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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

मिटाकर अविवेकका काजल । करता हूं विवेक दीप उज्ज्वल । जिससे योगियोंकी दीपमाळ । जले निरंतर ॥ ५४ ॥ आत्म-सुखसे विश्व खिलता । जगतमें धर्म ही रहता । सात्विकताका वसंत आता । भक्त जनोंमें ॥ ५५ ॥ पापका जहां पहाड टूटता । पुण्यका है प्रभात प्रकटता । मेरा रूप जब प्रकट होता । धनंजय ॥ ५६ ॥ ऐसे कार्यार्थ जगतमें । जनमता हूं युगयुगमें । जानता जो यह विश्वमें । विवेकी वही ॥ ५७ ॥ जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्वतः । त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥९॥ जो मेरा रूप जानते हैं वे मद्रूप होते हैं— मैं जो अजत्वमें ही जनमता । अक्रियतामें सक्रिय रहता । अविकारत्व यह जो जानता । पाता वह मोक्ष ॥ ५८ ॥ संगमें वह असंग रहता । देहमें निर्देह अनुभवता । पंचतत्वमें जब मिल जाता । मेरे ही रूपमें ॥ ५९ ॥ वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः । बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः ॥१०॥ वे अपना पराया न सोचते । सदा कामना शून्य हो रहते । कभी वे राह भी नहीं देखते । क्रोधकी ॥ ६० ॥ सदा वे मद्भावमें ही रहते । मेरी सेवामें ही रत रहते । आत्म-बोधमें ही मगन होते । वीत राग हो ॥ ६१ ॥ मेरे जन्म तथा कर्म दिव्य जो जानता सही । तजके देह पुनर्जन्म न पाता मिलके मुझे ॥ ९ ॥ नहीं तृष्णा भय क्रोध जो मेरे कार्यमें रत । हुये ज्ञान तपोपूत तथा मद्भावमें कयी ॥ १० ॥ ज्ञानेश्वरी ११२

होते वे तप तेजके पुंज । एकायत-ज्ञान-निकुंज । पवित्रतामें हैं तीर्थराज । धनुर्धर ॥ ६२ ॥ सहजमें वे मद्भाव हुये । मेरे ही रूपमें एक भये । फिर मेरे उनमें न आये । बीच परदा ॥ ६३ ॥ जैसे पीतलके गंज कालिख । मिटे यदि वे दोनों निःशेष । सुवर्णत्व इससे अधिक । क्या रहा ? ॥ ६४ ॥ पूर्ण जो यम नियममें । शुद्ध है जो तपज्ञानमें । हुये वे मेरे ही रूपमें । निःसंदेह ॥ ६५ ॥ ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् । मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥ ११ ॥ केवल भ्रमवश मुझ एकको अनेक देखते हैं — मुझे जो जैसा भजता । उसको वैसा ही देखता । दोनोंमें आती एकता । जान यह् ॥ ६६ ॥ वैसे ही मनुष्य मात्र सकल । स्वभावसे ही है भजन-शील । हुए ऐस मुझमें ही केवल । पांडुकुमार ॥ ६७ ॥ किंतु ज्ञानाभावसे नाश होता । उससे ही बुद्धिभेद होता । उससे जगती है कल्पकता । अनेकत्वकी ॥ ६८ ॥ तभी अभेदमें भेद देखते । मुझे अनामको हैं नाम देते । देव देवीके रूपमें पूजते । है जो शब्दसे परे ॥ ६९ ॥ जहां जो सर्वत्र सदा सम । वहां विभाग अधमोत्तम । करते हैं मतिसे संभ्रम । विवेचन ॥ ७० ॥ काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः । क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा ॥ १२ ॥ भजते मुझ जो जैसे वैसे मैं भजता उन्हे । मेरे ही मार्गमें आते सभी हैं सब मार्गसे ॥ ११ ॥ देवोंको पूजते जो हैं चाहसे कर्म-सिद्धिकी । कर्मकी सिद्धि वे शीघ्र पाते हैं नर-लोकमें ॥ १२ ॥ (15) ११३ ज्ञान-कर्म-संन्यासयोग

