भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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४ ज्ञान-कर्म-संन्यासयोग श्रोताओंको ज्ञानेश्वर महाराजका उद्बोधन- सुकाल हुआ श्रवणेंद्रियोंका । दर्शन हुआ गीता-निधानका । अजी ! साकार ही हुआ स्वप्नका । उनको यहां ॥ १ ॥ मूलमें है विवेककी गोष्ठि । कहनेवाला श्रीकृष्ण श्रेष्ठी । भक्तराज जो स्वयं किरीटी । सुनते हैं ॥ २ ॥ पंचमालाप है सुगंध । तथा परिमल सुस्वाद । वहां है भलासा विनोद । कथानकका ॥ ३ ॥ श्री हरिकी कृपा हुई । अमृतकी गंगा बही । तपस्या सफल हुई । श्रोताओंकी ॥ ४ ॥ इंद्रियोंको अब संपूर्ण । बनकर स्वयं श्रवण । अनुभवना गीताख्यान । संवाद सुखका ॥ ५ ॥ अब यह अप्रासंगिक । विस्तार छोडके अधिक । कहो कृष्णार्जुन हो एक । बोले क्या हैं ॥ ६ ॥ तब संजय बोले राजासे । सुदैव जुड़ा है अर्जुनसे । तभी अति प्रीति है उनसे । नारायणकी ॥ ७ ॥ जो न कहा पिता वसुदेवसे । औ' न जो कहा माता देवकीसे । या न कहा गुह्य बलभद्रसे । कहा वह पार्थसे ॥ ८ ॥