्षि-वृंदको । आगे समय जानेसे विश्वमें लोप होगया ॥२॥ वही आज तुझे मैंने कहा योग पुरातन । कहा है गुह्य जो सार भक्त है तू सखा मम ॥ ३ ॥ ज्ञानेश्वरी १०८