ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदेखो कैसा है यह अचरज । कहां उपदेश औ' कहां झुंज । परंतु यहां है प्रेमका भोज । नाचता जो ॥ २३ ॥ अजी ! लाज लज्जा है प्रेममें । तथा थकान है व्यसनमें । भ्रम नहीं जो पगलाईमें । यह होगा कैसे ॥ २४ ॥ इसका भावार्थ है ऐसा । पार्थ भक्तिका आश्रयसा । सुख श्रंगारके मानस-सा । दर्पण रूपमें ॥ २५ ॥ ऐसा है यह पुण्य पवित्र । विश्वमें भक्ति बीज सुक्षेत्र । तभी है श्रीकृष्ण-कृपा पात्र । त्रिभुवनमें ॥ २६ ॥ आत्म निवेदनकी नींवका । आधार पीठ है जो सख्यका । पार्थ है अधिष्ठान उसका । मुख्य देवता ॥ २७ ॥ पास ही है प्रभु उसका वर्णन । छोड़ करते हैं भक्त-गुणगान । भाता है ऐसा स्वभावका अर्जुन । श्रीहरिको सहज ॥ २८ ॥ भजती जैसे पतिको प्रीतिसे । पाती मान्यता प्रीतिकी पतिसे । वर्णन ऐसी सतीका पतिसे । होना स्वाभाविक ॥ २९ ॥ अर्जुनका ऐसा गुणगान । चाहता विशेष मेरा मन । त्रिभुवनका भाग्य महान् । पार्थमें बसता ॥ १३० ॥ जिसके प्रेमके कारण । निर्गुण हो आता सगुण । तथा सकल गुणपूर्ण । अनुभवता प्रेम-पीड़ा ॥ ३१ ॥ श्रोताओंकी ओरसे वक्ताका यशोगान-- कहते तब श्रोता हमारा भाग्य । कैसा बोलना यह सहज योग्य । शब्द शोभा आयी पाकर विजय । नाद-ब्रह्मपर ॥ ३२ ॥ आश्चर्यजी गगनमें देश-भाषाके । प्रकार प्रकटते साहित्य रंगके । खिल आयी हिंदी ऐसे अलंकारके । वैभवानंदमें ॥ ३३ ॥ छटकी है ज्ञान चांदनी कैसी । भावार्थ दे प्रिय शीतलतासी । खिली श्लोकार्थ कुमुदिनी ऐसी । सहज रूपसे ॥ ३४ ॥ ज्ञानेश्वरी १६४