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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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हमने काफी पी। आश्चर्य जनक रूपसे मेरा स्वास्थ्य सुधरने लगा। तेजीसे काम आगे बढा। नौ हजार ओवियोंका समवृत्तमें अनुवाद हुवा। उसकी पांडुलिपि तयार हुई। छपाई आदिके खर्चकी व्यवस्था हुई। यह सारी बातें मैंने शंभु आपटेजीसे कहीं। तब उन्होंने पूछा "ज्ञानेश्वरीका पसायदान-प्रसाददान-लिख कर पूरा हुवा ?" मैंने पढकर सुनाया। "जो चाहता था वह हो गया !" "पुस्तक मुद्रणके लिये दे रहा हूँ। कल ही बेंगलूर जा रहा हूँ?" "हिंदी छपाइके लिये बेंगलूर क्यों ?" "वहां मेरे मित्रका प्रेस है। हम दोनोंका पच्चीस सालका संबंध है। छपाई जल्दी हो जायेगी !" मुझे किसी प्रकारकी कठिनाई नहीं होगी। "अच्छा !" मैं बेंगलूर गया। पुस्तक छपने लगी। आखिर वहां किसी तरह साल भरमें पंद्रह अध्याय छप तो गये। मैं उसकी डमी कापी बनाकर बंबई लौटा। बंबई आते ही सीधा शंभु आपटेजीके घर गया। किंतु..... वे जहाँ अक्सर बैठते थे, उसी स्थानके पास दीवारको लगी सीनेकी मशीन बैठी थी। उसके ऊपर शंभुजीकी तसवीर टंगी थी और सिंदूरकी बिंदी जो सदैव श्रीमती आपटेजीके भालपर लगी रहती थी वह उस तसवीरके भालपर लगी थी। घरमें जहां उत्साह रहता था वहां उदासी थी। मै वहां क्षणभर बैठा रहा। उनकी धर्मपत्नी मौन और उदास मेरे सामने बैठी रही। कोई कुछ नहीं बोल पाया। वहां मेरा दम घुट रहता था। शंभुजीने मेरे हाथमें श्रीफल देते समय कहा था "तुमपर भगवानकी असीम कृपा है। कृपा करके कोई दवा मत लो। तुम अच्छे हो जाओगे।" पांच रुपयोंका नोट देते समय उन्होंने कहा था "अब इस कामके लिये कहीं न कहींसे आर्थिक सहायता मिलती जायेगी !" उन्होंने कई बार कहा था, "मैंने कई बार सोचा, तुम इतना अच्छा काम कर रहे हो। यह काम कैसे पूरा होगा ? इसमें मैं क्या कर सकता हूँ?" क्षणभरमें कई बातें स्मृतिपटल पर उठ कर डूब गयीं। उदास, निःशब्द वातावरणमें दम घुट रहा था। किसी तरह मैंने कहा "अच्छा ! अब मैं जाता हूँ!" और चला आया ! आते समय मनमें अनेक बातें आयीं। किंतु मनमें उठनेवाली सभी बातें लिखनेकी आवश्यकता नहीं होती। जीवनमें होनेवाली सभी घटनाओंका अर्थ करना संभव नहीं होता। इस घटना पर कोई भाष्य किये बिना शंभुजीके लिये केवल कृतज्ञताकी अश्रु-अंजली देना ही मेरा कर्तव्य रह गया है। वैसे ही पू. आचार्य शं. वा. दांडेकर इस काममें बार बार प्रोत्साहन देने परभी "कार्य संपन्न हुवा" यह देखनेके लिये नहीं रहे। वही बात श्रीन्यायरत्न धुंडीराज विनोदकी है। किंतु प्रा. न. र. फाटकजीने इन सबकी कमी पूरी की। अनुवाद करते समय कोई बात समझमें नहीं आयी फाटकजीके पास गया। प्रकाशनके लिये कभी आर्थिक तंगी आयी। फाटकजीके पास गया। दूसरा कोई संकट सामने आया तो फाटकजीके पास गया। और, उन्होंने भी कभी निराश नहीं किया। दौडते हुए पास आनेवाले बालकको जिस भावसे मां पास लेकर उनकी बातें सुनती है, जैसे उसकी सहायता करती है वैसे उन्होने मेरी कठिनाइयोंको हल कर दिया। वह भी निष्काम भावनासे। वैसे ही श्री. स. का. पाटील, सेठ अरविंद मफतलाल, से. धरमसी मोरारजी खटाऊ, श्री. वामनराव वंदे इन्होंने जब कभी आर्थिक कठिनायी आयी, उनको मालूम हुवा, किसी न किसी तरह उसको हल कर दिया। ३ कृतज्ञताके कुछ शब्द