भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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जिसके नामके ही सम्मुख । आकाश लगता बौना देख । उसका गुण तू एक एक । कैसा जानेगा ? ॥ ११ ॥ इसीलिये ऐसा वर्णन । न जाने किसके लक्षण । कहनेके बहाने मान । कहे हैं यहां ॥ १२ ॥ श्रीकृष्णका भक्त प्रेम -- सुनोजी द्वैतका म्यान मान । नष्ट करता है ब्रह्म-ज्ञान । उससे सख्य माधुरी जान । नष्ट होगी ॥ १३ ॥ इसीलिये हरिका यह बोलना । मानो हलकासा परदा रखना । मनके सख्य सुखको हे भोगना । द्वैत भावसे ॥ १४ ॥ जिसका सोऽहं भावका रोक । मोक्ष सुखार्थ बने जो रंक । उनकी दृष्टिका हे कलंक । लगेगा तेरे प्रेमको ॥ १५ ॥ इसका अहंभाव जायेगा । यदि यह मैं ही हो जायेगा। मैं अकेला ही कैसा रहूंगा । सोचता है हरि ॥ १६ ॥ दृष्टिसे देख कर सुखी होना । या सुखसे मनसोक्त बोलना । या प्रेमसे आलिंगन करना । किसको फिर ॥ १७ ॥ या अपने मनकी सुंदर । बात कहें किससे मधुर । हुआ यदि यह धनुर्धर । मुझमें समरसैक्य ॥ १८ ॥ द्वयनीय भावसे जनार्दन । अन्योपदेश रूपसे ही मान । बोलनेमें किया मनमोहन । आलिंगन पार्थका ॥ १९ ॥ सुननेमें यह किंचित्कठिण । फिर भी है यह स्पष्ट ही जान । श्रीकृष्ण रूपकी मूर्ति अर्जुन । है ढली हुई ॥ १२० ॥ अर्जुनकी प्रशंसा — जैसे ही आयूके अंतमें । पुत्रजन्म होता है बांझमें । फिर वह मोहत्रयमें । नाचने लगती है ॥ २१ ॥ ऐसा हुआ है अनंत । यह मैं नहीं कहता । यदि मैं नहीं देखता । प्रेमातिशय ॥ २२ ॥ १६३ आत्मसंयम-योग

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