फिर नाना हेतु प्रकारसे । यथोचित पूजोपचारसे । देवदेवान्तरोंको मान्यतासे । उपासते ॥ ७१ ॥ जो हैं ऐसे अपेक्षित । पाते हैं वैसे समस्त । कर्मफल वे निश्चित । जान ले तू ॥ ७२ ॥ बिन कर्मके लेना देना अधिक । निर्भ्रान्त ऐसा नहीं कुछ सम्यक । यहां है कर्म ही फल रूपक । मनुष्य लोकमें ॥ ७३ ॥ खेतमें जैसे जो कछु बोया जाता । उसके बिना अन्य न उपजता अथवा जो देखता वही दीखता । देर्पणमें जैसे ॥ ७४ ॥ या गिरिकंदरामें जैसे । अपने ही शब्द वैसे । गूंजते हैं दश दिशासे । निमित्तयोग ॥ ७५ ॥ ऐसे ये सभी भजन । साक्षीभूत हूं अर्जुन । प्रति-फलती भावना । अपनी ही ॥ ७६ ॥ चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः । तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् ॥ १३ ॥ चातुर्वर्ण्य प्राकृतिक गुणोंके कारण— इसी भांति तू जान । चार हैं ये वर्ण । रचे हैं मैंने गुण- । कर्म वि भागसे ॥ ७७ ॥ जो प्रकृतिके आधारसे । गुणोंके व्यभिचारसे । कर्मकी तदनुसारसे । योजना की ॥ ७८ ॥ है यहां यह एक अर्जुन । किंतु हुए हैं ये चार-वर्ण । ऐसे गुण कर्मके कारण । सहज हुआ ॥ ७९ ॥ तभी सुन तू पार्थ । ये वर्ण-भेद संस्था । कर्ता मैं न सर्वथा । इसीलिये ॥ ८० ॥ सृजे मैं ने वर्ण चार गुण-कर्म विभागसे । करके सब तू जान अकर्ता निर्विकार मैं ॥ १३ ॥ ज्ञानेश्वरी ११४

न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा । इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते ॥ १४ ॥ मेरे कारणसे यह भया । किंतु मैंने यह नहीं किया । ऐसे जिसने प्रतीत किया । हुआ वह सूझ ॥ ८१ ॥ एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः । कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम् ॥ १५ ॥ पूर्ववर्ती मुमुक्षु जन । ऐसा हूं मैं, यह जान । करते कर्माचरण । धनुर्धर ॥ ८२ ॥ किंतु जैसे भुने हुए बीज । उगते नहीं कभी सहज । वैस ही उन्हे कर्म महज । होते मोक्ष हेतु ॥ ८३ ॥ यहां और एक बात अर्जुन । यह् कर्माकर्मका विवेचन । अपने ही बुध्दिसे है करना । नहीं योग्य ॥ ८४ ॥ किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः । तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥ १६ ॥ कर्माकर्म विवेचनमें ज्ञानी भी भ्रममें— कर्म करते हैं वह कौन । या अकर्मका है क्या लक्षण । ऐसे सोचनेमें विचक्षण । पडते उलझनमें ॥ ८५ ॥ अजी ! खोटा सिक्का जैसा होता है । सच्चेकी समानता करता है । देखनेवालोंको जो डालता है । भ्रममें जैसे ॥ ८६ ॥ न लीपते मुझे कर्म न मुझे फल-कामना । मुझे जो जानते ऐसे कर्ममें भी अलिप्त वे ॥ १४ ॥ कर्म जो मुमुक्षुओंने किये हैं इस ज्ञानसे । कर तू कर्म वैसे ही उनसे पाठ लेकर ॥ १५॥ जाननेमें कर्माकर्म भ्रमते बुध्दिमान भी । तुझे मैं कहता कर्म छूटेगा जानके यह ॥ १६ ॥ ११५ ज्ञान-कर्म-संन्यासयोग

वैसे निष्कर्म्यके भ्रममें । पड़ते हैं कर्म-पाशमें । जो दूसरी सृष्टि मनमें । कर सकते ॥ ८७ ॥ मूर्खोंकी यहां कहें क्या बात । क्रांतदर्शी होते मोह-ग्रस्त । तभी कहता तुझसे बात । वही अब ॥ ८८ ॥ कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः । अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः ॥ १७ ॥ तभी कर्म जिसके स्वभावसे । विश्वाकार संभव हो उससे । जानना उसे संपूर्ण रूपसे । यहां सर्व प्रथम ॥ ८९ ॥ वर्णाश्रममें फिर उचित । तथा विशेष कर्म विहित । जानना उसको सुनिश्चित । उपयोगी जो ॥ ९० ॥ फिर जानना जो निषिद्ध । उसका भी रूप विशद । तभी न हो सकता बद्ध । सहज कर्ममें ॥ ९१ ॥ नहीं तो विश्व है कर्माधीन । उसका फैलाव है गहन । सुन लक्षण अब तू अर्जुन । बोध प्राप्तोंका ॥ ९२ ॥ कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः । स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत् ॥ १८ ॥ कर्मका तिरस्कार और कर्मफलोंमें आशा दोनों नहीं -- करते हुए सकल कर्ममें । अकर्म देखता जो अपनेमें । निरपेक्ष होता कर्म संगमें । फलाशासे ॥ ९३ ॥ तथा कर्त्तव्य करनेमें । अन्य न कोई जगतमें । ऐसेको बोध अकर्ममें । अच्छा होता है ॥ ९४ ॥ क्रिया कलापका वह संपूर्ण । करता है उत्तम आचरण । किंतु इन लक्षणके कारण । जानना ज्ञानी ॥ ९५ ॥ जानना कर्म सामान्य विकर्म भी विशेष जो । जानना अकर्ममें भी गूढ जो कर्मकी गति ॥ १७ ॥ अकर्म कर्ममें देखें तथा कर्म अकर्ममें । विज्ञ है वह लोगोंमें योगी वह कृतार्थ भी ॥१८॥ ज्ञानेश्वरी ११६

