ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचाह होती इससे निरिच्छोंमें । मन होता वचन सुननेमें । तथा डुलते हैं अंतरंगमें । ज्ञान प्रकाशसे ॥ ३५ ॥ ज्ञानेश्वर कृत कृष्ण वर्णन- निवृत्तिशासने यह जाना । फिर कहा ध्यान सब देना । पांडव कुलमें कृष्ण दिन । हुआ उदय ॥ ३६ ॥ देवकीके उदरमें जन्म लिया । यशोदाने सायास पालन किया । पांडव कुलके वह काम आया । इस समय ॥ ३७ ॥ तभी सेवा करता बहु समय । अवसर देख करता विनय । पड़ा नहीं ऐसा प्रयास अवश्य । विषय जाननेमें ॥ ३८ ॥ अर्जुनकी उत्कट जिज्ञासा - जाने दो कहते संत जन । विषय कहो सत्वर महान । सन्त लक्षण मुझमें अर्जुन । कहता नहीं है ॥ ३९ ॥ किया तो संत लक्षणका विचार । “अयोग्य मैं” निःसंदेह “यह सारा” । किंतु तेरा उपदेश सुनकर । बनूंगा अवश्य ॥ १४० ॥ यदि तू मन करेगा । तब मैं ब्रह्म बनूंगा । जो कहो अभ्यास करूंगा । निःसंदेह ॥ ४१ ॥ न जानता देव यह किसका बखान । सुनकर करे अंतःकरण स्तब्ध । इन लक्षणसे पूर्ण जो संत महान । कैसे होंगे जी ॥ ४२ ॥ यह लक्षण मुझमें क्या आयेगा । इतना तू मुझे अपना पायेगा । श्रीकृष्ण कहता “अवश्य ही होगा” । रिमत करके ॥ ४३ ॥ जब तक संतोष नहीं मिलता । सुखका सर्वत्र अभाव रहता । जब वह समाधान है मिलता । सुखाभाव कहाँ ॥ ४४ ॥ जो है सर्वेश्वरका सेवक । वह होगा ब्रह्म सकौतुक । हुआ है यह फलकारक । दैवयोगसे ॥ ४५ ॥ सहस्र जन्मोंमें इंद्रादिकके । मिलन नहीं होता जिसके । आधीन वह कितना पार्थके । कथनमें अधीर ॥ ४६ ॥ १६५ आत्मसंयमयोग