ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकभी स्वप्नमें भी नहीं सोचा था ऐसा काम जब किसीसे सफलता पूर्वक संपन्न हो जाता है तब उसका हृदय कृतार्थतासे कैसे भर आता है इसका अनुभव अब हो रहा है। जब हृदयमें बिना ओर छोरका आनंद लहरें मार रहा होता है तब मौन रहना ही अच्छा होता है ! बिना ओरछोरके उस आनंद-सागरको भला शब्दोंके चम्मचसे कहां तक भरें और कैसे भरें ? वस्तुतः उसकी आव- श्यकता भी नहीं होनी चाहिये । किंतु जीवनमें कुछ बातें ऐसी होती हैं कि जिन्हें समयपर नहीं कहना शायद कृतघ्नता कहा जाय । इसीलिये यहां ये शब्द लिखे जा रहे हैं। कभी ज्ञानेश्वरीकी कुछ ओवियोंका सहज ही अनुवाद हो गया । वह, वयोवृद्ध, ज्ञानवृद्ध, गुरु-जनोंको अच्छा लगा । पू० आचार्य शं. वा. दांडेकर, श्री.न्यायरत्न धुंडिराज शास्त्री विनोद, प्रा० न० र० फाटक जैसे विद्वान् गुरुजनोंने इसी ढंगसे छंदोबद्ध ज्ञानेश्वरी लिखनेकी प्रेरणा दी। पू० शं० वा० दांडेकरजीने कहा “तुमने और कुछ भी काम नहीं किया किंतु इसी ढंगसे ज्ञानेश्वरी हिंदीमें लिख दी तो हम समझेंगे तुम्हारा यह जन्म सार्थक हुआ !” और मैंने भी इसीको गुरुजनोंकी आज्ञा मान- कर अपना अधिकार अथवा अपनी योग्यताका विचार किये बिना ही ज्ञानेश्वरीके अनुवादका काम हातमें लिया । ॐ नमोजी आद्य ! लिखते हुए आदि पुरुषको प्रणाम कर कार्यका श्रीगणेशा किया । किंतु आगे ........! काम धीरे धीरे आगे रेंगता गया । जैसे जैसे काम आगे रेंगता गया शरीर सूखता गया । ऐसे भी लगा “यह काम इस शरीरसे पूरा नहीं होगा !” किंतु काम अधूरा छोडना भी असंभव था । बिना किसी कारणके दुर्बलता बढती गयी । दिन भर थकानका अनुभव होने लगा । पडा रहता तो न दिन और न रात घंटों सो जाता । नींदमें सारा दिन बीत जाता । जब जगा रहता, कुछ काममें लगता तो अपने आप खो जाता ! अर्थात् बीच बीचके कालखंडका स्मरण ही नहीं रहता । अब क्या हुआ ? मैं कहां था ? क्या करता था ? आदिका भान ही नहीं रहता । मेरे एक डॉक्टर मित्र चिकित्सा करते । दवा देते । कभी कभी सुयी भी लगाते । मैं अपनी बात उनसे ठीक कह नहीं सकता था, ऐसे महीने बीते । सालभर होने आया । इसी बीचमें एक दिन श्री. शंभु आपटे नामके एक सज्जनका परिचय हो गया। दूसरे जिस सज्जनद्वारा यह परिचय हुवा था उसने कहा था “वे योगी हैं । आध्यात्मिक साधनामं रत रहते हैं ।" आदि आदि। इस परिचयके तुरंत बाद अनुवादित ज्ञानेश्वरीके कुछ पृष्ठ देखकर उन्होंने कहा “आप ज्ञानेश्वरीका अनुवाद कर रहे हैं । किंतु यह काम आपसे पूरा नहीं हुवा तो आपको दुःखी नहीं होना चाहिए। मैं देख रहा हूं कि यह काम आपसे पूरा नहीं होगा। इसके पहले यह शरीर छूट जायेगा !” यह सुनकर मैंने हँसते हुए कहा “मेरे एक बुजुर्ग मित्र मेरे लिये सदैव कहते हैं कि तीन चार सालमें एक बार यह ऊपर जाकर यमराजका दरवाजा खटखटाता है और वह दरवाजा खोलनेके पहले ही अंदरसे चिल्लाकर कहता है “नो व्हेकन्सी !” ” “दरवाजा खोलनेके पहले ही वह क्यों चिल्लाकर कहता है ? दरवाजा खोलकर सज्जनतासे क्यों नहीं कहता !” मेरा परिचय करा देनेवाले मित्रने पूछा।
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