जैसे जलाशयके पास रहकर । देखता अपना प्रतिबिंब सुंदर । किंतु जानता है निभ्रांत होकर । मैं हूं भिन्न ॥ ९६ ॥ या चलता जब नांवमें बैठकर । देखता वृक्षोंका चलना निरंतर । किंतु कहता है मनमें सोचकर । वृक्ष होते अचल ॥ ९७ ॥ करता वह सब कामोंमें वास । किंतु मानता यह है आभास । अपनेको जानता है सविश्वास । मैं हूं अकर्मी ॥ ९८ ॥ उदयास्त कारणसे होता भान । न चलते ही सूर्य गमन । वैसे होता उसे नैष्कर्म्यका ज्ञान । कर्म-रत रहते ॥ ९९ ॥ मनुष्य जैसा ही है वह दीखता । उसमें मनुष्यत्व नहीं रहता । वैसे जलमें पढ भी न डूबता । भानुबिंब ॥ १०० ॥ उसने विश्वदेखा कछु न देखते । सब कार्य किया कुछ भी न करते । सब भोग किये नहीं कछु भोगते । भोग-मात्र ॥ १ ॥ बैठ कर एक ही स्थल पर । करता रहता है विश्व संचार । बना वह विश्वरूप निरंतर । अपनेमें ही ॥ २ ॥ यस्य सर्वे समारम्भाः कामसंकल्पवर्जिताः । ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः ॥ १९ ॥ ऐसे पुरुषमें कहीं । कर्मका तिरस्कार नहीं । कर्म फलापेक्षा भी नहीं । छूती कभी ॥ ३ ॥ और मैं यह कर्म करूंगा । किया जो उसे पूर्ण करूंगा । ऐसा संकल्प नहीं छूएगा । उसके मनको ॥ ४ ॥ ज्ञानाग्निके ही मुखसे । सारे कर्म जलनेसे । ब्रह्म है मनुष्य रूपसे । जान ले तू वह ॥ ५ ॥ उद्योग करता सारे काम संकल्प त्यागके । जलाये ज्ञानसे कर्म उसको कहते बुध ॥ १९ ॥ ११७ ज्ञान कर्म-संन्यासयोग

त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः । कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः ॥ २० ॥ कर्मयोगीके लक्षण— शरीरमें जो उदास । फल-भोगमें निरास । निरंतर स-उल्हास । रहता है ॥ ६ ॥ संतोष-भवनके भोजमें । आत्मयोग मृष्टान्न भोगमें । न कहता कभी न मनमें । जान तू पार्थ ॥ ७ ॥ निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः । शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥ २१ ॥ यदृच्छालाभसंतुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः । समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते ॥ २२ ॥ नित्य अधिकाधिक प्यारी । ले महासुखकी माधुरी । आशाको न्योच्छावर करी । अहंभाव-सह ॥ ८ ॥ तभी जिस अवसरमें जो पाया । उससे ही वह नित है सुखाया । उसको अपना और पराया । दोनों नहीं ॥ ९ ॥ दृष्टिसे यह जो देखता । वह है आपही हो जाता । जिसको है वह सुनता । बनता वही ॥ १० ॥ पैरसे जो चलता । मुखसे जो बोलता । वह जो चेष्टा करता । बनता स्वयं ॥ ११ ॥ नित्य तृप्त निराधार न रखे फल वासना । हुआ है लीन कर्मोंमें तो भी कुछ करें नहीं ॥ २० ॥ संयमी तजके सारा इच्छा सह परिग्रह । देहसे करता कर्म उसे दोष न स्पर्शता ॥ २१ ॥ मिले जो उसमें तुष्ट न जाने द्वंद्व मत्सर । फले जले उसे एक करके कर्म-मुक्त जो ॥ २२ ॥ ज्ञानेश्वरी ११८

