ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदेवी लक्ष्मी इतनी नजदीक । वह भी न जानती यह सुख । कृष्ण प्रेमका फल जो अधिक । मिला अर्जुनको ॥ ९ ॥ थी सनकादिकोंकी जो आस । सुननेकी यह उपदेश । किंतु उनको भी ऐसा यश । मिला नहीं ॥ १० ॥ जगदीश्वरका है प्रेम । दीखता यहां निरुपम । पार्थने ऐसा सर्वोत्तम । किया पुण्य ॥ ११ ॥ अजी ! जिसकी अति प्रीति । अमूर्तको बनाती व्यक्ति । : उसकी है एकात्म स्थिति । जंचती बहु ॥ १२ ॥ योगियोंको जो नहीं मिलता । वेदार्थमें भी जो नहीं आता । ध्यानस्थका नहीं पहुंचता । ध्यान चक्षुभी ॥ १३ ॥ ऐसा यह निज स्वरूप । अनादि तथा औ' निष्कंप । किंतु कैसा हुआ सरूप । इस भांतिसे ॥ १४ ॥ यह त्रिलोक पटका थान । जो है आकारके परे जान । प्रेमसे करमें है अर्जुन । कर लिया है ॥ १५ ॥ भगवान उवाच इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् । विवस्वान् मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ॥१॥ इस योगकी प्राचीनता— कहता है देव पांडुसुत । हमसे यह है विवस्वत । सुनी है योगकी गुह्य बात । बहुत पहले ॥ १६ ॥ बोले फिर वह भास्कर । योग स्थिति यह सुंदर । पूर्ण रूपसे सुअवसर । मनुसे तब ॥ १७ ॥ मनुने इसका अनुष्ठान । कर दिया ज्ञानोपदेश दान । इक्ष्वाकुको, ऐसी है महान । आदि परंपरा ॥ १८ ॥ पहले सूर्यसे मैंने कहा था योग अव्यय । मनुसे वह बोला था वह इक्ष्वाकुसे फिर ॥ १ ॥ १०७ ज्ञान-कर्म-संन्यासयोग