भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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इस भाँतिसे है जाना । गंतव्य स्वयं हो जाना । इसे भला क्या कहना । जानेगा तू ॥ १६० ॥ “देव !” तब पार्थ कहता । “मुझे तू कब उभारता ।” आर्त सागरमें डूबता । हूं इस समय ॥ ६१ ॥ श्रीकृष्ण तब ऐसा कहता । उतावला हो क्यों बोलता । अपने आप मैं हूँ कहता । तब तू क्यों पूछता वही ॥ ६२ ॥ शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः । नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् ॥ ११ ॥ योग साधनका स्थान ऐसा होना चाहिए— अब जो मैं एक विशेष कहूंगा । अनुभवसे वह काम आयेगा । उसके लिये योग्य ऐसा लगेगा । स्थान एक ॥ ६३ ॥ जहां होता सहज समाधान । न रहता उठनेका भी भान । वैराग्य होता जहां बलवान । देखते वह ॥ ६४ ॥ वह हो संतोंका वसतिस्थान । संतोषका हो आवास महान । जहां हो चित सदा धैर्यवान । तथा उत्साही भी ॥ ६५ ॥ अभ्यास होता सहज जहां । अनुभव होता आप वहां । ऐसी रम्यता वसती वहां । अखंडित ॥ ६६ ॥ वहां जानेसे ही पार्थ । नास्तिकको मनोरथ । तपस्यामें हो सु-स्वस्थ । अंतःकरण ॥ ॥ ६७ ॥ सहज ही वहां जानेसे । सहसा बैठ जानेसे । करें न मन उठनेसे । सकामका भी ॥ ६८ ॥ करता वह घुमक्कडको भी स्थिर । आनेसे सहज उस स्थान पर । जागृत करता वैराग्य सत्वर । थपकियां देके ॥ ६९ ॥ पवित्र देशके स्थान लगाना स्थिर आसन । दर्भ चर्म तथा वस्त्र ऊंचा नीचा न हो वह ॥ ११ ॥ १६७