अजी ! वह विश्वमें जब देखता । अपने बिन भिन्न नहीं दीखता । उसको अब कौन कहां क्या बंधता । कर्म कैसा ॥ १२ ॥ जहांसे उपजता यह मत्सर । वह द्वैत ही नहीं जहांपर । उसको कहना क्या निर्मत्सर । शब्दके लिये ॥ १३ ॥ इसलिये रहता सर्व मुक्त । कर्म करके भी कर्म रहित । सगुण होकर भी गुणातीत । निभ्रांत जो ॥ १४॥ गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः । यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते ॥ २३॥ देह संगमें यदि होता । चैतन्यसा वह दीखता । कसौटी पर खरा उतरता । परब्रह्मकी ॥ १५ ॥ ऐसा ही वह सकौतुक । करता कर्म यज्ञादिक । मिट जाते सब अशेष । उसीमें सब ॥ १६ ॥ अकालके बादल जैसे । उर्मी बिन मिटते वैसे । नभमें सहज भावसे । उदय होके ॥ १७ ॥ वैसे विधि विधान विहित । आचरण करता समस्त । तो भी ऐक्य भावसे अद्वैत । पाता वह ॥ १८ ॥ ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् । ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ॥ २४॥ यह है हवन मैं होता । या यह यज्ञ यह भोक्ता । बुद्धिमें ऐसी नही भंगता । इसीलिये ॥ १९ ॥ इष्ट जो यज्ञ यजन । हवि मंत्रादि सम्पूर्ण । आत्म बुद्धिसे दर्शन । अविनाश भावसे ॥ १२० ॥ छूटा संग हुवा मुक्त ज्ञानमें स्थिर चित जो । यज्ञार्थ करता कर्म हो जाता सब ही लय ॥ २३ ॥ ब्रह्ममें होमके ब्रह्म ब्रह्मने ब्रह्म लक्ष्यके । ब्रह्ममें सानके कर्म पाया ब्रह्मत्व ही तब ॥ २४ ॥ ११९ ज्ञान-कर्म-संन्यासयोग

तभी ब्रह्म ही उसका कर्म । बोध हुआ ऐसा उसका सम । उसका कर्तव्य ही नैष्कर्म्य । धनुर्धर ॥ २१ ॥ जिसका अविवेक कौमार्य गया । औ' विरक्तिसे पाणिग्रहण भया । फिर उपासना वहां लाया । योगाग्निसे ॥ २२ ॥ दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते । ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति ॥ २५ ॥ योगाग्निसे सतत उपासना— यजनशील है जो दिन-रात । होमते अविद्या मन सहित । गुरुवाक्य हुताशनमें नित । किया हवन ॥ २३ ॥ ये हैं योगाग्निमें यजते । इसे दैवयज्ञ हैं कहते । इससे आत्म-सुख चाहते । धनंजय ॥ २४ ॥ दैवास्तव देहका पालन । ऐसा निश्चय जिसका पूर्ण । जो न सोचता देहाभरण । दैवयोगका महायोगी ॥ २५ ॥ अब सुन तू और एक । जो हैं ब्रह्माग्निमें साग्निक । वे यज्ञमें ही यज्ञ देख । करते हैं ॥ २६ ॥ श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति । शब्दादीन्विषयानन्ये इन्द्रियाग्निषु जुह्वति ॥ २६ ॥ कर्मयोगीका ब्रह्मयज्ञ— संयम जिनका अग्नि होत्र । युक्तित्रय ही उनका मंत्र । देते इंद्रिय द्रव्य पवित्र । आहुति नित्य ॥ २७ ॥ वैराग्य रविका उदय होते । संयमका यज्ञ कुंड रचते । वहां वे प्रज्वलित करते । इंद्रियानल ॥ २८ ॥ कोयी योगी करे मात्र देव यज्ञ उपासना । कोयी ब्रह्माग्निमें वैसे जलाते यज्ञ यज्ञसे ॥ २५ ॥ श्रोत्रादि इंद्रियां कोयी होमते संयमाग्निमें । कोयी विषय शब्दादि होमते इंद्रियाग्निमें ॥ २६ ॥ ज्ञानेश्वरी १२०

उससे विरक्ति ज्वालायें निकलतीं । उसमें विकारोंकी समिधा जलती । तब है आशाकी घुमकडी छूटती । पांचही कुंडोंमें ॥ २९ ॥ फिर वे विधि वाक्यके ही अनुकूल । विषय आहुतियां देकर बहुल । हवन करते कुंडमें स-कुशल । इंद्रियाग्निके ॥ १३० ॥ सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे । आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते ॥ २७ ॥ इस भांति कोई पार्थ । दोष धोते हैं सर्वथा । हृदयारणिमें मंथा । विवेक किया ॥ ३१ ॥ उसे पकड कर निग्रहसे । दबाकर अति धीरजसे । गुरु उपदेशके जोरसे । रवींचा पार्थ ॥ ३२ ॥ समरसतासे मंथन किया । तत्काल इसका फल आया । फिर वहां उद्दीपन भया । ज्ञानाग्निका ॥ ३३ ॥ पहला ऋध्दि सिध्दिका संभ्रम । वह निवारण हुआ तो धूम । फिर वहां प्रकट हुआ सूक्ष्म । विस्फुलिंग ॥ ३४ ॥ उसमें डाला मन मुक्त । यम दमसे जो था रिक्त । इंधन बना जो सयुक्त । अपने आप ॥ ३५ ॥ उठीं उसमें ज्वालायें समृद्ध । पडी तब वासनाकी समिध । समता स्नेह-युत नाना विध । जलनेमें ॥ ३६ ॥ वहां सोऽहं मंत्रसे दीक्षित । इंद्रिय कर्मकी आहुति नित । देना ज्ञानानलमें प्रदीप्त । यज्ञ-कुंडमें ॥ ३७ ॥ फिर प्राण क्रियाकी सुवासे । यज्ञमें पड़ी पूर्णाहुतिसे । होता अवभृत सहजतासे । समरसका ॥ ३८ ॥ प्राणेंद्रिय क्रिया कोयी सभी आहुति देकर । अंतरमें समाधिको जगाते चिंतनाग्निसे ॥ २७ ॥ १२१ ज्ञान-कर्म-संन्यासयोग (16)

