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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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“दरवाजा खोलते ही कुमठेकरजी अंदर घुस जायेंगे तब बाहर निकालना मुश्किल होगा न !” शंभु आपटेने कहा और भारी बना हुवा वातावरण कुछ हलका बना। किंतु मेरा और शंभु आपटेजीका संबंध बढता गया। मुझ पर उनकी बातोंका भी कुछ असर होता गया। मेरे कामकी गति धीमी होती गयी। शरीरके कष्ट बढते गये। और एक दिन ऐसे ही बातबातमें मैंने शंभु आपटेजीसे कहा “मुझे लगता है मुझे अब आपके पास आना छोड देना चाहिए। क्यों कि आपकी बातोंका मुझ पर प्रभाव पडता जाता है। ज्ञानेश्वरी लिखने बैठते समय मन साशंक होता है। मैं इसे प्रकाशित हुवा देखना चाहता हूं और माना मुझसे यह काम पूरा नहीं होगा; किंतु ज्ञानेश्वरीका समवृत्तमें अनुवाद करते करते शरीर छोडना भी कम भाग्य नहीं है!!” यह कहते समय मेरी आँखें भर आयीं। शंभु आपटेजी भी द्रवित हुए। उन्होंने कहा “ऐसी बात नहीं है। मैं भी चाहता हूं कि यह काम पूरा हो। किंतु कैसे हो? मैं यही सोचता हूँ। मैं इस काममें सहायक बनना चाहता हूँ। रोडा अटकाना नहीं चाहता !” हम दोनोंका संबंध बना रहा। बढता गया। एक दिन उन्होंने यकायक कहा “कुमठेकरजी कृपा करके तुम डाक्टरसे दवा लेना छोड दो। ऐसे ही चलने दो।” उस दिन मुझे माथेमें बडी वेदनाएँ हो रही थीं। इसीलिये मैं शंभु आपटेजीके घर गया था। उन्होंने मेरा सिर गोदमें लेकर मसाज किया। ऐसे करते समय भी वे बडे प्यारसे समझाते रहे कि तुम्हे औषधी लेना छोड देना चाहिए। मैंने डाक्टरी ट्रीटमेंट छोड दी। शंभु आपटेजी ही मेरे डाक्टर बने। मेरा उनके घरमें आना जाना बढता गया। हम दोनों न जाने क्या क्या बोलते बैठते थे। एक दिन अकस्मात मैंने ज्ञानेश्वरीका किया हुवा अनुवाद सुनाया। अनुवाद अच्छा था। सुननेवाला और सुनानेवाला मानो एक हो गये थे। समयका भान भी नहीं रहा। और ...... और मैं अत्यंत थक गया। शंभुजीकी पत्नीने काफी बना कर दी। मैं आराम कुर्सी पर पडा था। शंभुजी यकायक उठे। हाथ पैर धो आये। अगरबत्ती जलायी। एक पाट रखा। उस पर मुझे बिठाया। पांच दस मिनिट मेरे सामने आंखे मूंदकर बैठे रहे। फिर उठे। अंदर जा कर एक श्रीफल और पांच रुपये ले आये। श्रीफल तथा पांच रुपये मेरे हाथमें देकर बोले, “यह नोट संभा- लकर रखो। खर्च मत करो, बैंकमें मत रखो, अपने पास ही रखो !” और मुझे तिलक लगाया । थोडी देर मेरा माथा और गर्दन जहां दर्द होता था - सहलाते बैठे रहे। फिर अपने भाईको भेज कर टैक्सी मंगवाई और मुझे डेरे पर भेज दिया। इसके कुछ दिन बाद वे बोले “अब आप लिखिये। अब लगता है भगवान आपसे यह काम करा ही लेंगे। इतने दिन मुझे लगता था कि यह काम होना तो चाहिए किंतु कैसे पूरा होगा ?' इसके बाद उन्होंने अपनी पत्नीसे मेरे लिये काफी बनानेके लिये कहा और फिर बोले “कुमठेकर ! आखिर मैंने अपनी पत्नीसे पूछा यदि मैने यह शरीर छोड दिया तो तुम कैसे निभाओगी ?” पहले वह झझाई बोली “यह कैसा प्रश्न करते हो तुम ? यह सवाल ही क्यों उठा ?” फिर मेरे आग्रह करने पर बोली “तुम जानते हो मुझे सीना आता है। अपना एक मशीन ले लूंगी। उस पर काम करूंगी। जो मिलेगा उसीसे अपना और बच्चोंका खर्चा चलाऊंगी। न किसीसे कुछ मांगूगी। न किसीका दिया हुवा कुछ लूंगी !!” “यह सुनकर मनका समाधान हुवा। दीक्षा लेते समय मैंने अपने गुरुको बचन दिया था कभी पर स्त्री और पर धनकी आशा नहीं करूंगा !” इतनेमें उनकी पत्नी काफी ले आयी। उनसे काफी लेते लेते मैंने कहा “किंतु यह प्रश्न ही क्यों पैदा हुवा ?” उनकी पत्नीने कहा- “यही इनकी आदत है !” ज्ञानेश्वरी ५

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