ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपार्थका यह कहना । मुझको है ब्रह्म होना । श्रीकृष्णने यह सुना । पूर्ण रूपसे ॥ ४७ ॥ श्रीकृष्ण कहते तब अपनेमें । ब्रह्मत्वका दोहद हुआ इसमें । वैराग्य आया बुद्धिके उदरमें । बनके गर्भ ॥ ४८ ॥ किंतु दिन है अभी अपूर्ण । वैराग्य बसंतमें भरा पूर्ण । बौरा आया है भावका महान । सोऽहम्के ॥ ४९ ॥ प्राप्ति फल अब फलेगा । इसमें समय न लगेगा । पूर्ण हुआ इसका विराग । जाना श्रीहरिने ॥ १५० ॥ अब यह जो कर्म करेगा । इसको प्रारंभमें फलेगा । इसीलिये कहा हुआ होगा । अभ्यास इससे ॥ ५१ ॥ ज्ञानेश्वरका पंथराज— श्रीहरि ऐसा सोचकर । कहते हैं सु अवसर । : अर्जुन सुन तू सत्वर । पंथराज ॥ ५२ ॥ जडमें वहां प्रवृत्ति वृक्षके । फल लगे करोडों निवृत्तिके । पथिक हैं जहां इस पथके । महेश भी ॥ ५३ ॥ योगी-वृंदके अनुभव परसे । उस सूक्ष्म-पथ पर चलनेसे । मूर्ध्नि आकाश मार्ग इस कारणसे । हुआ सुलभ ॥ ५४ ॥ आत्म-बोधके सरल पथपर । गये सीधे वे सानंद दौडकर । अन्य सकल मार्ग छोड़कर । जो हैं अज्ञानके ॥ ५५ ॥ फिर ऐसे महर्षी आये । साधक थे सिद्ध भये । आत्मविद् हो महती पाये । इस पंथसे ॥ ५६ ॥ यह मार्ग जो देखता । भूख प्यास भी भूलता । रात दिन न जानता । चलनेमें यहां ॥ ५७ ॥ चलते चलते जहां पग पड़ता । वहां मोक्ष सुखका भांडार खुलता । कहीं यदि गलत पग भी पड़ता । वह है स्वर्ग सुखका ॥ ५८ ॥ पूर्वाभिमुख हो चलना । पश्चिमको जा पहुंचना । मनको स्थिर ही रखना । चलना यहां ॥ ५९ ॥ ज्ञानेश्वरी १६६