तब है आत्म-बोधका सुख । जो संयमाग्निका हुत-शेष । वही पुरोडासु किया देख । सहज सेवन ॥ ३९ ॥ ऐसे यज्ञ-कार्यसे अनेक । मुक्त हुए त्रिभुवनमें देख । यहां यज्ञ क्रियायें हैं अनेक । प्रापव्य एक ॥ १४० ॥ द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे । स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः ॥ २८ ॥ कर्मयोगीके विविध यज्ञ— एक द्रव्य यज्ञ कहलाता । दूजा तप उत्पन्न करता । तथा योगयाग ही बनता । ऐसा है कहा ॥ ४१ ॥ जिसमें शब्दमें शब्द यजना । उसको वाग्यज्ञ है कहना । जिसमें ज्ञानसे ज्ञेयकी जानना । वह है ज्ञानयज्ञ ॥ ४२ ॥ अर्जुन यह सब कठिन । अनुष्ठानका महा-बंधन । किंतु जितेंद्रियको आसान । योग्यता रूप ॥ ४३ ॥ यहां है जो प्रवीण । योग समृद्धि संपन्न । किया आत्म-हवन । अपनेसे ॥ ४४ ॥ अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे । प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः ॥ २९ ॥ अपानाग्निके मुखमें फिर । प्राण द्रव्यको अर्पण कर । हवन करते हैं धनुर्धर । अभ्यास-योगसे ॥ ४५ ॥ कोई अपानको प्राणमें होमते । या प्राणापानका निरोध करते । ये प्राणायामी है कहलाते । पांडुकुमार ॥ ४६ ॥ द्रव्य जप तप योग स्वाध्याय और चिंतन । संयमी करते यज्ञ रखके व्रत उग्र जो ॥ २८ ॥ होमते परस्परमें कोयी प्राण अपानको । रोकते गति दोनोंकी प्राणायाम परायण ॥ २९ ॥ ज्ञानेश्वरी १२२

अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति । सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः ॥ ३० ॥ या वज्रयोगक्रमसे । सर्वोहार संयमसे । प्राणमें प्राणार्पणसे । हवन करते ॥ ४७ ॥ ऐसे मोक्ष काम सकल । सारे हैं ये यजनशील । यज्ञसे जिन्होने मनोमल । किया क्षालन ॥ ४८ ॥ जिसका जला अविद्या जात । रहा जो निज स्वभावगत । जहां अग्नि औ' होताका द्वैत । रहा नहीं ॥ ४९ ॥ यहां यजित होता काम हृत । यज्ञका विधान होता समाप्त । जहांसे फिर सारे क्रिया-जात । होते नष्ट ॥ ५० ॥ विचार यहां नहीं घुसता । यहांसे न हेतु निकलता। द्वैत जो संग-दोषसे होता । स्पर्शता नहीं ॥ ५१ ॥ यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् । नायंलोकोऽस्त्ययज्ञस्यकुतोऽन्यः कुरुसत्तम ॥ ३१ ॥ अनादि सिद्ध जो ऐसा ज्ञान । यज्ञमें जो बचता पावन । ब्रह्म-निष्ठ करते सेवन । स-ब्रह्ममंत्र ॥ ५२ ॥ शेषामृतसे जेवे तृप्त । अमर्त्य भावको प्राप्त । ऐसे ब्रह्मत्वमें पूर्त । अनायाससे ॥ ५३ ॥ जिन्हें माला न पडती विरक्तिकी । सेवा नहीं घडती संयमाग्निकी । पहचान न होती योग-यागकी । जन्म लेकर ॥ ५४ ॥ जिनका नहीं ऐहिक नेक । बात क्या कहें पार-लौकिक । बात कहना है व्यर्थ देख । धनंजय ॥ ५५ ॥ प्राणमें होमते प्राण आहार कर निश्चित । सभी ये हैं यज्ञ-वेत्ता जलाते पाप यज्ञसे ॥ ३० ॥ यज्ञ-शेष-सुधा भोजी पाते हैं ब्रह्म शाश्वत । यज्ञ विना न यहां तो कहांका परलोक है ॥ ३१ ॥ १२३ ज्ञान-कर्म-संन्यासयोग

एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे। कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे ॥ ३२ ॥ अनेक प्रकारके ऐसे । याग कहे हैं तुझसे । वेदमें अति-विस्तारसे । कहे हैं सब ॥ ५६ ॥ विस्तारसे क्या है जानना । इसे कर्म सिद्ध अनुभवना । कर्म-बंधसे मुक्त होना । स्वभावसे ॥ ५७ ॥ श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परंतप । सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते ॥ ३३ ॥ कर्मयोगीके विविध यज्ञोंकी तुलना- जिसका है वेद मूल । क्रिया विशेष है स्थूल । उसका अपूर्व फल । स्वर्ग-सुख है ॥ ५८ ॥ द्रव्ययाग होते हैं तो श्रेष्ठ । किंतु ज्ञान यज्ञसे कनिष्ठ । जैसे तारा-तेज होता नष्ट । सूर्यके सम्मुख ॥ ५९ ॥ परमात्म-सुख निधान । साधनेमें है योगीजन । डालते नित ज्ञानांजन । उन्मेष-नेत्रमें ॥ १६० ॥ कर्मयोग समाप्तिका जो स्थान । नैष्कर्म्य बोधकी है खान । क्षुधार्तिको है अमृतान्न । साधनाका ॥ ६१ ॥ जहां प्रवृत्ति पंगु होती । तर्क-दृष्टि अंधी होती । इंद्रियां सब भूल जाती । विषय संग ॥ ६२ ॥ मिटता ममत्व मनका । औ' शब्दत्व शब्द-मात्रका । जिसमें मिलता ज्ञानका । ज्ञेय मात्र ॥ ६३ ॥ नाना प्रकारके ऐसे वेदोंमें यज्ञ जो कहे । कर्मसे निकले जान पायेगा मुक्ति जानके ॥ ३२ ॥ ज्ञान-यज्ञ सदा श्रेष्ठ जानना द्रव्य-यज्ञसे । समाते हैं सभी कर्म ज्ञानमें पूर्ण रूपसे ॥ ३३ ॥ ज्ञानेश्वरी १२४

मिटता दारिद्र्य वैराग्यका । दृढ़ता हव्यास विवेकका । मिलन होता जहां आत्माका । सहज भावसे ॥ ६४ ॥ तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया । उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥ ३४ ॥ ज्ञान प्राप्तिका साधन— अजी ! वह जो उत्तम ज्ञान । प्राप्त करना हो तो महान । करना है संतोंका भजन । सर्व भावसे ॥ ६५ ॥ वे हैं इस ज्ञानका घर । सेवा उसका महाद्वार । सेवासे ही पांडुकुमार । पाना है उसे ॥ ६६ ॥ अजी ! तन मन प्राणसे । लगना उन चरणसे । करना निराभिमानसे । सकल दास्य ॥ ६७ ॥ पूछके तब इच्छित प्रश्न । पाना है उनसे वह ज्ञान । उस बोधसे अंतःकरण । होगा कामना रहित ॥ ६८ ॥ यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव । येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि ॥ ३५ ॥ वाक्य प्रकाशसे उनके । मिटेंगे संशय चित्तके । तब होगा ब्रह्म रूपके । ज्ञान निश्चित ॥ ६९ ॥ फिर अपने सहित । अन्य सभी भूत जात । मेरे रूपमें अखंडित । देखेगा तू ॥ १७० ॥ ऐसा ज्ञान प्रकाश पायेगा । मोह-अंधकार दूर होगा। जब गुरु-कारुण्य होगा । धनुर्धर ॥ ७१ ॥

सेवा द्वारा नम्रतासे जान ले ज्ञान प्रश्नसे । देंगे अनुभवी संत सत्वज्ञ ज्ञान-तत्व जो ॥ ३४ ॥ जान कर वह ऐसा न होगा भ्रांत तू कभी । मुझमें और आत्मामें देखेके जीव-मात्रको ॥ ३५ ॥ १२५ ज्ञान कर्म-संन्यासयोग

अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः । सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं संतरिष्यसि ॥ ३६ ॥ ज्ञानकी महानता-- यदि है आगर पापका । महासागरही है भ्रांतिका । हिमालय ही है व्यामोहका । तो भी पार्थ ॥ ७२ ॥ इस ज्ञान शक्तिके सम्मुख । यह सब कुछ नहीं देख । उसका सामर्थ्य है विशेष । ज्ञानका यहां ॥ ७३ ॥ निरास है विश्व भ्रमका । विस्तार है जो अमूर्तका । प्रकाश भी यहां उसका । अपर्याप्त ॥ ७४ ॥ उसकेलिये क्या मनोमल । बोलनेमें भी तुच्छसा बोल । उसके सम्मुख तुल्य बल । नहीं विश्वमें ॥ ७५ ॥ यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन । ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ॥ ३७ ॥ अजी ! धूलको जो भुवनत्रयकी । गगनमें उडानेवाली आंधिकी । रुकावट होगी कैसी बादल्की । कह तू धनंजय ॥ ७६ ॥ अथवा पवनसे जो प्रक्षुब्ध । प्रलयाग्नि करता जलको दग्ध । होगा क्या वह कहो अवरुद्ध । तृणकाष्ठसे ॥ ७७ ॥ न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते । तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति ॥ ३८ ॥ पापियोंमें महा पापी होगा यदि शिरोमणि । तो भी तू ज्ञान-नौकासे तरेगा पाप-सागर ॥ ३६ ॥ संपूर्ण जलती आग करती राख काष्ठको । वैसे ज्ञानाग्नि है सारा जलाता सर्व कर्मको ॥ ३७ ॥ ज्ञान सम न है अन्य पवित्र जगमें कुछ । योग-युक्त यथा काल पाये जो निजमें स्वयं ॥ ३८ ॥ ज्ञानेश्वरी १२६

