ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमिटाकर अविवेकका काजल । करता हूं विवेक दीप उज्ज्वल । जिससे योगियोंकी दीपमाळ । जले निरंतर ॥ ५४ ॥ आत्म-सुखसे विश्व खिलता । जगतमें धर्म ही रहता । सात्विकताका वसंत आता । भक्त जनोंमें ॥ ५५ ॥ पापका जहां पहाड टूटता । पुण्यका है प्रभात प्रकटता । मेरा रूप जब प्रकट होता । धनंजय ॥ ५६ ॥ ऐसे कार्यार्थ जगतमें । जनमता हूं युगयुगमें । जानता जो यह विश्वमें । विवेकी वही ॥ ५७ ॥ जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्वतः । त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥९॥ जो मेरा रूप जानते हैं वे मद्रूप होते हैं— मैं जो अजत्वमें ही जनमता । अक्रियतामें सक्रिय रहता । अविकारत्व यह जो जानता । पाता वह मोक्ष ॥ ५८ ॥ संगमें वह असंग रहता । देहमें निर्देह अनुभवता । पंचतत्वमें जब मिल जाता । मेरे ही रूपमें ॥ ५९ ॥ वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः । बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः ॥१०॥ वे अपना पराया न सोचते । सदा कामना शून्य हो रहते । कभी वे राह भी नहीं देखते । क्रोधकी ॥ ६० ॥ सदा वे मद्भावमें ही रहते । मेरी सेवामें ही रत रहते । आत्म-बोधमें ही मगन होते । वीत राग हो ॥ ६१ ॥ मेरे जन्म तथा कर्म दिव्य जो जानता सही । तजके देह पुनर्जन्म न पाता मिलके मुझे ॥ ९ ॥ नहीं तृष्णा भय क्रोध जो मेरे कार्यमें रत । हुये ज्ञान तपोपूत तथा मद्भावमें कयी ॥ १० ॥ ज्ञानेश्वरी ११२