असंभव है ऐसा होना । अशक्य है ऐसा सोचना । जगतमें ज्ञान समान । पवित्र नहीं कछु ॥ ७८ ॥ ज्ञान यहां अति उत्तम है । ऐसा क्या अन्य समान है । ज्ञान जो महा चैतन्य है । विश्वमें ॥ ७९ ॥ इस महातेज पे कसनेसे । निर्मल है यह सूर्य बिंबसे । समेटलें यह समेटनेसे । आकाशको भी ॥ १८० ॥ या तौलकर देखनेमें । इस पृथ्वीकी तुलनामें । यदि कुछ है तो विश्वमें । ज्ञान ही है ॥ ८१ ॥ बहुविध विचारनेसे । पुनः पुनः सोचनेसे । पवित्र यहां ज्ञानसे । ज्ञान ही है ॥ ८२ ॥ खोजनेसे अमृतका रस जैसा । अमृतमें ही मिलता है वैसा । ज्ञानके समान ज्ञान ही वैसा । जानना पार्थ ॥ ८३ ॥ इस पर है अब बोलना । व्यर्थका है समय बिताना । सच कहता सुन अर्जुन । जो कहा तूने ॥ ८४ ॥ उस ज्ञानको तब कैसे जानना । अर्जुनके मनमें यह पूछना । जानकर उसकी मनो कामना । कहा अच्युतने ॥ ८५ ॥ फिर कहता है किरीटी । चित दे सुन यह गोष्ठी । कहता हूँ ज्ञानकी भेटी । होगी कैसी ॥ ८६ ॥ श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः। ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥ ३९ ॥ आत्म-सुखकी माधुरीसे । उकताता है विषयोंसे । इंद्रियोंका कभी उनसे । न होता भाव ॥ ८७ ॥ मनमें जो चाह नहीं धरता । प्रकृति कर्मको न स्वीकारता । सुख रूप होकरके रहता । श्रद्धा भोगमें ॥ ८८ ॥ श्रद्धालु ज्ञान पाता है संयमी नित्य सावध । ज्ञानसे शीघ्र पाता है शांति अंतिम पावन ॥ ३९ ॥ १२७ ज्ञान-कर्म-संन्यास योग

अध्याय ४: ज्ञानकर्मसंन्यासयोग

ज्ञान है जो थिर वांछित । मिले वह उसे निश्चित । जिसमें होती अचुंबित । शांति-सुख ॥ ८९ ॥ हृदयमें जब ज्ञान होता । तब शांति-अंकुर फूटता । उससे विस्तार प्रकटता । आत्मबोधका ॥ ९० ॥ फिर जहां देखे वहां । सर्वत्र ही जहां तहां । न दीखे तीर है कहां । शांति सिंधुका ॥ ९१ ॥ ऐसा यह उत्तरोत्तर । ज्ञान बीजका है विस्तार । कहा है उसको अपार । धनंजय ॥ ९२ ॥ अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति । नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः ॥ ४० ॥ संदेह विनाशका घर है— जिन प्राणियोंमें ज्ञानकी । चाह नहीं वह पानेकी । क्या कहें ऐसे जीवनकी । उससे भली मौत ॥ ९३ ॥ शून्य है जैसे गृह । या प्राण बिनु देह । है जीवित सम्मोह । ज्ञानके बिन ॥ ९४ ॥ हुआ नहीं प्राप्त वह ज्ञान । चाह करता पानेका मन । तब है आशा यह तू जान । पानेकी वह ॥ ९५ ॥ किंतु बात है कैसे ज्ञानकी । आस्था नहीं मनमें उसकी । तो पड़ा है संदेह रूपकी । अग्निमें वह ॥ ९६ ॥ जब अमृत भी नहीं भाता । ऐसा आस्वाद-स्वभाव होता । तभी जानना मरण आता । निकट सत्वर ॥ ९७ ॥ विषय सुखमें जो है रंगता । ज्ञानसे नित विमुख रहता । निश्चय ही संशयमें पड़ता । जानना वह ॥ ९८ ॥ न है ज्ञान न है श्रद्धा संशयीका विनाश है । दोनों ही लोकमें पार्थ न पाता सुख संशयी ॥ ४० ॥ ज्ञानेश्वरी १२८

डूबा यदि संशय सागरमें । नष्ट हुआ निश्चित जीवनमें । वंचित हुआ इह औ' परमें । सुखसे वह ॥ ९९ ॥ किसीको जब कालज्वर आता । वह जैसे शीतोष्ण न जानता । जैसे वह चांदनी औ' उष्णता । मानता एक-सा ॥ २०० ॥ वैसे वह जो सत औ' असत । अनुकूल औ' प्रतिकूल बात । नहीं जानता हित औ' अहित । संशयग्रस्त जो ॥ १ ॥ यह है दिवस औ' यह रात । जन्मांध न जानता यह बात । वैसे ही होता है संशयग्रस्त । मनमें सदा ॥ २ ॥ तभी संशयसे भयंकर । अन्य नहीं पाप कोई घोर । वह है विनाशका भंवर । प्राणियोंका ॥ ३ ॥ इस कारणसे तुझे तजना । पहले इस बातको जानना । ज्ञानाभावमें इसका रहना । जान निश्चित ॥ ४ ॥ पड़ता अज्ञानका गहरा अंधार । बढ़ता यह चितमें अपरंपार । जिससे है पथावरोध धनुर्धर । श्रद्धाका सदा ॥ ५ ॥ योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसंछिन्नसंशयम् । आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनंजय ॥ ४१ ॥ ज्ञान खड्ग— हियमें ही यह नहीं समाता । बुद्धि पर भी पर्दा डालता । जिससे संशयात्मक हो जाता । भुवन-त्रय ॥ ६ ॥ इतना है इसका बडप्पन । उसे जीवनका एक साधन । यदि करमें होता है महान । ज्ञान खड्ग ॥ ७ ॥ उस तीखे ज्ञान खड्गसे । मिटता यह मूल रूपसे । मल होता मनका जिससे । सदा निर्मूल ॥ ८ ॥ योगसे छांटके कर्म ज्ञानसे छिन्न संशय । जो सावधान आत्मामें उसे कर्म न बांधते ॥ ४१ ॥ (17) १२९ ज्ञान-कर्म-संन्यासयोग

तस्मादज्ञानसंभूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः । छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत ॥ ४२ ॥ इस कारणसे तू पार्थ । नष्ट करके हृदयस्थ । संशय अब सर्वथा । ऊठ सत्वर ॥ ९ ॥ ऐसा सर्वज्ञोंका बाप । श्रीकृष्ण जो ज्ञानदीप । कहता वह सकृप । सुनो राजन् ॥ २१० ॥ कथा यह पूर्वापर । अर्जुन विचारकर । पूछेगा प्रश्न सत्वर । समयोचित ॥ ११ ॥ उस कथाकी संगति । भावकी है संपत्ति । उसकी है उन्नति । कहेगा हरि ॥ १२ ॥ उसकी उत्तमता पर । आठो रस हैं न्योच्छावर । वह है सज्जनोंका घर । आसरेका ॥ १३ ॥ प्रकट करेगा शांति-रस निर्मल । है वह महासागरसे भी खोल । मेरी देश-भाषाका अनमोल बोल । अर्थपूर्ण ॥ १४ ॥ बिंब दीखता है हथेली समान । प्रकाशमें ओछा होता त्रिभुवन । अनुभवना ऐसी व्याप्ति महान । शब्दार्थकी ॥ १५ ॥ अजी ! कामितार्थकी जो आशा । फलती कल्पवृक्षमें जैसा । बोल हैं अति व्यापक ऐसा । सुननाजी ॥ १६ ॥ रहने दो अब है क्या कहना । सर्वज्ञ जानते मनो कामना । फिर भी करता नम्र प्रार्थना । सुनना चित्त देके ॥ १७ ॥ यहां साहित्य तथा शांति । वैसे रेखा शब्द पद्धति । जैसे लावण्य गुण कुलवति । तथा पतिव्रता ॥ १८ ॥ पहले ही प्रिय है शक्कर । मिलती पथ्यके नाम पर । खाना या न ग्वाना बात फिर । रहती कहां ? ॥ १९ ॥ तभी हृदयका सारा अज्ञान-कृत संशय । ज्ञानके खड्गसे तोड ऊठ तू योग साधके ॥ ४२ ॥ ज्ञानेश्वरी १३०

मळयानिलय मंद सुगंध । उसमें मिला अमृतका स्वाद । उसके साथ हो सुस्वर नाद । दैव-गतिसे ॥ २२० ॥ स्पर्शसे सर्वांग शांत करता । माधुरीसे रसनाको नचाता । श्रवणेंद्रियसे है कहलाता । भला भला ॥ २१ ॥ वैसे है इस कथाका सुनना । कानोंका है प्रसन्न होना । संसार-दुःखका मूलसा होना । उच्चाटन ही ॥ २२ ॥ मंत्रसे यदि शत्रु मरता । कौन तलवार बांधता । दूध मधुसे रोग जाता । कौन पीवे नीम ॥ २३ ॥ वैसे मनको न मारते । इंद्रियोंको न सताते । अनायास ही मोक्ष पाते । श्रवण-मात्रसे ॥ २४ ॥ सुन सब हो प्रसन्न मन । करके गीतार्थका चिंतन । ज्ञानदेवका यह वचन । जो है निवृत्तिका दास ॥ २२५ ॥ गीता श्लोक ४२ ज्ञानेश्वरी ओवी २२५